राजनांदगांव। आधा दर्जन सीटों वाले राजनांदगांव जिले में हर सीट पर राजनीतिक समीकरण व मुद्दे अलग-अलग हैं। पहले चरण में जिन 18 सीटों के लिए चुनाव हो रहा हैं उनमें सबसे हाई प्रोफाइल राजनांदगांव सीट भी शामिल है। इस सीट पर एक साथ 30 प्रत्याशियों ने ताल ठोका है। इनमें मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह तथा कांग्रेस से अटलजी की भतीजी कस्र्णा शुक्ला भी शामिल हैं।

राजनांदगांव : पहले चरण की इस हाईप्रोफाइल सीट पर कुल 30 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें भाजपा से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह हैं तो कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की भतीजी कस्र्णा शुक्ला पर दांव लगाया है। डॉ. सिंह पिछला दो चुनाव इसी सीट से अच्छे खासे अंतर से जीते थे।

देखना दिलचस्प होगा कि जम्बो प्रत्याशियों वाली इस सीट पर ऊंट किस करवट बैठता है। कितने जमानत बचा पाते हैं। बहरहाल लोग कह रहे हैं मुकाबला तो सीधा है। भाजपा सरकार के कामों पर वोट मांग रही है, तो कांग्रेस 15 सालों का हिसाब मांग रही है। यहां पारंपरिक के अलावा हाईटेक तरीकों से भी वोट मांगा जा रहा। कांग्रेस प्रत्याशी डोर-टू-डोर जनसंपर्क कर रही हैं। भाजपा की तरफ से रमन सिंह के पुत्र व सांसद अभिषेक सिंह कमान संभाले हुए हैं।

खैरागढ़ : वर्तमान विधायक गिरवर जंघेल और भाजपा प्रत्याशी कोमल जंघेल को पूर्व सांसद व जकांछ के देवव्रत सिंह से चुनौती मिल रही है। यह सीट लोधी बाहुल्य है। भाजपा व कांग्रेस, दोनों ने इस बार भी जातीय समीकरण के आधार पर ही टिकट बांटा है। हालांकि प्रचार में जाति का मुद्दा नहीं है। विकास के मुद्दे पर ही वोट मांगे जा रहे हैं। मैदान में कुल 15 प्रत्याशी हैं। वोट के लिए प्रत्याशी गांव, घर और यहां तक कि खेतों में भी दस्तक दे रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचार का तरीक पारंपरिक ही है। शहरी क्षेत्र खैरागढ़, छुईखदान और गंडई में सोशल मीडिया का भी खूब उपयोग किया जा रहा।

डोंगरगढ़ : यहां भाजपा ने मौजूदा विधायक सरोजनी बंजारे को फिर से मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने भूवनेश्वर बघेल के रूप में युवा व नया चेहरे पर दांव खेला है। सीट अजा वर्ग के लिए आरक्षित है। जकांछ- बसपा गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में हैं। पार्टी ने यहां से मिश्रीलाल मारकंडे को मैदान में उतारा है।

गोंगपा और आप समेत कुल दस प्रत्याशी मैदान में हैं। कांग्रेस- भाजपा की सीधी टक्कर में बाकी प्रत्याशी कितना असर डाल पाएंगे यह तो परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। इस सीट पर विकास ही मुख्य मुद्दा बना हुआ है। बैनर-पोस्टर और लाउड स्पीकर के माध्यम से प्रचार का दौर चल रहा है। प्रत्याशी मतदाताओं के घरों तक पहुंच रहे हैं।

डोंगरगांव : साहू बाहुल्य इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने दूसरी बार जाति के आधार पर प्रत्याशी चयन किया है। यहां लगभग 45 प्रतिशत वोटर साहू हैं। कांग्रेस ने अपने वर्तमान विधायक दलेश्वर साहू पर भरोसा किया है तो भाजपा ने पूर्व सांसद मधुसूदन यादव को मैदान में उतारा है। कुल एक दर्जन प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें गठबंधन से बसपा प्रत्याशी और आप भी शामिल हैं।

कांग्रेस गांवों में कराए गए विकास और किसानों के हित में किए गए कामों पर वोट मांग रही है। वहीं भाजपा मोदी और रमन सरकार की उपलब्धियों के भरोसे मतदाताओं का विश्वास जीतने में लगी है। अन्य प्रत्याशी दोनों की नाकामियां और कमियों को लेकर वोटरों के बीच पहुंच रहे हैं। यहां भी प्रचार का तरीका पारंपरिक ही है, लेकिन सोशल मीडिया का भी सहारा लिया जा रहा है। गांवों में नुक्कड़ सभाएं भी की जा रही है।

खुज्जी : साहू और आदिवासी बाहुल इस सीट पर कांग्रेस ने साहू विधायक भोलाराम साहू का टिकट काटकर छन्नी साहू को मैदान में उतारा है। भाजपा ने भी जातिगत समीकरण का फायदा उठाने हिरेंद्र साहू को मौका दिया है। इनके बीच में जकांछ ने जनरैल सिंह भाटिया पर दांव लगाया है। दो समाज के बीच अपनी पुरानी पकड़ का फायदा उठाने जकांछ प्रत्याशी पूरा जोर लगा रहे हैं।

मैदान में 16 प्रत्याशी हैं। प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ ही दूसरे भी आदिवासी वोटरों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। प्रचार में भाजपा विकास कार्यों को मुद्दा बना रही है, तो कांग्रेस और जकांछ प्रत्याशी रमन सरकार को किसान विरोधी बताकर मतदाताओं तक पहुंच रहे हैं। जंगल पट्टी के गांवों में स्थानीय मुद्दों को भी उठाया जा रहा है। इस क्षेत्र में पोंगा प्रचार पर ही ज्यादा भरोसा किया जा रहा है। सभी प्रत्याशी मतदाताओं से सीधे मिल रहे हैं। दो-तीन सभाओं छोड़ कोई बड़ा आयोजन अब तक नहीं हुआ है।

मोहला-मानपुर : अजजा वर्ग के लिए आरक्षित इस सीट पर गोड़ और हल्बा समाज के मतदाता ज्यादा हैं। भाजपा ने हल्बा कंचनमाला भूआर्य तो कांग्रेस ने मौजूदा विधायक का टिकट काट कर गोड़ समाज से इंद्रशाह मंडावी को प्रत्याशी बनाया है। गोड़ समाज से ही जकांछ ने संजीत ठाकुर को मैदान में उतारा है।

मैदान में कुल आठ प्रत्याशी हैं। करीब 80 प्रतिशत आबादी क्षेत्र जंगल में है और यहां प्रचार के पारंपरिक तरीकों को छोड़ और कोई साधन अब तक नजर नहीं आ रहा। नक्सल प्रभावित कई गांव ऐसे भी हैं जहां प्रत्याशी अब तक नहीं पहुंच पाए हैं। वोट मांगने के लिए पूरा जोर विकास के ही मुद्दों पर ही दिया जा रहा है। मानपुर को जिला बनाने जैसे कुछ स्थानीय मुद्दों को भी प्रत्याशी प्रमुखता से उठा रहे हैं।

Posted By:

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close