इस समय विश्व के करीब-करीब सभी देश भारी-भरकम कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। इन सरकारों की सोच है कि कोरोना कहर से उपजा संकट अल्पकालीन होगा और सरकारी खर्च बढ़ाकर इस संकट से पार पा लिया जाएगा-ठीक वैसे ही जैसे बीमारी के समय कोई उधार लेकर अपना उपचार करा लेता है। यह विचार इस विश्वास पर टिका है कि संकट अल्पकालीन होगा और अर्थव्यवस्था शीघ्र ही पुराने स्तर पर पर ही नहीं आ जाएगी, बल्कि उससे भी आगे बढ़ जाएगी। बढ़ी हुई अर्थव्यवस्था में बढ़े हुए टैक्स वसूल कर इस कर्ज का ब्याज अदा किया जा सकेगा। इस विश्वास पर फिर से विचार करने की जरूरत है। पहली बात यह कि वैश्विक सप्लाई चेन टूट गई है। आने वाले समय में कोई भी देश अपनी मूल आवश्यकता के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं होना चाहेगा, क्योंकि तमाम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार के संकट अब रह-रह कर आते ही रहेंगे। इसलिए हर देश सस्ते आयात से परहेज करेगा। इसके चलते भारतीय उपभोक्ता को महंगा घरेलू कपड़ा खरीदना होगा और विकास दर कम होगी। संक्रमण की आशंका और फिजिकल डिस्टेंसिंग के चलते खर्च बढ़ेगा। जैसे विद्यालय की कक्षा में बड़े कमरों की जरूरत होगी अथवा श्रमिकों को खेत तक ले जाने के लिए एक की जगह दो-तीन ट्राली लगानी पड़ेंगी। संक्रमण ग्रस्त लोगों का उपचार करने में भी खर्च बढ़ेगा। इन कारणों से आने वाले समय में संपूर्ण विश्व के नागरिकों के जीवन स्तर में गिरावट आ सकती है।

दीर्घ काल में जो भी हो, इस समय सरकार को खर्च बढ़ाने ही होंगे। अमेरिका, चीन एवं भारत समेत विश्व के अन्य देशों की सरकारों का राजस्व इस समय सामान्य का मात्र 30 से 50 प्रतिशत रह गया है। अब सरकारों के लिए स्वास्थ्य पर खर्च को बढ़ाना और जनता को राहत देना आवश्यक हो गया है। प्रश्न यह है कि इस हेतु राजस्व किस प्रकार जुटाया जाए और खर्च कहंा किया जाए? समझने की बात यह है कि जब सरकार कर्ज लेकर खर्च बढ़ाती है और वित्तीय घाटे को बढऩे देती है तो उसके दुष्परिणाम पूरे समाज को भोगने पड़ते हैैं, जबकि लाभ उन विशेष क्षेत्रों को होता है जहां पर खर्च किया जाता है। बतौर उदाहरण यदि सरकार ने कर्ज लिया और उसे निजी उड्डयन कंपनियों को मदद के रूप में दे दिया तो भविष्य में उसका ब्याज भी उसे ही देना पड़ेगा। इस ब्याज का भुगतान करने के लिए संपूर्ण जनता पर टैक्स लगाया जाएगा, जबकि जो खर्च किया गया वह तो उड्डयन कंपनियों और उड्डयन सेवाओं का उपयोग करने वाले वर्ग विशेष के खाते में जाएगा। इस प्रकार हम संपूर्ण जनता पर टैक्स लगाकर वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाएंगे।

इसके विपरीत यदि हम ईंधन यानी कच्चे तेल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दें अथवा तमाम लक्जरी वस्तुओं पर आयात कर बढ़ा दें और इस रकम का उपयोग आम आदमी को युनिवर्सल बेसिक इनकम यानी प्रति माह कुछ रकम सीधे उसके खाते में हस्तांतरित करने में उपयोग करें तो इसका अलग प्रभाव पड़ेगा। ईंधन और आयातित चॉकलेट पर लगाए गए आयात कर का भार विशेष वर्ग पर पड़ेगा, जबकी युनिवर्सल बेसिक इनकम की व्यवस्था करने से आम आदमी को राहत मिलेगी। इसलिए राजस्व एकत्रित करने और खर्च करने की दो विपरीत दिशाएं हैं।

यदि हम कर्ज लेकर विशेष क्षेत्रों को मदद देते हैं तो आम आदमी पर टैक्स लगाकर वर्ग विशेष को ही राहत पहुंचाएंगे। यदि हम ईंधन पर टैक्स लगाकर युनिवर्सल बेसिक इनकम देते हैं तो हम वर्ग विशेष पर टैक्स लगाकर संपूर्ण जनता को राहत पहुंचाएंगे।

मेरा मानना है कि हमें कर्ज नहीं लेना चाहिए। यदि सरकार कर्ज लेकर खर्च करती है तो उस पर उसे ब्याज अदा करना होगा और इसके लिए सरकार को संपूर्ण जनता पर टैक्स लगाना होगा। समस्या यह है कि वर्तमान में हमारी अर्थव्यवस्था में संकुचन हो रहा है। इस संकुचन के जारी रहने के आसार हैैं। यदि दो वर्ष तक अर्थव्यवस्था संकुचित रहती है और इस दौरान हम अतिरिक्त टैक्स लगाकर ब्याज अदा करते हैैं तो अर्थव्यवस्था और गहरे संकट में आएगी-ठीक वैसे ही जैसे अगर मरीज को दिए जाने वाले भोजन पर अतिरिक्त टैक्स लगा दिया जाए तो उसकी मुसीबत और बढ़ेगी। अभी कर्ज लेकर खर्च बढ़ाने की जो बात की जा रही है वह अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए की जा रही है, अर्थव्यवस्था के उत्तरोत्तर विकास के लिए नहीं। हम कोशिश कर रहे हैैं कि जितना राजस्व पूर्व में अॢजत करते थे उतना राजस्व हमें फिर से मिलने लगे। राजस्व में वृद्धि की अभी संभावना नहीं दिख रही है और यदि हम सफल भी हुए और राजस्व को पुराने स्तर पर ले भी आए तो भी ब्याज का बोझ तो बढ़ ही जाएगा।

न्यूयॉर्क के प्रोफेसर रुबिनी का कहना है कि यदि इस समय सरकारों ने भारी कर्जं लिए तो उन्हेंं अंतत: इस कर्ज को अदा करने के लिए नोट छापने पड़ेंगे। इससे महंगाई बढ़ेगी, लेकिन आॢथक विकास ठप रहेगा। नोट छापने से महंगाई बढ़ेगी, लेकिन उत्पादन पूर्ववत रहेगा यानी उत्पादन में ठहराव के साथ राजस्व में ठहराव होगा और साथ-साथ महंगाई बढऩे पर सरकार पस्त हो जाएगी। इसे ही स्टैगफ्लेशन कहा जाता है। कर्ज लेकर अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाने के प्रयास में हम गहरे गड्ढे में गिर सकते हैैं, क्योंकि इस अतिरिक्त ऋण पर अतिरिक्त ब्याज देने के लिए हमारे पास अतिरिक्त आय होने की संभावना नगण्य है। ऐसी संभावना के बावजूद सरकार को स्वास्थ आदि पर खर्च तो बढऩे ही होंगे। यह बात और है कि इसके बावजूद जीवन स्तर में गिरावट आएगी। अच्छा होगा कि जीवन स्तर में जो गिरावट आनी है उसे हम सहज भाव से स्वीकार कर लें और अपने तौर-तरीके बदलें। यदि घर का खर्च कम करना ही है तो चॉकलेट और चिप्स की खरीद में कटौती कर हम मूंगफली का उपयोग बढ़ा लें तो खर्च में कमी आएगी। इसके साथ जीवन स्तर में मामूली गिरावट आएगी, लेकिन परिवार का स्वास्थ्य बना रहेगा। यदि हम चॉकलेट और चिप्स की खरीद करते रहे और ऋण लेते रहे तो हम संकट में पड़ेंगे। हमें जीवन स्तर में आने वाली गिरावट को सीधे स्वीकार कर लेना चाहिए और कच्चे तेल एवं आयातित माल पर टैक्स लगाना चाहिए। टैक्स की इस रकम का उपयोग आम आदमी को युनिवर्सल बेसिक इनकम देने के लिए किया जाना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था में मांग बढ़े और वह पुन: पुराने स्तर पर आए।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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