राजनांदगांव। लोकसभा चुनाव में भाजपा लगातार नए चेहरों पर दांव लगाती रही है। पिछले पांच चुनाव में हर बार प्रत्याशी नया रहा है। यानी पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। खास बात यह है कि इस प्रयोग में भाजपा हर दफे सफल भी रही है। इसमें 1999 में डॉ. रमन सिंह का भी चुनाव शामिल है जिन्हें कवर्धा से विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा ने कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा के सामने मैदान में उतारा था।

इस बार संतोष पांडे्य के रूप में भाजपा ने एक बार फिर नए चेहरे को उतारा है। दूसरी तरफ कांग्रेस ने पिछले दो चुनावों में ऐसे चेहरों पर दांव लगाया है जिनके लिए लोकसभा का चुनाव पहला रहा। इस दफे भाग्य आजमा रहे भोलाराम साहू का भी यह पहला लोकसभा चुनाव है।

नया चेहरा वाला कांग्रेस का पिछला प्रयोग विफल साबित हुआ था। भाजपा की तरफ से नए चेहरों पर भरोसे का सिलसिला 1999 से शुरू हुआ जो अब तक चल रहा है। 1999 में भाजपा ने दिग्गज कांग्रेसी नेता मोतीलाल वोरा के सामने उस समय अनजान रहे डा. रमन को मौका देकर सबको चौका दिया था, लेकिन परिणाम अनुकूल आने के बाद भाजपा इस तरह का प्रयोग लोकसभा में लगातार कर रही है।

2004 में प्रदीप गांधी के रूप में भाजपा ने दूसरी बार ऐसे चेहरों को उतारा जिनके लिए यह पहला लोकसभा चुनाव था। प्रदीप ने कांग्रेस के देवव्रत सिंह को हराया था। फिर 2009 में भाजपा ने एक बार फिर जोखिम भरा प्रयोग करते हुए उस समय पार्षद रहे मधुसूदन यादव को मैदान में उतार दिया।

तब कांग्रेस की ओर से देवव्रत सिंह ही सामने थे जिन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2014 यानी पिछले चुनाव में भाजपा को यह प्रयोग और चौकाने वाला रहा और बड़ी जीत हासिल करने वाले मधु के बदले तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह पर बाजी लगा दी। भाजपा को सफलता तब भी मिली।

कारगर नहीं रहा कांग्रेस का प्रयोग

दूसरी तरफ कांग्रेस का प्रयोग कारगर साबित नहीं हो पाया। 2004 में पहली बार लोकसभा चुनाव के मैदान में खैरागढ़ विधायक रहे देवव्रत सिंह को प्रत्याशी बनाया था। वे हार गए थ। इसी कार्यकाल में हुए उपचुनाव में देवव्रत जीत गए। फिर 2009 में उन्हें फिर मौका दिया गया और कांग्रेस फिर फेल हो गई। उसके बाद कांग्रेस ने भी नए चेहरे पर दांव लगाने वाला प्रयोग किया। साल 2014 के चुनाव में कमलेश्वर वर्मा को प्रत्याशी बनाया गया, लेकिन वे बुरी कदर मात खा गए।

इस बार दो बार के विधायक भोलाराम साहू को चुनाव मैदान में उतारा गया है जिनके लिए लोकसभा का चुनाव पहला अनुभव है। अब देखना यह है कि नए चेहरों वाले प्रयोग में भाजपा छठीं बार सफल होती है या फिर कांग्रेस को इसमें पहली दफे सफलता मिलती है?

दोबारा-तीबारा वाले हारते रहे हैं

राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के चुनावी इतिहास में शिवेंद्र बहादूर सिंह को छोड़कर कोई भी नेता तीन बार नहीं जीता। लेकिन खास बात यह भी है कि शिवेंद्र को भी तीन दफे हार का सामना करना पड़ा। पद्मावती देवी 1967 में जीतीं पर 1971 में हार गईं। इसी साल कांग्रेस के रामसहाय पांडे सांसद चुने गए, लेकिन उसके बाद यानी 1977 के चुनाव में हार गए।

भाजपा से 1989 में धर्मपाल गुप्ता को जीत मिली, लेकिन वे 1992 वाले चुनाव में हार गए। 1996 में अशोक शर्मा सांसद चुने गए लेकिन 1998 में दूसरे प्रयास में हार गए। इस चुनाव में वोरा जीते थे, लेकिन वे 1999 में हार गए। इस कारण भी अब दोनों प्रमुख दल लगातार नए चेहरों पर भरोसा जताने लगी है।

Posted By: Sandeep Chourey