बिहार विधानसभा चुनाव में राजग को मिली जीत ने भाजपा की दीवाली और खुशमय कर दी है। बिहार के अलावा मध्य प्रदेश के उपचुनावों में भी उसकी जीत ने शिवराज सरकार के साथ-साथ पार्टी नेतृत्व को भी एक बड़ी राहत दी। बिहार विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश उपचुनावों के साथ उत्तर प्रदेश, गुजरात, कनार्टक आदि में भाजपा को मिली जीत यह बता रही है कि लोगों का मोदी पर भरोसा कायम है और उनकी जनहितैषी नेता की छवि के आगे विपक्षी नेता नाकाम हैं। इस जीत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोविड महामारी के चलते उपजे विषम आॢथक हालात के लिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर जो तमाम आरोप मढ़े, उन पर मतदाताओं ने यकीन नहीं किया। वैसे जब बिहार चुनावों की घोषणा हुई थी, तब यह माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी के प्रति जनता के भरोसे और नीतीश सरकार के कामकाज के चलते राजग आसानी से जीत हासिल कर लेगा, लेकिन ऐसा मुश्किल से हुआ। लोजपा नेता चिराग पासवान अकेले चुनाव लडऩे और नीतीश को सबक सिखाने पर अड़ गए। उन्होंने राजग से अलग होकर चुनाव लड़कर न केवल अपनी राजनीतिक नैया डुबोई, बल्कि जदयू को भी खासा नुकसान पहुंचाया। बिहार की राजनीति में अपनी अलग धाक जमाने के चक्कर में वह नीतीश के खिलाफ तीखी टिप्पणियां भी करते रहे। उनकी सियासी सनक खुद उनके साथ-साथ राजग पर भी भारी पड़ी। वंशवादी राजनीति के प्रतीक चिराग अपना कोई खास राजनीतिक वजूद न होने के बाद भी चुनावी मैदान में इस तरह अकेले कूदे, मानों वह बिहार के दिग्गज नेता हों। उनके पिता रामविलास पासवान बिहार में दलित समुदाय में अपना एक रसूख रखते थे। उन्होंने जदयू-भाजपा का साथ इसीलिए पकड़ा था, क्योंकि वह यह समझ गए थे कि अपने बलबूते ज्यादा कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। चिराग ने इस सच्चाई की अनदेखी की। उन्होंने खास तौर पर जदयू प्रत्याशियों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे। इस कारण जदयू को कम से कम 25-30 सीटें गंवानी पड़ी। वह खुद एक सीट ही हासिल कर पाए। अगर वह राजग के साथ रहते तो न केवल अच्छी-खासी सीटें पाते, बल्कि राजग की जीत का आंकड़ा भी 150 सीटों के ऊपर निकल जाता।

चिराग के विद्रोही तेवरों के चलते राजद को उम्मीद की किरण दिखी। तेजस्वी यादव ने चिराग के विद्रोह को खूब भुनाया। हालांकि वह सत्ता में नहीं आ सके, लेकिन उन्होंने जदयू-भाजपा को कड़ी टक्कर दी। चूंकि राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, इसलिए तेजस्वी को उभरते सितारे के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने परिपक्व राजनीति का परिचय दिया। हालांकि वह भी वंशवादी राजनीति के प्रतीक हैं, लेकिन उन्होंने अपने दम पर राजद को लड़ाई में ला दिया। यदि वह इसी तरह परिपक्वता दिखाते रहे तो राजनीति में अपनी छाप छोड़ सकते हैं। अगर तेजस्वी ने कांग्रेस के दबाव में आकर उसे 70 सीटें नहीं दी होतीं तो शायद आज कहानी कुछ और होती। कांग्रेस इन 70 में से 19 सीटें ही जीत सकी। तेजस्वी को पता था कि वह अपने पिता लालू यादव का सहारा लेकर चुनाव नहीं जीत सकते, लिहाजा उन्होंने उनके शासनकाल का जिक्र नहीं किया। इतना ही नहीं, उन्हेंं पार्टी के तमाम बैनर, पोस्टर में भी नहीं दिखाया। उन्होंने दस लाख नौकरियों का वादा करके भी एक हलचल पैदा की। इसी कारण उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही थी। उन्होंने राजग को कितनी कड़ी टक्कर दी, यह इससे समझा जा सकता है कि महागठबंधन बहुमत से कुछ ही पीछे रहा। पराजय के बाद उन्हेंं चाहिए कि वह चुनाव आयोग को बेवजह निशाना बनाने के बजाय राजनीतिक परिपक्वता दिखाएं और विपक्ष के नेता के रूप में नीतीश सरकार को सकारामक सहयोग दें।

नीतिश कुमार ने आज से 15 वर्ष पहले जब बिहार की सत्ता संभाली थी तो उन्हें सुशासन बाबू का तमगा मिला। उस समय के मुकाबले आज बिहार की स्थिति बदली हुई दिखाई दे रही है तो नीतीश कुमार के शासन के कारण। वह कुछ समय के लिए राजद के साथ गए, लेकिन जल्द ही उन्हेंं अपनी गलती का अहसास हो गया और वह फिर भाजपा के साथ आ गए। इससे उन्हेंं बिहार का विकास करने में आसानी हुई। किसी भी नेता के लिए लगातार जीत हासिल करते हुए चौथी बार मुख्यमंत्री बनना उसकी काबिलियत का ही परिचायक है। जो चुनावी पंडित नीतिश कुमार को सत्ता विरोधी लहर के कारण कमजोर मान रहे थे, उन्हेंं देखना चाहिए कि ऐसी कोई लहर प्रभावी नहीं साबित हुई तो नीतीश सरकार के काम के कारण भी। 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी नीतीश पर कोई गंभीर आरोप नहीं लगा है। उन्हेंं इसके लिए भी जाना जाता है कि उन्होंने वंशवादी राजनीति को प्रश्रय नहीं दिया। उन्हेंं तो चिराग की राजनीतिक सनक के कारण नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा और खुद मोदी ने मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार की दावेदारी पर मुहर लगाकर अपने सहयोगी दलों को यही संदेश दिया है कि उसे गठबंधन धर्म का निर्वाह करना आता है। यह संदेश इसलिए आवश्यक था, क्योंकि विपक्ष यह प्रचार करता रहता है कि राजग में भाजपा के आगे घटक दल बौने साबित हो रहे हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों के उपचुनाव में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई, उससे वह एक बार फिर कमजोर दल के रूप में सामने आई। बिहार में राहुल गांधी ने चार-पांच सभाएं ही कीं और सोनिया गांधी एवं प्रियंका गांधी तो वहां गईं ही नहीं। कांग्रेस के अन्य स्टार प्रचारक वहां अपना प्रभाव छोडने में असफल रहे। राहुल ने अपनी रैलियों में वही घिसे-पिटे और बेतुके आरोप लगाए। शायद वह समझ गए थे कि बिहार में कांग्रेस की दाल नहीं गलने वाली और इसी कारण आखिरी के दो चरणों में वह प्रचार के लिए गए ही नहीं। बिहार की हार के बाद कांग्रेस में आत्ममंथन को लेकर कुछ स्वर अवश्य उठे हैं, लेकिन लगता नहीं कि गांधी परिवार के चाटुकार ऐसा कुछ होने देंगे। वास्तव में यदि इन चाटुकारों की चली तो वे देश की इस सबसे पुरानी पार्टी का भविष्य दांव पर लगा देंगे। चाटुकारों से घिरा कांग्रेस नेतृत्व खुद को बदलने से इन्कार ही नहीं कर रहा है, वह यह जानते हुए भी पार्टी की कमान फिर राहुल गांधी को देने की हर संभव कोशिश कर रहा है कि वह चुनाव दर चुनाव नाकाम हो रहे हैं। इसी रवैये के कारण इसके आसार नहीं कि कांग्रेस हार के कारणों पर सचमुच आत्ममंथन करेगी।

Posted By: Arvind Dubey

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