मनोज चेलक, राजनांदगांव। जिन हाथों में कभी बंदूक गरजती थी, आत्मसमर्पण के बाद आज उन्हीं हाथों से पूर्व महिला नक्सली मशरूम का उत्पादन कर समाज के सामने मिसाल पेश कर रही हैं। लाल आतंक की दुनिया से त्रस्त होकर मुख्यधारा से जुड़ने के बाद ये महिला नक्सली समाज को यह दिखा रही हैं कि वे वक्त के साथ खुद को ढालना जानती हैं। वे भी एक आम इंसान हैं, जो मेहनत की रोटी कमाना चाहती हैं।

खास बात यह कि उनके द्वारा पैदा किया जा रहा मशरूम पुलिस विभाग के लोग ही खरीद ले रहे हैं। इससे अभी उनके सामने बाजार का संकट नहीं है। हालांकि विभाग इस बात के लिए पूरी तरह तैयार है कि उत्पादन बढ़ते ही वे बाजार भी तैयार कर लेंगे।

उर्मिला साहू (2011 में सरेंडर), सुनीता पद्दा (2012 में सरेंडर), कमला कुरामे (2014 में सरेंडर), सुशीला, शिल्पा, मीना (2019 में सरेंडर) आदि कभी नक्सली थीं। वजह कुछ भी रही हो, लेकिन नक्सल संगठन में रहते हुए उन्होंने आतंक फैलाने से परहेज नहीं किया। लेकिन अंतत उन्हें अपनी गलतियों का अहसास हुआ, साथ ही संगठन में यह भी देखा कि वहां भी न्याय नहीं है।

इतना ही नहीं, नक्सली लीडर की प्रताड़ना भी भारी पड़ने लगी। अंतत इन्होंने मुख्यधारा में लौटना ही मुनासिब समझा। आज ये महिलाएं समाज की अन्य महिलाओं की तरह न सिर्फ आम और सम्मान की जिंदगी जी रही हैं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होकर परिवार को आर्थिक सुदृढ़ता भी प्रदान कर रही हैं। इन महिलाओं का मकसद है मेहनत की रोटी खाना। यही वजह है कि आज इन्हें समाज में सम्मान की नजर से देखा जाता है।


हमारे लिए थी चुनौती : उर्मिला

आत्मसमर्पित नक्सली उर्मिला साहू ने बताया कि मुख्यधारा में लौटने के बाद उनके सामने समाज के सामने अच्छी छवि बनाना और अपने पैरों पर खड़े होना बड़ी चुनौती थी। पुलिस विभाग ने इसमें सभी की खूब मदद की। आज उनकी बदौलत ही हम आमदनी कर परिवार की ताकत बने हुए हैं।


आत्मविश्वास बढ़ा

सुनीता और कमला ने बताया कि मशरूम उत्पादन से फिलहाल बड़ी आमदनी नहीं हो रही है, लेकिन इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा है। लोग हमारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। उन्होंने बताया कि समाज हमें उम्मीदों से ज्यादा दे रहा है।


पहले प्रशिक्षण दिया, फिर जगह

एसपी कमलोचन कश्यप ने बताया कि पहले इन महिलाओं को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया गया। फिर पुलिस कंट्रोल रूम के पीछे वाली जगह दे दी गई, जहां ये मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। मशरूम की फसल बीज डालने के करीब 22 दिन बाद बाजार में बेचने लायक तैयार हो जाती है।

इस बार उत्पादन कम कर रहे हैं, इसलिए रोजाना तीन से पांच किलोग्राम तक मशरूम निकल रहा है। यह 200 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है। अभी तो विभाग के लोग ही सब खरीद लेते हैं। उत्पादन बढ़ते ही इनके लिए हम बाजार की व्यवस्था भी कर देंगे।

इनका कहना है

सरेंडर नक्सली मशरूम का उत्पादन कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। हम उनका आत्मविश्वास बढ़ाने का हर प्रयास करेंगे। मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों का पुलिस पूरा सहयोग कर रही और आगे भी करती रहेगी।

- कमलोचन कश्यप, एसपी राजनांदगांव।