प्रेरणा कुमारी

प्रौद्योगिकी और विज्ञान हर दिन बदल रहे हैं, उसी के साथ-साथ युद्धकला और इसके तौर-तरीके भी सुपरफास्ट गति से बदल रहे हैं। आज की लड़ाइयां पहले से कहीं अधिक प्रौद्योगिकी-आधारित और तकनीकी रूप से जटिल हैं। इन नए बदलावों के कारण यह जरूरी है कि हमारे रक्षा बलों की तैनाती और नए लोगों की भर्ती के तौर-तरीकों में भी आमूलचूल बदलाव किए जाएं। आज आधुनिक सेनाओं में बुनियादी शिक्षा के बजाय तकनीकी पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की अधिक जरूरत है।

इसलिए रक्षा बलों की भर्ती प्रक्रिया में क्रांतिकारी सुधार लंबे समय से लंबित थे। हाल ही में 14 जून को घोषित अग्निपथ भर्ती योजना इस दिशा में एक बड़ा कदम है। इस योजना के विवरण अब लोगों के सामने आ चुके हैं। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं तो कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं। देश के कुछ हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन तक हुए हैं। पूर्व सेना अधिकारी भी इस मामले में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। ऐसे में, लाख टके का सवाल यह है कि यह योजना सही दिशा में उठाया गया कदम है या देश के लिए आफत है? इस पूरे मामले में गहन चर्चा जरूरी है।

पहला प्रश्न यह है कि अपने दुश्मनों के मुकाबले अपनी युद्ध श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए हमारी सेना की आदर्श औसत आयु क्या होनी चाहिए। सुरक्षा परिदृश्य लगातार बदल रहा है और प्रौद्योगिकी तेजी से बदल रही है। पहले युद्ध के तौर-तरीकों में सैकड़ों वर्षों में कोई अंतर आता था, परंतु अब कुछ ही वर्षों में युद्ध करने का पूरा ढंग ही बदल जाता है। अब कुछ वर्ष पहले ही सीखे गए कौशल जल्दी ही अप्रचलित, पुराने और युद्ध के लिए अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसे में विश्व भर की सेनाओं को लगातार बड़ी संख्या में ऐसे युवा रंगरूटों की जरूरत रहती है जो नए तकनीकी कौशल में प्रशिक्षित हों और समकालीन ज्ञान रखते हों।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अग्निपथ एक बड़ा कदम है। इससे नए रंगरूटों का एक बड़ा समूह चूंकि प्रत्येक वर्ष रक्षा बलों में शामिल होगा और छोटे कार्यकाल के बाद कार्यमुक्त हो जाएगा, इसलिए हमारी सेना युवा आयु प्रोफ़ाइल बरकरार रख पाएगी। कारगिल युद्ध से यह स्पष्ट है, हमारे मुख्य प्रतिद्वंदियों पाकिस्तान और चीन से अपने दुर्गम इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए हमें युवा और चुस्त-दुरुस्त कार्मिकों की जरूरत है। ऐसे कार्मिक युवा होने के साथ-साथ नई युद्ध पद्धतियों में भी निपुण होने चाहिए।

ऐसी चिंता जताई जा रही है कि युद्ध विशेषज्ञ सैनिक तैयार करने के लिए 4 वर्ष का कार्यकाल बहुत छोटा है। हालांकि आलोचक इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि अग्निवीर रंगरूटों में से एक-चौथाई युवाओं को स्थायी और लंबे कार्यकाल के लिए चयनित किया जाएगा। इस तरह सेना अधिक सक्षम सैनिक नियुक्त कर पाएगी क्योंकि अब उन्हें दो स्तरीय चयन प्रक्रिया से गुजरना होगा।

एक स्तर अग्निवीर चयन के समय और दूसरा अग्निवीर कार्यकाल पूरा होने पर। इसके साथ-साथ 4 वर्ष के कार्यकाल के बाद आम समाज में शामिल होने वाले अग्निवीरों के पास व्यापक सैन्य प्रशिक्षण और अनुभव होगा। इससे राष्ट्र के पास ऐसी आरक्षित सेना भी उपलब्ध रहेगी जिसका आपात स्थितियों में उपयोग किया जा सकता है।

दूसरा, रक्षा मंत्रालय और विभिन्न स्वतंत्र चिंतकों की विभिन्न रिपोर्टों और विश्लेषणों में रक्षा बजट में वेतन-पेंशन की बढ़ती लागत को प्रमुख चिंता के रूप में उजागर किया गया है। भारत के रक्षा बजट में वेतन-पेंशन पर खर्च लगातार बढ़ते हुए देश के रक्षा बजट का लगभग 60 प्रतिशत हो गया है। ऐसा माना जाता है कि वेतन-पेंशन लागत में इस तीव्र वृद्धि से रक्षा आधुनिकीकरण के साथ-साथ हमारी युद्ध तत्परता भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि इससे प्रचालन रखरखाव के लिए बजट आवंटन लगातार कम हो रहा है।

जरूरत इस बात की है कि जैसे-जैसे युद्ध संपर्क रहित और हाइब्रिड होते जा रहे हैं, आधुनिकीकरण और नए हथियार खरीदने के लिए व्यय को बढ़ाया जाए। अग्निपथ योजना से इस संकट का समझदारी से हल निकाला गया है। इसमें सेना की संस्थागत जरूरतों और भर्ती होने वाले सैनिकों के व्यक्तिगत कल्याण के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया है।

अग्निपथ योजना में कार्यस्थल प्रशिक्षण और कौशल विकास को फोकस क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है। इसके अलावा, अग्निवीरों के लिए विभिन्न घोषित उपायों से यह सुनिश्चित होगा कि सेना से बाहर निकलने वाले अग्निवीर सेवानिधि के माध्यम से वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर हों और सरकारी एवं निजी क्षेत्र में विभिन्न नौकरियों में जाने के लिए शैक्षणिक और व्यावसायिक रूप से योग्य हैं।

अंततः, क्या भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जो सैन्य बलों के लिए इस छोटे कार्यकाल की अवधि को अपना रहा है। वैश्विक परिदृश्य क्या है? तथ्य यह है कि हम यह व्यवस्था अपनाने वाले पहले देश या अग्रणी नहीं हैं। ऐसी भर्ती प्रक्रिया विश्व की प्रमुख सेनाओं में पहले से ही प्रचलित है।

अमेरिका, रूस, इज़राइल, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और चीन जैसे देशों में सेना भर्ती के कमोबेश ऐसे ही मॉडल प्रभावी हैं। सरकार ने भी इस योजना को शुरू करने से पहले इन मॉडलों का अध्ययन किया है। विस्तृत अध्ययनों के बाद ही इस योजना को अंतिम रूप दिया गया है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार और सेना मिलकर इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने पर भी ध्यान दें।

प्रेरणा कुमारी डीआरडीओ में कार्यरत रह चुकी हैं। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन एवं अनुवाद में सक्रिय हैं।

Posted By: Navodit Saktawat

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