जगदलपुर (हेमंत कश्यप)। लोक कथाओं में अगर प्रेमी-प्रेमिकाओं का वर्णन न हो तो वह कथा नीरस मानी जाती है। छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में जहां लोरिक-चंदा की कथा प्रचलित है उसी तरह बस्तर में झिटकू-मिटकी की प्रेम कथा वर्षों से ग्रामीण परवेश में रची-बसी है। पीढ़ी दर पीढ़ी इनकी कथा बस्तर की वादियों में गूंज रही है।

बस्तरवासी इन्हें धन के देवी-देवता के रूप में वर्षों से पूजते आ रहे हैं। इनकी प्रतिमाओं को ग्रामीण अपने देवालयों में अर्पित करते हैं वहीं यहां आने वाले सैलानी झिटकू-मिटकी की प्रतिमाएं साथ ले जाते हैं और इन्हें बस्तर के अमर प्रेमी के रूप में सम्मान देते हैं।

कौन थे झिटकू-मिटकी

बस्तर में झिटकू-मिटकी की कथा अलग-अलग नामों से चर्चित है। झिटकू-मिटकी की कहानी को लोग खोड़िया राजा और गपादई की कहानी के नाम से भी जानते हैं। किसी गांव में झिटकू नाम का एक युवक था। एक दिन उसकी मुलाकात मेले में मिटकी नामक युवती से हुई। संयोग से वह युवती भी स्वजातीय थी। पहली नजर में ही दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए। बात परिवार तक पहुंची। स्वजातीय होने के कारण झिटकू के परिजनों को कोई आपत्ति नहीं थी, पर मिटकी के 7 भाई इसके लिए तैयार नहीं थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बहन शादी कर उनसे दूर चली जाए। वे चाहते थे कि मिटकी के लिए ऐसे युवक की तलाश की जाए जो घरजमाई बन उनके ही साथ रहे।

मिटकी के भाईयों की शर्त से झिटकू के परिजन नाराज हो गए। झिटकू न परिवार को छोड़ सकता था, न ही अपनी प्रेमिका मिटकी को। उसने बीच का रास्ता निकाला। झिटकू ने कहा कि वह मिटकी से शादी तो करेगा, लेकिन वह उसके भाईयों के घर नहीं रहेगा। वह मिटकी के गांव में ही घर बनाकर अपनी गृहस्थी बसाएगा। सुकलदई के भाईयों ने शर्त मान ली। वे झिटकू के साथ मिटकी की शादी करने तैयार हो गए। शादी के बाद झिटकू मिटकी के गांव में धोरई (मवेशी चराने का काम) करने लगा जिन्दगी हंसी-खुशी बीत रही थी।

... और फिर कहानी में आया यह मोड़

कुछ वर्ष बाद अकाल पड़ा। लोग भूख से मरने लगे। इस समस्या से निपटने के लिए ग्रामीणों की एक बैठक हुई। बैठक में यह बात सामने आई कि प्यासे खेतों के लिए अगर गांव में सिंचाई तालाब होगा तो समस्या खत्म हो सकती है। ग्रामीणों ने श्रमदान कर बड़ा तालाब तैयार कर लिया। तालाब तो तैयार हो गया, लेकिन बरसात का पानी ठहरा। बारिश खत्म होते ही तालाब सूख गया। ग्रामीणों की फिर बैठक हुई। इसमें गांव के सिरहा-गुनियां (तांत्रिकों) ने यह ऐलान कर दिया कि जब तक तालाब में किसी व्यक्ति की बलि नहीं दी जाएगी तालाब में पानी नहीं ठहरेगा। बलि की बात सुन ग्रामीण पीछे हट गए, लेकिन गांव में कुछ ऐसे युवक भी थे जो मिटकी को पाने की लालसा रखते थे। ऐसे युवकों ने मिटकी के भाईयों को भ्रमित किया कि झिटकू तो दूसरे गांव का है। रही बात मिटकी से कोई भी युवक शादी कर लेगा, अगर तुम लोग झिटकू की बलि देते हो तो गांव में तुम्हारा मान बढ़ जाएगा।

मिटकी के भाई स्वार्थी युवकों की बातों में आ गए। एक दिन जब मिटकी के भाई और झिटकू जंगल में मवेशी चरा रहे थे। तब योजना बनाकर मिटकी के भाईयों ने झिटकू को मारने की कोशिश की। झिटकू वहां से जान बचाकर भागा। एक ने कुल्हाड़ी से झिटकू पर वार किया। यह कुल्हाड़ी सुकल के पैर में लगी। बावजूद इसके वह भागता ही रहा। तालाब के पास मिटकी के भाईयों ने झिटकू को दबोच लिया और कुल्हाड़ी से गला काट सिर तालाब में फेंक दिया। इस घटना के बाद तेज बारिश हुईं।

उधर पति का इंतजार कर रही मिटकी परेशान थी। रात को उसने सपना देखा कि तालाब पानी से लबालब भरा है और बीच तालाब में झिटकू खड़ा है। सपने में यह दृश्य देख सुकलदई घबरा गई। वह बिना कुछ सोचे तालाब की तरफ दौड़ पड़ी। तालाब पहुंची मिटकी आश्चर्य में पड़ गई। चूंकि सपने में उसने जो देखा था वह दृश्य प्रत्यक्ष रूप से उसके सामने था। इधर झिटकू ने मिटकी को उनके भाईयों की करतूत बता दी। झिटकू से प्रति अगाध प्रेम करने वाली मिटकी ने भी तालाब में कूद कर अपनी जान दे दी। अगली सुबह जब ग्रामीण तालाब पहुंचे तब मिटकी का शव तैरता मिला।

इस तरह प्रेमी युगल का दुखद अंत हो गया। कुल्हाड़ी लगने के बाद दौड़ते रहने के कारण झिटकू खोड़िया देव और तालाब किनारे बांस की टोकरी छोड़कर मौत को गले लगाने के कारण मिटकी गपादई के नाम से चर्चित हुईं।

ग्रामीण करते हैं पूजा

बस्तर का आदिवासी समाज झिटकू-मिटकी को धन का देवी-देवता मानते हैं। विभिन्न मेला-मंडई में झिटकू-मिटकी की पीतल और लकड़ी से बनी प्रतिमाएं बेचने के लिए लाई जाती हैं। ग्रामीण अपने परिवार की संपन्नता के लिए इन्हें देवगुड़ी में अर्पित करते हैं। इधर बस्तर आने वाले हजारों सैलानी भी इन प्रेमियों की काष्ठ और धातु की मूर्तियां बड़ी आस्था के साथ अपने साथ ले जाते हैं।

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