उर्दू के मशहूर शायर मुजफ्फर इस्लाम रज्मी का एक शेर है-'ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई।Ó इसे अगर भारत-चीन रिश्तों को परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो उसके बाद शायद ही कुछ कहने को बचेगा। 1951 में भारत ने जिस तरह से आंख मूंदकर चीन को तिब्बत पर आराम से कब्जा करने दिया उसके बाद पिछले सत्तर वर्षों में एक भी दिन नहीं बीता जब भारत ने इस गलती की सजा न भुगती हो। इस भयंकर भूल के बाद चीन की सेना आसानी से तिब्बत को लांघकर भारत की हिमालयी सीमा पर आ धमकी। तब से उसने भारत के खिलाफ जैसी खुराफातों का सिलसिला शुरू किया उसकी फेहरिस्त अंतहीन है।

तिब्बत को आधार बनाकर डोकलाम, अरुणाचल और लद्दाख में चीन की दादागीरी अभी चल ही रही है। इस बीच चीन ने भारत के खिलाफ एक नई तरह के हमले का बिगुल बजा दिया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने घोषणा की है कि चीन तिब्बत की नदी यारलुंग त्सांगपो (भारतीय नाम 'ब्रह्मपुत्रÓ) पर भारत की सीमा से ठीक 30 किलोमीटर पहले एक 'सुपर डैमÓ बनाने जा रहा है, जिसकी क्षमता चीन और दुनिया के सबसे बड़े डैम 'थ्री गॉर्जेस डैमÓ से भी तीन गुनी होगी। इस पर संभावित खर्च का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 2006 में निॢमत थ्री गॉर्जेेस डैम की बिजली क्षमता 22.5 गीगा वाट थी और इस पर 31.7 अरब डॉलर (लगभग 2300 अरब रुपये) खर्च हुए थे। तिब्बत के अंतिम छोर पर प्रस्तावित नए डैम को अगर भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो कहा जा सकता है कि इसकी बिजली उत्पादन क्षमता भाखड़ा नंगल डैम से 111 गुना और भारत की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना टिहरी डैम के मुकाबले 27 गुना अधिक होगी। यानी यह चीनी परियोजना भारत की सबसे बड़ी पांज पनबिजली परियोजनाओं की कुल क्षमता से भी नौ गुना अधिक होगी। चीन इस इलाके में अभी ऐसी दो और परियोजनाओं के लिए भी तैयारी कर रहा है।

चीन की इस घोषणा ने भारत के लिए बहुत गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैैं। इस परियोजना के लिए चीन जितने बड़े पैमाने पर बांध बनाने जा रहा है वह ब्रह्मपुत्र के बहाव को बहुत प्रभावित करेगा। इसका सीधा असर अरुणाचल प्रदेश और असम की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर होगा। इसका प्रभाव भारत और बांग्लादेश के राजनीतिक, सामाजिक और आॢथक संबंधों पर भी पड़ेगा, क्योंकि यह नदी भारत के बाद बांग्लादेश होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस 'सुपर डैमÓ परियोजना ने भारत के लिए इस सबसे कहीं ज्यादा बड़ा एक और जोखिम भी बढ़ा दिया है। वह यह कि भारत की सीमा से ठीक पहले पानी की इतनी विशाल मात्रा को वह भारत के खिलाफ कभी भी एक 'वाटर-बमÓ की तरह इस्तेमाल करके असम और अरुणाचल में भयंकर तबाही मचा सकता है। ऐसा हमला भारत की नागरिक आबादी और इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए और विशेष रूप से वहां रक्षा तंत्र के लिए बहुत नुकसानदेह सिद्ध हो सकता है।

चीन के इस 'वाटर-बमÓ का खतरा कोरी कल्पना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कम से कम तीन अवसर आ चुके हैं जब चीन ने जानबूझकर ऐसे नाजुक मौकों पर भारत की ओर नदियों का पानी छोड़ा जिसने भारत में भारी तबाही मचाई। जून 2000 में अरुणाचल के उस पार तिब्बती क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र पर बने एक डैम का एक हिस्सा अचानक टूट गया जिसने भारतीय क्षेत्र में घुसकर भारी तबाही मचाई। उसके बाद जब भारत के केंद्रीय जल शक्ति आयोग ने इससे जुड़े तथ्यों का अध्ययन किया तो पाया गया कि चीनी बांध का टूटना एक पूर्वनियोजित शरारत थी। उस घटना के कुछ सप्ताह बाद ही हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में भी ठीक ऐसी ही घटना हुई। तिब्बत की ओर से जो पानी अचानक छोड़ा गया उसकी पहली लहर ने जब भारत में प्रवेश किया तो उसकी 50 फुट तक थी। उस बाढ़ ने किन्नौर के इलाके में 200 किलोमीटर भीतर तक कहर ढाया। इसी तरह की तीसरी घटना 2005 की पारीचू नदी से संबंधित है। उस समय बाढ़ के खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने चीन से इस पानी के बारे में ताजा आंकड़े साझा करने और भारतीय इंजीनियरों की एक टीम को तब तिब्बत में बनी कृत्रिम झील का मुआयना करने की अनुमति मांगी, लेकिन चीन सरकार ने न तो आंकड़े जारी किए और न भारतीय विशेषज्ञों को तिब्बत में प्रवेश की अनुमति ही दी। रक्षा विशेषज्ञों की चिंता है कि यदि भारत के साथ युद्ध की हालत में या किसी राजनीतिक विवाद में चीन ने ब्रह्मपुत्र पर बनाए गए बांधों के पानी को 'वाटर-बमÓ की तरह इस्तेमाल करने का फैसला किया तो भारत के कई सीमावर्ती क्षेत्रों में जानमाल और रक्षा तंत्र के लिए भारी खतरा पैदा हो जाएगा।

इसके अलावा चीन एक और षड्यंत्रकारी योजना पर काम कर रहा है। वह है इस डैम से पैदा हुई बिजली का इस्तेमाल करके पंपों और नहरों की मदद से ब्रह्मपुत्र के पानी को चीन के दूर वाले इलाकों की ओर मोड़ देना। इस तरह की कुछ और योजनाओं पर भी चीन पहले से काम कर रहा है जिनका लक्ष्य वहां से निकलने वाली दूसरी कई नदियों के पानी को अपनेउन इलाकों की ओर मोड़ देना है जहां पानी की कमी है। इन योजनाओं का सीधा असर म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम समेत दस देशों पर पड़ेगा। इनमें से अधिकांश देश चीन की इस दादागीरी से परेशान हैं। अब सवाल उठता है कि भारत इन देशों के साथ चीन के खिलाफ संचुक्त मोर्चा बनाने का साहस कब जुटा पाता है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सेंटर फॉर हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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