मंदिर भारतीय आस्तिकता की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। यह दिव्य शक्तियों को आकाश से धरती पर बसाने की आध्यात्मिक अभिलाषा है। मंदिर भारतीय मन के शिखर कलश हैं। भारत के लोग दुनिया में जहां-जहां पहुंचे, वहां-वहां मंदिर हैं। मेले हैं, मिलन केंद्र हैं। भारत में लाखों मंदिर हैं। करोड़ों श्रद्धालु उनके दर्शन से आश्वस्ति पाते हैं। भारत विभाजन के पहले आज के पाकिस्तानी भूभाग में भी सहस्त्रों मंदिर थे। पाकिस्तान बनने के बाद हिंदू वहां अल्पसंख्यक हो गये। उन्हें अपनी संस्कृति और परंपरा के अनुसार जीवनयापन का अधिकार नहीं हैं। ऑल पाकिस्तान हिंदू अधिकार आंदोलन के सर्वेक्षण के अनुसार 428 प्रमुख हिंदू मंदिरों में से 20 ही शेष बचे हैं। 1992 में लगभग एक हजार मंदिरों पर हमला हुआ। 2014 में लरकाना के मंदिर पर और 2019 में भी मंदिरों पर हमले हुए। पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर नाराजगी व्यक्त की थी। कुछ दिन पूर्व ही पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के करक जिले के मंदिर तोड़ा गया। आगजनी हुई। जानकारी के अनुसार एक मौलाना मोहम्मद शरीफ ने मंदिर गिराने की अपील की और कहा कि 'हिंदू उपासना स्थल गिराया जाना पवित्र कर्तव्य है।Ó मौलाना पाकिस्तान के जमायत उलेमा इस्लाम फजल संगठन के नेता हैं। इस वारदात से दुनिया के करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं।

भारत ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया है। पाकिस्तान को याद दिलाया कि यह घटना पहली नहीं है। मंदिरों पर आघात और हिंदुओं को आहत करने वाली मानसिकता बहुत पुरानी है। तालिबान ने बामियान में महात्मा बुद्ध की मूर्तियां तोड़ी थीं। तब तालिबानी मुखिया मुल्ला उमर ने अपनी मजहबी कïट्टरता को स्पष्ट करते हुए कहा था कि असली इबादत सिर्फ अल्लाह की होती है, इसलिए गैर इस्लामी इबादतगाहों को तोड़ दिया जाना चाहिए। 13वीं सदी में चंगेज खां और तैमूर लंग ने भी इसी तर्क के साथ मूॢत भंजक कार्यक्रम चलाए थे। महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर पर धावा बोला था। महमूद के इतिहासकार उतवी ने 'तारीखे यामिनीÓ में लिखा 'नदी का रंग काफिरों के खून से लाल हो गया।Ó मथुरा की लूट का वर्णन करते हुए वही इतिहासकार लिखते हैं कि सुल्तान ने हुक्म दिया कि सभी मंदिरों को आग लगाओ। उतवी के अनुसार 'कन्नौज के आसपास सैकड़ों मंदिर थे। हमलावरों द्वारा मूर्तियों का किया गया हाल देखकर नगरवासी भाग निकले।Ó कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1196 में गुजरात और 1202 में कालिंजर लूटा। मंदिर गिराए गए। हिंदू सबका निशाना थे और मंदिर ध्वस्त करना सबका लक्ष्य। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को भी गिराया गया था। अयोध्या और काशी के कृत्य सारी दुनिया जानती है। दिल्ली में कई मंदिरों को तोड़कर कूवतुल इस्लाम नाम की मस्जिद बनाई गई। उत्तर भारत में मध्यकाल के पहले के मंदिर साबुत नहीं मिलते हैं।

भारत और पाकिस्तान के हजारों मंदिरों का ध्वंस मूर्ति-मंदिर भंजक मानसिकता का ही परिणाम है। संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय चार्टर में अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति के पालन का अधिकार दिया है। पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। पाकिस्तान के अल्पसंख्यक विशेषकर हिंदू उत्पीडऩ और धर्मांतरण के शिकार हैं। वे अपने घर में भी उत्सव नहीं कर सकते। उनकी लड़कियां सड़क के बाहर नहीं जा सकतीं। उन्हें उठा लिया जाता है। सहमति से धर्मांतरण के उनसे जबरन बयान दिलाए जाते हैं। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की रिपोर्ट हिंदूज इन साउथ एशिया के सर्वे आफ ह्यïमुन राइट (2013) में उल्लेख है कि भारत विभाजन के समय आज के पाकिस्तान वाले हिस्से में हिंदू आबादी 15 प्रतिशत थी जो 1998 में मात्र 1.6 प्रतिशत रह गई। हिंदुओं के साथ कानूनी और सामाजिक भेदभाव होते रहे हैं। उन पर अत्याचार जारी हैं। यही स्थिति रही तो अगले 35-40 वर्षों में पाकिस्तान में नाम के हिंदू ही शेष रह सकते हैं। यह स्थिति उस भूखंड में दिखाई पड़ रही है, जहां वैदिक सभ्यता का विस्तार एवं विकास हुआ था। सिंधु सभ्यता मूल वैदिक सभ्यता का ही विकास थी।

पाकिस्तान घोषित इस्लामिक राष्ट्र है। उसका संविधान इस्लाम को राजधर्म घोषित करता है। सभी नागरिकों को कानून व सार्वजनिक आदेशों के अधीन धर्म पालन व प्रचार का अधिकार भी है, लेकिन संविधान में कहा गया है कि सभी कानून कुरान और सुन्नत में निर्धारित इस्लाम के आदेशों के अनुरूप हैं। संविधान गैर मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकार सीमित करता है। पाक सरकार और कïट्टरपंथी हिंदुओं पर हमलावर रहते हैं। पाकिस्तानी संविधान में अंतर्विरोध हैं कि इस्लाम के सिद्धांतों को मानते हुए ही यहां अल्पसंख्यकों के सामान्य अधिकारों का संरक्षण होगा। पंथनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय जैसे तत्व पाकिस्तान में मान्य नहीं। सुन्नत और इस्लामी राजनीतिक विचारधारा में पंथनिरपेक्षता के लिए कोई स्थान नहीं है। डॉ. मुशीरुल हक ने 'धर्मनिरपेक्ष भारत में इस्लामÓ में लिखा है, 'मुसलमान का यकीन है कि यह ईश्वरीय ज्ञान उसे सारी दुनिया में फैलाना है तो वह उन लोगों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख सकता जिन्हें वह पथभ्रष्ट मानता है।Ó

कुछ समय पहले पाकिस्तान की एक संसदीय समिति ने भी कहा था कि सरकार धाॢमक अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने में असफल रही है। मंदिर जलाना सामान्य घटना नहीं है। इस अग्निकांड के कर्ताधर्ता और उसे उकसाने वाले कोई सामान्य नागरिक नहीं हैं। वह मौलाना हैं। जहां मौलाना ही गैर इस्लामी उपासना केंद्र को ढहाने को फर्ज बताते हैं वहां पंथनिरपेक्षता या बहुलता की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन आश्चर्य है कि भारत में छोटी-छोटी घटनाओं की भी निंदा करने वाले सेक्युलर इस घटना पर मौन हैं। नि:संदेह भारत के कड़े प्रतिवाद का प्रभाव पाकिस्तान पर पड़ा है। सूबे के मुख्यमंत्री महमूद खान ने घोषणा की है कि सरकार इस मंदिर का पुनॢनर्माण कराएगी।

पाकिस्तान में हिंदुओं के प्रति घृणा भाव है। उन्हें सताना और अपमानित करना पाकिस्तानी एजेंडा है। इसी मानसिकता के कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए कोई मानवाधिकार भी नहीं। मुद्दा एक मंदिर को क्षति पहुंचाने का नहीं है। मूलभूत प्रश्न जस के तस हैं कि आखिरकार इस्लामी राजनीतिक विचारधारा में मूॢत और मंदिर तोडऩे की मानसिकता क्यों है। मंदिर ध्वस्त करने में उन्हें क्या आनंद मिलता है। दुनिया में अनेक पंथ, मत, मजहब और विश्वास हैं। सबको अपने अंत:करण और विश्वास के अनुसार जीने का अधिकार क्यों नहीं है। दुनिया 21वीं सदी में उड़ान भर रही है, लेकिन यह विचारधारा मंदिर गिराने को ही पवित्र काम मानती हैं। यह अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए। आखिरकार सभी मनुष्य अपने-अपने विश्वास के अनुसार जीवनयापन के लिए स्वतंत्र क्यों नहीं हैं? अंत:करण और विश्वास की स्वतंत्रता और उसकी अभिव्यक्ति दुनिया के प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है। कोई भी समूह इस अधिकार को छीन नहीं सकता। संयुक्त राष्ट्र को पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ पर अलग से विचार करना चाहिए।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

Posted By: Arvind Dubey

  • Font Size
  • Close