जब पूरा देश दीवाली मनाने की तैयारी कर रहा था, तब नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान द्वारा की गई फायरिंग में पांच जवानों और चार नागरिकों की जान चली गई। भारतीय सेना की ओर से भी इस फायरिंग का मुंहतोड़ जवाब दिया गया और पाकिस्तान को इससे काफी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। दीवाली पर पाकिस्तान द्वारा फायरिंग लगभग हर वर्ष की जाती है। यह पाकिस्तानी फौज की जिहादी विचारधारा का परिचायक है। अपनी जिहादी सोच के तहत ही पाकिस्तानी सेना सीमा पर फायरिंग कर अपनी भड़ास निकालने का प्रयत्न करती है और उत्सव को शोक के अवसर में बदलने की कुचेष्टा करती है। ध्यान रहे कि कुछ साल पहले तक पाकिस्तानी फौज दीवाली जैसे त्योहारों पर जिहादी संगठनों के जरिये आतंकी हमले कराया करती थी, जिसमें खरीदारी कर रहे लोगों को निशाना बनाया जाता था। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल्स पर लगातार प्रहार के चलते पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान के लिए इस प्रकार के आतंकी हमले करा पाना संभव नहीं रह गया है। ऐसे में उसके पास दीवाली की पूर्व संध्या पर सीमा पर भारतीय सुरक्षा बलों और नागरिकों पर हमला करना ही एकमात्र विकल्प रह गया है। यह दिखाता है कि भारत द्वारा पाकिस्तान समर्थित आतंकी हमलों के जवाब में की गई सैन्य कार्रवाई से पाकिस्तान सहमा तो अवश्य है, पर उसकी मूल प्रवृत्ति अभी भी वही है।

अगर पाकिस्तान के आर्थिक हालात इतने खराब न होते, एफएटीएफ की काली सूची में डाले जाने का खतरा उसके सिर पर न मंडरा रहा होता और घरेलू मोर्चे पर भयानक राजनीतिक अस्थिरता न होती तो पाकिस्तान वही कर रहा होता, जो वह सदा से करता आया है। यह भी मान कर चलना चाहिए कि पाकिस्तान को बस जरा-सी सांस लेने के लिए अवसर का ही इंतजार है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान समर्थित आतंकी हमलों के बाद भारत की जवाबी सैन्य कारवाई का समर्थक रहा था। पुलवामा हमले के बाद तो ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि भारत को जवाबी हमला करने से रोकना संभव नहीं है। अब अमेरिका में राजनीतिक उठापटक के बीच जो बाइडन की संभावित जीत से पाकिस्तान को लगता है कि न सिर्फ उस पर अमेरिकी दबाव कम होगा, बल्कि उसके आका देश चीन पर भी बाइडन ट्रंप की अपेक्षा नरम रहेंगे। फिलहाल सीमा पर पाकिस्तान द्वारा की जा रही फायरिंग का एक उद्देश्य चीन के इशारे पर भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करना भी है। अप्रैल से पूर्वी लद्दाख के कई क्षेत्रों में जमी चीनी सेना गलवन की घटना के बाद से शह-मात के खेल में फंस चुकी है। अगस्त के आखिर में भारतीय सेना द्वारा पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर 19 किमी की लंबाई में कैलाश पर्वत श्रृंखला की सामरिक चोटियों को कब्जे में लिए जाने से सैन्य स्तर पर चीन की बड़ी किरकिरी हुई है। वैश्विक स्तर पर पहला संदेश यह गया है कि कोई देश है, जो चीन की दादागीरी से डरने के बजाय डटकर खड़ा है। दूसरा बड़ा संदेश यह भी गया कि एशिया में चीन अजेय ही रहेगा, ऐसा नहीं है।ये घटनाक्रम चीन के लिए तो चिंताजनक हैं ही, पूरी तरह उस पर निर्भर पाकिस्तान के लिए भी कहीं अधिक चिंताजनक हैं।

पाकिस्तानियों को सदा से आशा रही है कि भारत से सैन्य टकराव की स्थिति में चीन उनकी मदद को आगे आएगा, पर फिलहाल की स्थिति ऐसी बन चुकी है कि चीन ही उम्मीद कर रहा है कि लद्दाख की हाथ-पैर गला देने वाली ठंड में फंसी उसकी सेना को राहत देने के लिए पाकिस्तान कुछ कदम उठाए। इस परिस्थिति का प्रभाव पाकिस्तान द्वारा सीमा पर की जा रही भीषण गोलाबारी और भारत से युद्ध की स्थिति में गिलगिट-बाल्टिस्तान में स्कार्दू जैसे अपने वायुसैनिक ठिकानों को चीन को देने की चर्चाओं के तौर पर देखा जा सकता है। इसका भूराजनीतिक प्रभाव यह है कि चीन के इशारे पर पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर से गिलगिट-बाल्टिस्तान को अलग कर उसे अलग प्रांत के तौर पर सीधा पाकिस्तान का भाग बनाने के प्रयास में है। चर्चाएं ऐसी भी हैं कि इस बीच चीन पूर्वी लद्दाख में फंसी अपनी सेना को सम्मानजनक तरह से निकालने का कूटनीतिक रास्ता तलाशने में लगा है, पर पाकिस्तान द्वारा जारी हरकतों और खुद चीन के पिछले व्यवहार को ध्यान में रखें तो यह कितना स्थायी होने वाला है, इसको लेकर आशंकाएं बनी रहेंगी। भारत सरकार भी इस दोहरे खतरे को लेकर सजग है। यह प्रधानमंत्री मोदी के दीवाली के मौके पर लोंगेवाला पोस्ट पर भारतीय सैनिकों के बीच दिए गए भाषण से स्पष्ट है, जिसमें उन्होंने आतंकवाद के समर्थकों को घर में घुसकर मारे जाने की चेतावनी देने के साथ ही विस्तारवादी ताकतों को भी चेताया।

आगे क्या होगा, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अमेरिका में चल रही राजनीतिक उठापठक की क्या परिणिति होती है? अमेरिका के आंतरिक हालात दो सूरत में पाकिस्तान और चीन के मददगार साबित हो सकते हैं । पहली यह कि ट्रंप और बाइडन समर्थकों में हिंसक झड़पें होने लगें, जिससे अमेरिका का ध्यान बाहरी मुद्दों से हट जाए या फिर बाइडन प्रशासन सत्ता में आने के बाद चीन के प्रति नरम रुख अपनाने के साथ ही पाकिस्तान को भी अफगानिस्तान में अपने अनुसार कोई हल निकालने के लिए बड़ी ढील दे दे। ऐसी सूरत में पाकिस्तान कोई न कोई दुष्टतापूर्ण कृत्य करने का प्रयास अवश्य करेगा। पुलवामा हमले के बाद भारत की सैन्य कार्रवाई ने किस तरह पाकिस्तान के शासनतंत्र को झकझोर कर रख दिया था, इसकी कहानी हाल में पाकिस्तान की संसद में पाकिस्तानी नेता बयान कर चुके हैं। पाकिस्तान द्वारा सीमा पर की जा रही गोलाबारी, चीन के साथ उसकी जुगलबंदी और बालाकोट के बाद पाकिस्तान के कांपते पैरों को अगर एक परिप्रेक्ष्य में देखें तो दोबारा ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर भारत को अपनी सैन्य कारवाई को और व्यापक बनाने के विषय में सोचना चाहिए। बालाकोट जैसी कार्रवाई की सूरत में पाकिस्तान ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकता है, यह स्पष्ट हो चुका है। पाकिस्तान की परमाणु धमकियां खोखली साबित हो चुकी हैं। साफ है कि सैन्य कार्रवाई के दबाव में अगर पाकिस्तानी प्रवृत्ति नहीं, तो कम से कम व्यवहार तो बदला ही जा सकता है।

(लेखक कांउसिल फॉर स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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