राजनांदगांव। नईदुनिया प्रतिनिधि

आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, कि दो समय की सब्जी खरीद सकें। खेत होने के बाद भी दूसरे के खेत में जाकर मजदूरी करना एक मजबूरी बन गई थी। यह कहानी है जिले के अंबागढ़ चौकी के अंतिम छोर व महाराष्ट्र सीमा स्थित ग्राम साल्हे कुसुमकसा की आदिवासी महिला भगवती बाई कंवर की। गरीबी और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए भगवती बाई ने तीन एकड़ खेत में बारहमासी फसलें उत्पादित करना ठानी। इसके बाद भवगती बाई ने पीछे मुड़कर ही नहीं देखा।

पारंपरिक खेती का बदला स्वरूप

आदिवासी महिला भगवती बाई कंवर के लिए बाड़ी योजना कामधेनु बनकर उनके आर्थिक समृद्धि का आधार बन गई है। कभी भगवती कंवर के खेतों में केवल खरीफ सीजन में उगाए जाने वाले एक मात्र धान की फसल एवं थोड़ी बहुत सब्जी-भाजी के उत्पादन के स्थान पर आज खरीफ एवं रबी दोनों सीजनों में धान के अलावा हरी-भरी साग-सब्जी तथा पर्याप्त सिंचाई सुविधा मिलने से मक्का, उड़द जैसे फसलें भी आज उनके खेतों लहलहा रहीं है।

पति का मिल रहा साथ

किसान भगवती कंवर ने बताया कि उद्यानिकी एवं कृषि विभाग के सहयोग से आज उनके खेतों में निरंतर भिंडी, करेला, गलका, लौकी आदि फसलों का पर्याप्त मात्रा में उत्पादन हो रहा है। इन साग-सब्जियों को बेचकर वे नियमित रूप से आमदनी अर्जित कर रही है। इसके अलावा उनके बाड़ी में केले की भी अच्छी पैदावार भी है। बाड़ी से लगातार सब्जी-भाजी के उत्पादन होने से प्रतिदिन अपने खेतों में ही साग-सब्जी के बिक्री करने के अलावा उनके पति दिलीप कंवर आस-पास के बाजारों में जाकर अपने उत्पाद का बिक्री कर रहे हैं।

बच्चों की पढ़ाई की चिंता हुई दूर

शासन की बाड़ी योजना की सराहना करते हुए भगवती ने कहा कि अब वे अपने आने वाले भविष्य के लिए पूरी तरह से निश्चिंत है। इस योजना के माध्यम से होने वाले आमदनी के फलस्वरूप अपने बच्चों की पड़ाई-लिखाई भी अच्छी तरह से करा पाएंगे। उन्होंने बताया कि इस योजना से उनके ग्राम के कृषक केसर बाई, देवकी, सगुन सिंग, बृजलाल आदि किसानों को भी जोड़ा गया है। भगवती ने इस योजना की सराहना करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने इस योजना के माध्यम से गरीब एवं छोटे कृषकों को बाड़ी योजना के माध्यम से कुछ ही समय बाद आय के साधन उपलब्ध कराकर उनके आर्थिक स्थिति को सुधारने एवं सब्जी-भाजी के उत्पादन को बड़ावा देने की दिशा में अत्यंत सराहनीय कार्य किया है।