नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण के गंभीर हालात के मद्देनजर सोमवार को बहुत ही तीखी टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से दो टूक सवाल किया कि 'क्या यह स्थिति बर्दाश्त की जानी चाहिए? क्या हालात गृह युद्ध से बदतर नहीं हैं? लोग गैस चैंबर में क्यों हैं? यदि ऐसा ही है तो बेहतर है कि विस्फोटकों से उन्हें मार डालें। कैंसर जैसी बीमारियों से पीड़ित होने के बजाय वैसे ही मर जाना बेहतर होगा।"

जस्टिस अरुण मिश्रा तथा जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने इसके साथ ही सभी राज्यों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में इस बाबत जवाब मांगा है कि खराब हवा की वजह से प्रभावित लोगों को मुआवजा दिए जाने के लिए उन्हें क्यों न जिम्मेदार ठहराया जाए? क्योंकि नागरिकों को साफ हवा और पानी उपलब्ध कराना उनका बाध्यकारी कर्त्तव्य है। कोर्ट ने सभी राज्यों को जारी नोटिस में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई), वायु गुणवत्ता प्रबंधन तथा कचरा निपटान का विवरण भी तलब किया है। शीर्ष अदालत ने जल प्रदूषण को भी गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) तथा संबंधित राज्यों और उनके प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से भी गंगा, यमुना समेत अन्य नदियों में प्रदूषण, सीवेज तथा कचरा निपटान के डेटा पेश करने को कहा है।

कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को भी निर्देशित किया कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए दस दिन के भीतर एकसाथ बैठ कर दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में स्मॉग टॉवर्स लगाने का फैसला करें।

जीवन का अधिकार खतरे में

पीठ ने कहा कि खराब हवा-पानी के कारण लोगों के 'जीवन का अधिकार खतरे में" पड़ गया है और राज्यों को इस हालात से निपटने होंगे, क्योंकि इसके कारण जीवनकाल छोटा हो गया है। कोर्ट ने कहा- 'राज्य सरकारों से यह पूछने का समय आ गया है कि उन्हें खराब हवा से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने को क्यों नहीं कहा जाना चाहिए? कर्त्तव्यों के निर्वहन में सरकारी मशीनरी के विफल रहने पर क्यों नहीं उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए?"

आरोप-प्रत्यारोप पर भी नाराजगी

कोर्ट ने वायु एवं जल प्रदूषण जैसे अहम मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच 'आरोप-प्रत्यारोप" पर भी नाराजगी जताते हुए कहा कि लोगों की भलाई के लिए तालमेल से काम करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रदूषण मामले में शीर्ष अदालत द्वारा समय-समय पर आदेश जारी किए जाने के बावजूद सालों-साल स्थिति खराब हुई है और इसके लिए अधिकारियों को दोष दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं किया।

राज्यों के मुख्य सचिवों की खिंचाई

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाए जाने की स्थिति को 'खतरनाक" बताते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रतिबंधों के बावजूद इन राज्यों में पराली जलाने में वृद्धि हुई है। इसके लिए सिर्फ राज्य मशीनरी ही नहीं बल्कि किसान भी जिम्मेदार हैं। कोर्ट ने इस मामले में तीनों राज्यों के मुख्य सचिवों की खिंचाई भी की।

कोर्ट ने कहा- 'क्या आप लोगों से ऐसा व्यवहार करेंगे और प्रदूषण से उन्हें मरने देंगे? लाखों नागरिकों का जीवन काल छोटा हो गया है। दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण से लोगों का दम घुट रहा है।"

कोर्ट ने दिल्ली में असुरक्षित पानी सप्लाई को लेकर पैदा हुए हालिया विवाद का भी स्वत: संज्ञान लिया। सुनवाई के दौरान दिल्ली के मुख्य सचिव भी अदालत में मौजूद थे।

Posted By: Yogendra Sharma

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