डॉ. एके वर्मा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर बिहार चुनावों में चीन द्वारा गलवन घाटी में की गई घुसपैठ और भारतीय सैनिकों के बलिदान का प्रश्न उठाया। वास्तव में वह एक अर्से से ऐसा ही कर रहे हैं। उन्होंने बिहार में एक चुनावी सभा में पूछा, प्रधानमंत्री मोदी क्या कर रहे थे, जब हमारे सैनिक अपने प्राण गंवा रहे थे? प्रधानमंत्री ने झूठ बोला कि चीन ने हमारे क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया है। यह कैसा प्रश्न है? यह कैसा आरोप है? अचानक घटी परिस्थितियों में जो करना होता है, सेना वह करती है। गलवन घाटी में जो संभव था, वह हमारी सेना ने किया। अब तो विश्वविदित है कि हमारे बहादुर सैनिकों ने चीनी सेना को मुंहतोड़ जवाब देते हुए उसके कहीं ज्यादा जवानों को काल-कवलित किया। सवाल यह है कि ऐसी परिस्थिति में खुद राहुल गांधी क्या करते? पिछले दिनों हरियाणा में एक सभा में उन्होंने कहा था कि वह होते तो गलवन घाटी से चीनी सैनिकों को 15 मिनट में भगा देते। कितना हास्यास्पद है यह। शायद उन्हें ज्ञात नहीं कि 1962 में जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे, तब चीन ने क्या किया था? तब देश के 3250 सैनिक शहीद हुए थे और चीन ने अक्साई चिन में भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली थी। कितना शर्मनाक था वह? फिर 1971 में बांग्लादेश युद्ध में जब भारतीय सेना के सामने पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया तब राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी के पास बदले में गुलाम कश्मीर वापस लेने का सुनहरा अवसर था, लेकिन यह रहस्य ही है कि वह उस पर मौन क्यों रहीं? अब अगर राहुल गांधी स्वयं को नेहरू और इंदिरा से ज्यादा योग्य समझते हैं तो अलग बात है।

बिहार या किसी अन्य चुनाव में गलवन घाटी की घटना, चीन, पाकिस्तान के रवैये, सेना और प्रतिरक्षा जैसे विषयों को मुद्दा बनाने के पूर्व सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को सोचना चाहिए कि ये सब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हैं, जिनका दलीय राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। इन मुद्दों पर देश में आम सहमति रही है। राहुल गांधी को इन मुद्दों पर तो सरकार के साथ खड़ा दिखना चाहिए, चाहे उनके प्रधानमंत्री मोदी से कितने ही मतभेद क्यों न हों। उन्हेंं इन मसलों को चुनावी राजनीति में नहीं घसीटना चाहिए। राहुल ने 2019 के लोकसभा चुनावों में राफेल सौदे और सर्जिकल स्ट्राइक को मुद्दा बनाया था, जिसके लिए जनता ने मोदी और भाजपा को तीन सौ से ज्यादा सीटें देकर उनकी पार्टी को दंडित किया। यह भी साफ दिख रहा है कि राहुल गांधी की भाषा भी लगातार असंयत होती जा रही है और वह प्रधानमंत्री के लिए प्राय: चोर डरपोक, झूठा आदि अपशब्दों का प्रयोग बिना किसी संकोच करते हैं जिससे उनकी स्वयं अपनी और पार्टी, दोनों की छवि धूमिल होती है। लोकतंत्र का ऐसा दुरुपयोग नहीं करना चाहिए कि शत्रु-देशों को उसका लाभ मिले और पार्टी या फिर नेता चीन या पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई दें। चुनावों में विरोध की लक्ष्मण रेखा को पहचानना एक योग्य नेतृत्व और राष्ट्रीय दल की अपरिहार्य शर्त है।

क्या कांग्र्रेस के पास गंभीर राजनीतिक, आॢथक और सामाजिक मुद्दों का अकाल पड़ गया है, जो उसे चीन और पाकिस्तान को बीच में लाने की जरूरत पड़ जाती है-और वह भी सरकार को नीचा दिखाने के लिए? किसी सरकार की अनेक कमजोरियां होती हैं और उसकी नीतियों में सुधार की तमाम संभावनाएं होती हैं। क्या कांग्र्रेस के पास उन कमजोरियों को चिन्हित करने, उन्हें गंभीरता से उठाने और उन पर सरकार से जवाब मांगने की योग्यता समाप्त हो गई है? क्या बिहार चुनावों में राहुल गांधी को बिहार सरकार, उसके 15 साल के काम का हिसाब और प्रत्येक समस्या पर वैकल्पिक कांग्र्रेस मॉडल प्रस्तुत करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? चुनाव बिहार के हों और आक्रमण केंद्र की मोदी सरकार पर हो, यह तो एक गंभीर रणनीतिक गलती है। यह यही इंगित करती है कि राहुल गांधी को लोकतांत्रिक संघीय व्यवस्था में राजनीतिक स्पर्धा के स्वरूप की कहीं कोई समझ ही नहीं है। राहुल गांधी की नासमझी का दुष्परिणाम कांग्र्रेस को भुगतना पड़ रहा है। उसके योग्य और युवा नेता अंदर ही अंदर खीझते रहते हैं और उसके चलते कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया विद्रोह करते हैं और कभी सचिन पायलट। जहां सिंधिया की बगावत से मध्य प्रदेश की कांग्र्रेस सरकार गिर गई, वहीं राजस्थान की सरकार गिरते-गिरते बची।

यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि राहुल गांधी के बचकाने बयानों से पार्टी के अनेक लोगों के स्वार्थ सिद्ध होते हैं, जो दलीय व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे हैं और पार्टी के सत्तासीन होने पर अनुचित लाभ लेते हैं। शत्रु देश की सरकारों, सेना और जासूसी संस्थाओं को भी ऐसे नेता और राजनीतिक दल बहुत पसंद होते हैं, क्योंकि वे आसानी से उनके मोहरे बन जाते हैं। इसीलिए पाकिस्तानी नेता राहुल के अनेक ट्वीट प्राय: रीट्वीट करते हैं। इससे देश की जनता के मन में राहुल और कांग्र्रेस के प्रति शंका उत्पन्न होती है। उसे लगता है कि कहीं चीन और पाकिस्तान राहुल और कांग्रेस के कंधों पर बंदूक रखकर तो नहीं चला रहे? जनमानस की ऐसी धारणा पार्टी के लिए बहुत नुकसानदायक साबित होती है।

कांग्र्रेस के सामने इस समय नेतृत्व, विचारधारा, संगठन, राज्यों में बिखराव और अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को लेकर अनेक संकट हैं। यह भी स्पष्ट है कि कांग्र्रेस अगले एक दशक तक राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर कोई उल्लेखनीय चुनावी प्रदर्शन नहीं करने वाली। ऐसे में कांग्र्रेस के लिए यह बेहतर समय है जब उसे मोदी पर अनावश्यक प्रहार करने और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की सरपरस्ती में काम करने के बजाय अपनी कमजोरियों को दूर करने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए। यह किसी से छिपा नहीं कि चुनाव दर चुनाव कांग्र्रेस की स्थिति राज्यों में दोयम दर्जे की होती जा रही है और यदि यह सिलसिला नहीं रुका तो कांग्रेस के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। बिहार के बाद आगे बंगाल, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। राहुल गांधी और कांग्र्रेस को चीन और पाकिस्तान की छोड़कर, गंभीर सामाजिक समस्याओं पर पार्टी के रुख और उनके समाधानों के साथ जनता की अंगुली पकडऩी चाहिए।

( लेखक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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