बीएल वोहरा। इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि अपने देश में चाहे कोई शिकायतकर्ता हो, गवाह हो या आरोपी, उसे पुलिस स्टेशन जाने में असहजता ही महसूस होती है। उसे वहां अपने साथ होने वाले संभावित सुलूक को लेकर संदेह रहता है। उसे रूखे व्यवहार, उत्पीडऩ और अदालती चक्कर लगाने की आशंका सताती है। जो भी हो, तमाम लोगों को पुलिस से संपर्क साधना ही होता है और उसका पहला पड़ाव पुलिस स्टेशन ही बनता है। इसकी पड़ताल आवश्यक है कि आखिर पुलिस स्टेशन में पुलिस ऐसा व्यवहार क्यों करती है? इसके लिए हमें पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करना होगा। एक जनवरी, 2019 को जारी आंकड़ों के अनुसार देश में सिविल पुलिस के 16.51 लाख स्वीकृत पद हैं, लेकिन असल में 13.03 लाख पुलिसकर्मी ही कार्यरत हैं। कायदे से प्रति एक लाख की आबादी पर 126.9 पुलिसकर्मी होने चाहिए, परंतु असल में 99.78 पुलिसकर्मी ही हैं। यानी सौ लोगों पर एक पुलिसकर्मी भी नहीं है। झारखंड में यह आंकड़ा 0.039, बिहार में 0.005, असम में 0.05, बंगाल में 0.06, ओडिशा में 0.07, तमिलनाडु में 0.08 और उत्तर प्रदेश में 0.08 है। इसके अतिरिक्त प्रति सौ वर्ग किमी के दायरे में भी पर्याप्त पुलिसकर्मी नहीं हैं। उदाहरण के लिए बिहार में प्रति सौ वर्ग किमी में 6.25 और ओडिशा में 17.26 पुलिसकर्मी तैनात हैं। ये उदाहरण बदहाल तस्वीर को दिखाने के लिए काफी हैं।

देश के कई पुलिस स्टेशनों में 20 से भी कम पुलिसकर्मी हैं। ओडिशा और बिहार के ग्रामीण इलाकों के पुलिस स्टेशनों में 12, उत्तर प्रदेश में 15, हिमाचल में 16, आंध्र और त्रिपुरा में 18 पुलिसकर्मी ही हैं। इनमें से कुछ का काम तो महज कागजी कार्रवाई से ही जुड़ा है। 88 पुलिसकर्मियों के लिए औसतन एक वाहन की उपलब्धता से भी बहुत कुछ स्पष्ट होता है। देश में कुल 16,587 पुलिस स्टेशन हैं, जहां 14,784 वाहन हैं। करीब 85 पुलिस स्टेशनों में तो एक अदद वाहन तक नहीं है। 539 पुलिस स्टेशनों में एक फोन तक नहीं और 200 पुलिस स्टेशनों के पास वायरलेस सुविधा का अभाव है। करीब 1,474 पुलिस स्टेशन किराये की इमारत से संचालित हो रहे हैं। पुलिस के पास जो इमारतें हैं भी, वे बहुत जर्जर हालत में हैं। वहां पेयजल और खासतौर से महिला पुलिसकर्मियों के लिए शौचालयों की उचित व्यवस्था नहीं है। पुलिसकॢमयों को जो आवास मिले हैं, उनकी हालत भी बेहद खस्ता है।

देश के दो तिहाई (10,021) पुलिस स्टेशन ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिसिंग की स्थिति अत्यंत लचर है। पुलिस के पास संसाधनों से लेकर मानव संसाधन का अभाव है। इन इलाकों में गरीबों, वंचितों और खासतौर से महिलाओं की शिकायतों पर बमुश्किल ही सुनवाई होती है। यदि पुलिस खुद तमाम मुश्किलों से जूझ रही है तो इस आधार पर उसका खराब व्यवहार जायज नहीं ठहरता। लोग यही अपेक्षा करते हैं कि पुलिस उनके लिए नायक की भूमिका निभाए, परंतु उसके पास संसाधनों के अभाव को देखते यह संभव नहीं दिखता। पुलिसकर्मियों को बेहद मुश्किल भूमिका निभानी पड़ती है और उनमें से तमाम को बिना किसी अवकाश के लगातार 18 घंटों की ड्यूटी करनी पड़ती है। वे अवसाद की गिरफ्त में आ जाते हैं। उन्हें तमाम शारीरिक और मानसिक समस्याएं आ घेरती हैं। इससे उनका व्यवहार प्रभावित होता है, खासतौर से जब उन्हें कानूनी शक्ति मिली होती है तो वे अहंकारी और अक्खड़ हो जाते हैं। पुलिसकर्मियों की गुणवत्ता भी एक अहम मसला है। बीते कई वर्षों से भर्तियों में भ्रष्टाचार और जातिवाद का बोलबाला बढ़ा है। यह नेताओं द्वारा निर्धारित होता है। ऐसे में भर्ती किए गए पुलिसकर्मियों के प्रदर्शन की कल्पना आसानी से की जा सकती है। उनका प्रशिक्षण भी बहुत दोयम दर्जे का होता है, क्योंकि प्रशिक्षण संस्थानों में शायद ही किसी अच्छे प्रशिक्षक या अनुभवी पुलिसकर्मी की तैनाती होती है। तमाम पुलिस स्टेशनों में फोरेंसिक सुविधा भी नहीं है। असम, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे कई राज्यों में मात्र एक ही फोरेंसिक लैब है। इस प्रकार तमाम क्षेत्रीय लैब में जांच-पड़ताल अटकने से आरोप पत्र दाखिल नहीं हो पाता। आखिर पुराने हथियारों और बिना कंप्यूटर के कैसे हालात सुधर सकते हैं? आजकल साइबर अपराधियों के पास इतने आधुनिक संसाधन हैं कि पुलिस हमेशा पीछे रह जाती है। साइबर पुलिस में ही पांच लाख पुलिसकर्मियों की जरूरत है।

पुलिस संस्कृति का भी एक अहम पहलू है। अंग्र्रेजी राज के दौरान पुलिस की शासक प्रवृत्ति आज भी कायम है। अभी तक 1861 के पुलिस अधिनियम को बदला नहीं गया है। पुलिस की जवाबदेही सरकारों के प्रति है, न कि कानून या संसद के प्रति। इस कारण अधिकांश राज्यों में पुलिस मुख्यमंत्रियों की निजी सेनाओं में तब्दील हो गई है। यह विरूपण रातोंरात नहीं हुआ है। इस गिरावट में कई दशक लगे हैं। कोई नेता पुलिस सुधार नहीं चाहता, क्योंकि पुलिस पर पकड़ से उसके हितों की पूॢत होती है। पुलिसकर्मी भी नेताओं से हाथ मिला लेते हैं। वहीं तमाम अपराधी नेता बन जाते हैं। इस तरह यह साठगांठ आकार लेती है। पुलिस सुधारों के लिए विभिन्न पुलिस आयोगों की सिफारिशें और वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश धूल ही फांक रहे हैं। ऐसी स्थिति के लिए नौकरशाही और पुलिस नेतृत्व भी जिम्मेदार है।

न्यायपालिका का कामकाज भी कोई बहुत बेहतर नहीं है। निर्भया के दोषियों और कसाब जैसे मामले को परिणति तक पहुंचाने में अदालतों को करीब आठ साल लग गए। कानूनी प्रक्रियाएं भी दोषपूर्ण हैं। महज कानूनों में बदलाव और उनकी संख्या बढ़ाने से भी भला नहीं होने वाला। समूचा आपराधिक न्याय तंत्र छिन्न-भिन्न है। ऐसे में यदि पुलिस अप्रिय व्यवहार करती है तो उस पर हैरानी क्यों? हालात सुधारने में किसी की दिलचस्पी नहीं। इसी स्थिति में समाज को लगातार प्रताडऩा ही झेलनी होगी। जब भी पुलिस की गलती होती है तो हमेशा की तरह उसकी आलोचना होती है। मुख्यमंत्री भी मीडिया में खीझ उतार देते हैं। फिर अगले किसी हादसे तक सब कुछ भुला दिया जाता है। जनता का आक्रोश भी कुछ समय के लिए ही रहता है। कोई भी उन पुलिस सुधारों की बात नहीं करता, जो सबसे आवश्यक हैं। इसके लिए कोई जन आंदोलन भी नहीं होता। जब तक समाज जागृत होकर पुलिस सुधारों के लिए मुहिम नहीं छेड़ता और जब तक नेता, नौकरशाह और पुलिस नेतृत्व इस दिशा में आगे नहीं बढ़ते, तब तक हालात सुधरने से रहे। यही दुखद, लेकिन कड़वी सच्चाई है।

(लेखक पूर्व आइपीएस अधिकारी हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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