दिल्ली-एनसीआर की नाक में दम करने और भीषण दंगों का कारण बनने वाले शाहीन बाग धरने पर सुप्रीम कोर्ट ने बीते सात अक्टूबर को यह फैसला दिया था कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़कों या फिर अन्य सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा स्वीकार्य नहीं है। इस फैसले का पंजाब के उन किसान संगठनों पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा, जो कृषि कानूनों के खिलाफ रेल रोको आंदोलन के तहत रेल पटरियों पर बैठे थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गौर करने के बजाय आंदोलनरत किसानों ने रेल रोको आंदोलन जारी रखने का फैसला किया और फिर भी पंजाब सरकार ने रेल ट्रैक खाली कराने के लिए कोई जहमत नहीं उठाई। यात्री ट्रेनों और मालगाडिय़ों का आवागमन ठप होने के कारण पंजाब में कोयले, उर्वरक आदि की आपूॢत बाधित हो रही थी और उद्योगों के सामने मुश्किलें पेश आ रही थी, फिर भी मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह किसानों के बीच जाकर यह कहने में लगे थे कि वह उनके साथ हैं।

उन्होंने धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के भी आदेश दिए। नि:संदेह वह यह नहीं कह रहे थे कि किसान रेल पटरियों पर काबिज रहें, लेकिन उनका समर्थन करने का कोई अवसर भी नहीं छोड़ रहे थे। नतीजा यह हुआ कि कोयले की किल्लत के चलते बिजली संयंत्र बंद होने की नौबत आ गई और उद्योगों को कच्चा माल मिलना बंद हो गया। इसके बाद अमरिंदर ने किसानों से रेल ट्रैक खाली करने की अपील की और रेलवे से केवल मालगाडिय़ां चलाने का आग्रह किया। रेलवे ने कहा कि केवल मालगाडिय़ों क्यों तो अमरिंदर सिंह का जवाब आया कि वह यात्री ट्रेनों की सुरक्षा की गांरटी नहीं ले सकते। रेलवे का कहना है कि चलेंगी तो मालगाडिय़ां और यात्री ट्रेनें भी, क्योंकि कोई राज्य यह तय नहीं कर सकता कि कौन सी ट्रेन चले और कौन नहीं? अब यह मामला उच्च न्यायालय पहुंच गया है। पता नहीं वहां क्या होता है, लेकिन यह साफ है कि किसी को इसकी परवाह नहीं कि चंद दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया है कि विरोध के नाम पर सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा नहीं किया जा सकता। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक बताए जाने वाले फैसले का कोई मूल्य-महत्व नहीं।

पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर जाने और वहां से आने वाले हजारों आम भारतीय परेशान हैं, लेकिन किसी को कोई परवाह नहीं। जिन्हेंं परवाह करनी चाहिए, वे दिल्ली आकर पंजाब में ट्रेनें चलाने की मांग तो कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं कह पा रहे कि रेल पटरियों पर कब्जा करना गैर कानूनी और एक तरह से लोगों को बंधक बनाना है। दिल्ली में शाहीन बाग इलाके में केवल एक सड़क आंदोलनकारियों की कब्जे में थी, पंजाब में अनिगनत रेल ट्रैक कब्जे में हैं। शाहीन बाग की सड़क पर करीब तीन महीने तक कब्जा रहा। पंजाब के रेल ट्रैक लगभग एक माह से किसानों के कब्जे में हैं। शायद पंजाब के किसान संगठनों के साथ-साथ राजस्थान के गुर्जर संगठनों को भी यह पता है कि सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले की कोई अहमियत नहीं, क्योंकि बीते हफ्ते उन्होंने आरक्षण की मांग को लेकर मुंबई-दिल्ली रेल मार्ग पर कब्जा जमा लिया। करीब दस दिन हो चुके हैं। वे रेल पटरियों पर काबिज हैं। इसके चलते कई ट्रेनों का रूट बदला गया है और कुछ को रद किया गया है। हजारों आम भारतीय परेशान हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला उनकी कोई सहायता नहीं कर पा रहा है। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला रेल पटरियों तले कुचला जा रहा है और कोई कुछ नहीं कर पा रहा- स्वयं न्यायपालिका भी नहीं।

सुप्रीम कोर्ट केवल फैसले ही नहीं देता। वह कभी-कभी फैसले देते हुए कड़ी फटकार भी लगाता है। कई बार इस फटकार की चपेट में सरकारें भी आ जाती है। इसी 29 अक्टूबर को बंगाल सरकार उसकी फटकार की चपेट में आई। वह इसलिए आई, क्योंकि कोलकाता पुलिस ने फेसबुक पर ममता सरकार की आलोचना करने वाली दिल्ली की एक महिला के खिलाफ एफआइआर दर्जकर उसे थाने में हाजिर होने को हुक्म दिया था। महिला ने कोलकाता हाई कोर्ट की शरण ली। उसे राहत नहीं मिली तो वह सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को फटकारते हुए कहा, यदि राज्यों की पुलिस इस तरह आम लोगों को समन जारी करने लगेगी तो यह एक खतरनाक ट्रेंड बन जाएगा। उसने साफ-साफ यह भी कहा कि लाइन मत क्रॉस कीजिए, भारत को एक आजाद देश बने रहने दीजिए। यहां हर किसी को बोलने की आजादी है और संविधान ने इसी कारण सुप्रीम कोर्ट बनाया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य आम नागरिकों को प्रताडि़त न करें। उसने कोलकाता पुलिस को निर्देश दिया कि यदि उसे उक्त महिला से पूछताछ करनी है तो दिल्ली आकर करे।

पता नहीं इस फटकार का बंगाल सरकार पर क्या असर हुआ होगा, लेकिन यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि अन्य सरकारों और खासकर महाराष्ट्र सरकार पर इसका तनिक भी असर नहीं पड़ा। इसका उदाहरण है नागपुर का समित ठक्कर। समित को 24 अक्टूबर को नागपुर पुलिस ने इस आरोप में गिरफ्तार किया कि उन्होंने एक ट्वीट में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के बेटे आदित्य ठाकरे को बेबी पेंगुइन कहा। 2 नवंबर को उन्हेंं जमानत मिली तो मुंबई के एक थाने की पुलिस ने फिर से गिरफ्तार कर लिया। 9 नंवबर को समित को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के आदेश हुए तो मुंबई की एक अन्य थाने की पुलिस ने उन्हेंं तीसरी बार गिरफ्तार कर लिया। चूंकि इस कथित आपत्तिजनक ट्वीट के खिलाफ शिवसैनिकों ने कई एफआइआर दर्ज कराई हैं इसलिए महाराष्ट्र के अलग-अलग थानों की पुलिस समित की गिरफ्तारी का सिलसिला जब तक चाहे, तब तक कायम रख सकती है और यह तय मानिए कि इस खुली अंधेरगर्दी पर कोई कुछ नहीं कर सकता।

( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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