गत वर्ष नवंबर में संपन्न अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव कई मायनों में अप्रत्याशित रहा। कोरोना कालखंड में चुनाव होने के कारण बड़े पैमाने पर पोस्टल वोटिंग हुई। पोस्टल वोटिंग के साथ मतदान के पुराने रिकॉर्ड टूट गए। इस बंपर वोटिंग वाले चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन अनाधिकारिक रूप से विजयी घोषित किए गए, लेकिन राष्ट्रपति और रिपब्लिकिन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप अपनी हार मानने के लिए तैयार नहीं हुए। वह चुनाव नतीजों की अनदेखी कर अपनी जीत का दावा करने लगे। ट्रंप के रूप में 24 साल बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हारा । हालांकि ट्रंप को 2016 की तुलना में ज्यादा वोट मिले, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में पिछड़ने के कारण वह हार गए। जो बाइडन ने मतों की संख्या के मामले ट्रंप से बाजी मार ली, फिर भी ट्रंप अपनी जीत की रट लगाए रहे। राष्ट्रपति ट्रंप की चुनावी टीम ने तमाम कानूनी दांवपेचों का सहारा लिया, लेकिन एकाध मामलों को छोड़कर न्यायपालिका से भी उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद भी वह अपनी जीत का राग अलापते रहे। इस दावे के चलते चुनाव बाद अमेरिकी समाज का विभाजन कम होने के बजाय और बढ़ता दिखा। ध्यान रहे कि ट्रंप पर यह आरोप पहले से लग रहा था कि उन्होंने अमेरिकी समाज को बांटने का काम किया है। ये आरोप तब और मुखर हुए जब अश्वेत लोग पुलिस हिंसा के खिलाफ सड़कों पर उतरे। ऐसे आरोपों और ट्रंप के हार न मानने के बाद भी वैसा कुछ होने की उम्मीद शायद ही किसी को रही हो, जैसा छह जनवरी को कैपिटल बिल्डिंग यानी अमेरिकी संसद के समक्ष और उसके भीतर हुआ। इस दिन जब चुनाव परिणाम को औपचारिक तौर पर मान्यता देने के लिए अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी प्रतिनिधि सभा और सीनेट की संयुक्त बैठक हो रही थी, तब बड़ी संख्या में ट्रंप समर्थक संसद परिसर में घुस आए। कहा जाता है कि इसके लिए ट्रंप ने उन्हें उकसाया। सच्चाई जो भी हो, ट्रंप के उग्र समर्थकों ने संसद के भीतर जमकर तोड़फोड़ की। इसके चलते अमेरिकी संसद के इस अति महत्वपूर्ण संयुक्त सत्र का कामकाज बाधित हुआ। ऐसा अमेरिका में पहले कभी नहीं हुआ।

संसद में हुई हिंसा से अमेरिका को शर्मसार होना पड़ा है। इस हिंसा में कई लोग मारे गए और तमाम घायल हुए। इस हिंसा की विश्वव्यापी आलोचना हुई। प्रधानमंत्री मोदी समेत तमाम लोकतांत्रिक देशों के नेताओं ने इसकी कटु आलोचना की और शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता हस्तांतरण को लोकतंत्र का अनिवार्य अंग बताया। अच्छी बात यह रही कि तमाम उपद्रव के बीच उपराष्ट्रपति माइक पेंस ट्रंप के दबाव के बावजूद अपने संवैधनिक दायित्व के प्रति गंभीर रहे। यह भी अच्छा हुआ कि तमाम अराजकता के बाद संसद ने चुनाव परिणाम पर मुहर लगाई। संसद में व्यापक हिंसा के बाद शायद ट्रंप को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के लिए हामी भरी। हालांकि वह चुनावी धांधली के अपने आरोप पर कायम रहे, लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों से घर वापस जाने और शांति बहाल करने की अपील की। इसके बाद भी वह लांछित होने से बच नहीं सकते। आमतौर पर तीसरी दुनिया के देशों में सत्ता हस्तांरण काफी चुनौतीपूर्ण रहता है, परंतु अमेरिका जैसे देश में ऐसा होना हैरान भी करता है और परेशान भी। यहां 1776 से लोकतंत्र न सिर्फ कायम है, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर एक आदर्श के तौर पर देखा जाता है। इसी कारण दुनिया के तमाम विश्वविद्यालयों में अमेरिकी संविधान पढ़ाया जाता है। अमेरिकी संविधान में चुनावी मामले परंपरा पर छोड़े गए हैं, लेकिन एक पुराने और आदर्श माने जाने वाले लोकतंत्र में यही उम्मीद की जाती है कि वहां परंपराओं का पालन करने और उनके प्रति सम्मान दर्शाने में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। अमेरिकी संसद में हुई हिंसा यही रेखांकित करती है कि अमेरिकी संविधान में अब चुनाव प्रणाली के तौर-तरीकों को अच्छी तरह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

वैश्विक राजनीति में अमेरिका का एक खास स्थान है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका का पूरी दुनिया में वर्चस्व बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय मामलों के साथ सिनेमा, मीडिया, खेल से लेकर वैज्ञानिक आविष्कारों में भी अमेरिका पिछले कई दशकों में सच्चे अर्थों में अग्रणी रहा है। पिछले कुछ वर्षों से चीन द्वारा अमेरिका को कई मोर्चे पर गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। स्पष्ट है कि बाइडेन प्रशासन को अमेरिकी लोकतंत्र को पुष्ट करने के साथ चीन की चुनौती का भी सामना करना होगा। चूंकि अमेरिकी संसद में हुई हिंसा ने अमेरिकी समाज में व्याप्त भेदभाव के साथ ही राजनीतिक असमानताओं को भी रेखांकित किया है, इसलिए बाइडन प्रशासन की चुनौतियां और बढ़ जाती हैं।

लोकतंत्र की दृष्टि से अमेरिका जैसे सबसे सशक्त माने जाने वाले देश में सत्ता हस्तांतरण में जैसी चुनौती पेश आई वह हतप्रभ करने वाली घटना है। अमेरिका के मुकाबले भारत का लोकतंत्र अपेक्षाकृत काफी नया है, लेकिन यदि आपातकाल के छोटे से दौर को छोड़ दिया जाए तो यहां सत्ता हस्तांतरण में कहीं कोई अड़चन नहीं आई। इसी कारण भारतीय लोकतंत्र दुनिया के समक्ष एक उदाहरण पेश करता है। अब इसमें कोई संदेह नहीं कि जो बाइडन 20 जनवरी को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं, लेकिन यह साफ है कि गत दिवस की घटना ने यह स्पष्ट किया है कि उनकी चुनौतियां और बढ़ गई हैं। उनकी पहली चुनौती तो यही है कि वह धड़ों में बंटे अपने समाज को अमेरिका की गौरवमयी परंपराओं के अनुरूप ढालें। यह काम तभी संभव होगा जब बाइडन प्रशासन एक आदर्श माहौल कायम करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। चूंकि गत दिवस की हिंसा ने अमेरिकी लोकतंत्र की कमियों को गहराई से उजागर कर दिया है इसलिए बाइडन प्रशासन को कोरोना-कालीन वैश्विक चुनौतियों के साथ ही इस गंभीर चुनौती का भी प्राथमिकता के आधार पर सामना करना होगा। उन्हें वास्तव में समावेशी प्रशासन चलाना होगा। अमेरिकी समाज के बीच की खाई पाटने के लिए यह भी आवश्यक है कि दोनों प्रमुख दल डेमोक्रेट और रिपब्लिकन एक-दूसरे के प्रति तल्खी कम करें। ये दोनों दल यह स्मरण रखें तो बेहतर कि संसद में जो कुछ हुआ उसे लेकर तानाशाही व्यवस्था वाले चीन के साथ उन देशों ने भी उस पर तंज कसे, जो लोकतंत्र को कोई सम्मान नहीं देते।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।)

Posted By: Arvind Dubey

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