सतीश चांडक, सुकमा। मेरी कम उम्र में शादी हुई उसके बाद जब बच्चा हुआ तो पति ने साथ छोड़ दिया। ऐसे में बच्चे के साथ अनाथ आश्रम की शरण में चली गई। वहां पर काम-काज कर अपना व बच्चे का पालन करतीं थी। उसके बाद दंतेवाड़ा नारी नितेकन में पहुंची जहां साक्षरता मिशन के तहत कुछ कर पांचवीं पास की और नौकरी लग गई। इस समय वह पलिया में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रही है। जहां सरकारी झोपड़ी में रहकर अपनी सेवाएं आज तक दे रही है। ये कहानी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता महादेवी कश्यप की है जिन्होंने हमारे साथ साझा करते हुए कहती है सारा दुखों का पहाड़ मुझ पर टूटा, लेकिन मेरा हौसला कभी नहीं टूटा और मैने हिम्मत नहीं हारी इसलिए आज मेरा बेटा शिक्षक है और मै भी अच्छा जीवनयापन कर रही हूं।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने बताया कि सन 1997 में जब मेरा बेटा तीन माह का था उस समय पति ने मेरा साथ छोड़ दिया और दूसरी शादी कर ली। ऐसे में मेरे पास कोई विकल्प नहीं था इसलिए में जगदलपुर के एक अनाथ आश्रम में दुधमुंहे बच्चे को लेकर पहुंची। जीवन-यापन के लिए में वहां काम भी करती थी, ताकि मेरे बच्चे का भरण-पोषण कर सकू और कुछ साल रहने के बाद में दंतेवाड़ा स्थित नारी निकेतन पहुंच गई जहां पर मुझे एक मैडम ने कहा था कि धन-दौलत चोरी हो सकता है, लेकिन ज्ञान चोरी नहीं होगा इसलिए मैने वहां पर रह कर साक्षरता मिशन के तहत कुछ पढ़ाई की और मुझे 5वीं पास का प्रमाण पत्र मिला। अप्रैल 1999 को महिला बाल विकास विभाग के एक अधिकारी नारीनिकेतन पहुंचे और कहा कि एक पोस्ट खाली है कोई लड़की है तो बताना तब वहां की मैडम ने मेरा नाम दिया और मुझे सुकमा ब्लाक के पलिया गांव में भेज दिया गया। यहां पर खपरेल वाला एक सरकारी भवन है जहां पिछले 23 साल से आगनबांडी

कार्यकर्ता के रूप में अपनी सेवाऐं दे रही हूं।

नक्सल इलाका और सिर्फ पगडंडी

आज इस इलाके में सड़क का निर्माण हो चुका है। लेकिन जब मेरी पदस्थापना हुई थी उस समय गादीरास से पलिया तक आने के लिए कोई सड़क नहीं थी। सिर्फ पगड़डी और टूटी-फूटी सड़क थी, जिस पर वाहन नहीं चलते थे और पैदल ही जाना पड़ता था। उस सयम यहां पर दिन में भी कोई नहीं आता था क्योंकि नक्सल प्रभावित इलाका था। लेकिन मेरी जरूरत थी और विभाग को काम चाहिए था। इसलिए में यहां आई और परेशानियों का सामना करते हुए यहां के लोगों की सेवा की।

सल्वा जूडूम से नहीं पहनती पैरो में चप्पल

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता महादेवी नाग ने बताया कि जब सल्वा जुडूम की शुरूआत हुई थी उस समय हिंसा का दौर चला था। मैने हमेशा से लोगों के लिए भगवान से प्रार्थना की है। क्योंकि मेरा तो कोई नहीं है, लेकिन लोगों की सेवा करना मेरा धर्म है। इसलिए मेंने 2006 से शांति व खुशहाली की मन्नात मांगते हुए चप्पल नहीं पहने है और आज भी चाहे धूप हो या फिर बारीश मै चप्पल नहीं पहनती हूं। उन्होंने कहा कि मैं सच बोलती हूं इसलिए लोग मुझे पागल बोलते हैं।

आंख में आंसू लिए महादेवी नाग ने बताया कि मैंने जीवन में बहुत कठनाइयों का सामना किया है और हमेशा सच का साथ दिया है और अगर कभी झूठ बोला है तो तत्काल माफी भी मांगी है। चाहे गांव में किसी की समस्या हो या फिर पड़ोसी गांव में शादी कार्यक्रम हमेशा गांव वालों के लिए हर काम में आगे खड़ी रहती हूं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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