विगत 30 दिसंबर को पाकिस्तान में एक और हिंदू धार्मिक स्थल का ध्वंस किया गया। यह मामला खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के करक जिले से जुड़ा है जहां टेरी कस्बे में परमहंस महाराज की समाधि को कट्टरपंथियों ने आग के हवाले कर दिया। इस समाधि का निर्माण पिछली सदी के तीसरे दशक में हुआ था जिसे 1997 में ढहा दिया गया था। फिर 2015 में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उसका पुनर्निर्माण किया गया। प्रतीत होता है कि समाधि परिसर में कुछ निर्णाण कार्य चल रहा था जो स्थानीय मुस्लिमों और मौलवियों को स्वीकार्य नहीं था। पाकिस्तानी मीडिया में आई जानकारी के मुताबिक मौलवियों ने भीड़ को समाधि का ध्वंस करने के लिए उकसाया। वहीं पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों ने दावा किया है कि इस मामले में उन्होंने 14 लोगों को गिरफ्तार किया है। पाकिस्तान में हिंदू समुदाय के नेताओं ने इसकी निंदा की है। कुछ पाकिस्तानी मंत्रियों ने भी इस तोड़फोड़ की आलोचना की है। पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश ने मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए 5 जनवरी को आदेश दिया कि समाधि का फिर से निर्माण किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि जिन पुलिसकर्मियों ने यह हादसा होने दिया उनका केवल निलंबन ही पर्याप्त नहीं होगा। अदालत ने अफसोस जताते हुए कहा कि इस मामले से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

स्पष्ट है कि पाकिस्तानी न्यायिक एवं राजनीतिक कार्रवाई की मंशा क्षेत्रीय देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष यही दर्शाना है कि पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के लिए महफूज देश है जहां वे शांतिपूर्ण, सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन कर सकते हैं। पाकिस्तान अपनी यह छवि सुधारने का प्रयास इसीलिए कर रहा है, क्योंकि अल्पसंख्यकों के लगातार उत्पीड़न की खबरों से उसकी प्रतिष्ठा बहुत धूमिल हो गई है। कुछ दिन पहले ही सिंध प्रांत में एक हिंदू लड़की का अपहरण कर उसका जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कर मुसलमान पुरुष से निकाह करा दिया गया। पाकिस्तानी अदालतें भी अमूमन धर्मांतरण कराने वाले काजियों और निकाह करने वाले पुरुषों का ही पक्ष लेती हैं। वहां ईशनिंदा से जुड़े कुछ ऐसे कानून भी हैं जो अल्पसंख्यकों के जीवन और उनकी स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा हैं।

समाधि प्रकरण पर भारत ने आधिकारिक रूप से अपनी चिंता व्यक्त करते हुए पाकिस्तान को यह भी स्मरण कराया कि अल्पसंख्यकों और उनके धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है। कूटनीतिक रूप से यह उचित था। वहीं पाकिस्तान भारत और वैश्विक समुदाय को अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का भरोसा दिलाने के बजाय उलटे अपने अल्पसंख्यकों के प्रति भारत के रवैये पर ही सवाल उठाने लगा। उसने भारत की आपत्ति को खारिज करते हुए समाधि पर हुए हमले के बाद अपनी कार्रवाई का विवरण सामने रख दिया। हालांकि पाकिस्तान ने इस तथ्य को अनदेखा ही किया कि किसी मामले पर शुरुआती त्वरित कार्रवाई कहानी का एक पहलू है और उसे न्यायिक परिणति तक पहुंचना एक अलग मसला। मामले को अंजाम तक पहुंचाने में पाकिस्तान का रिकॉर्ड बहुत लचर है। पाकिस्तानी एजेंसियों ने 2008 के मुंबई आतंकी हमले को लेकर अपने जिस ढुलमुल रवैये का परिचय दिया उससे स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान आतंकवाद और हिंसा को गंभीरता से नहीं लेता। जो मुल्ला अल्पसंख्यकों पर ईशनिंदा का आरोप लगाते हैं उनके खिलाफ भी यही रवैया अपनाया जाता है। अल्पसंख्यकों पर झूठे आरोपों की समुचित जांच नहीं होती और उन्हें उसी आधार पर सजा दे दी जाती है। उन्हें सालों-साल जेल में गुजारने पड़ते हैं। न्यायाधीश भी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष फैसला सुनाने से डरते हैं और अक्सर इन आरोपितों को हिंसक भीड़ का शिकार होना पड़ता है जबकि असल अपराधी बच निकलते हैं। इक्का-दुक्का मामलों में ही कुछ कार्रवाई होती है। जैसे आसिया बीबी नाम की ईसाई महिला पर लगे ईशनिंदा के झूठे आरोपों पर अंतरराष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान गया तो पाकिस्तानी एजेंसियों को कुछ दखल लेना पड़ा ताकि वे अंतरराष्ट्रीय आलोचना से कुछ बच सकें। आसिया बीबी का मामला वैश्विक स्तर पर इसलिए भी सुर्खियों में छा गया, क्योंकि पाकिस्तानी पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षक मुमताज कादरी ने भी आसिया बीबी की हालत से कुछ हमदर्दी जताई थी। अंततः आसिया बीबी को पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया। निर्दोष ठहराए जाने के बावजूद पाकिस्तान में कट्टरपंथियों से उनकी जान को खतरा था। उन्हें परिवार सहित पाकिस्तान छोड़कर विदेश जाना पड़ा। वहीं कादरी को तासीर की हत्या में फांसी हुई, लेकिन अब उसे शहीद का दर्जा दया जा रहा है जहां उसकी कब्र पर तमाम पाकिस्तानी श्रद्धांजलि अर्पित करने जाते हैं। यह पाकिस्तानी समाज की स्थिति को दर्शाता है।

परमहंस महाराज की समाधि पर हमले का मामला इकलौता नहीं है, बल्कि यह कई दशकों से पाकिस्तानी समाज में पनपती कट्टरता का ही परिणाम है। पिछली सदी के नौवें दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिकी जंग में पाकिस्तान की सक्रियता के बाद इस कट्टरपंथी मानसिकता में और उबाल आया। वह जिया उल हक का दौर था जिन्होंने देश में और कट्टर इस्लामिक कानून और परंपराओं को बढ़ावा दिया। साथ ही पारंपरिक इस्लामिक तंत्र पर सऊदी अरब जैसे कट्टर तंत्र का और अधिक प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप पाकिस्तान में न केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ी, बल्कि शिया-सुन्नी संघर्ष और यहां तक कि सुन्नियों के ही कुछ वर्गों में तलवारें खिंचती गईं।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान फिलहाल इस प्रचार में लगे हैं कि जहां भारत एक कट्टर देश बनता जा रहा है वहीं पाकिस्तान उदार बनने की राह पर है। उनका यह दावा सही नहीं और हालिया समाधि प्रकरण पाकिस्तानी समाज की सोच को दर्शाता है। तथ्य यही है कि जिस मुल्क की बुनियाद ही धार्मिक आधार पर पड़ी हो वह दूसरे धर्मों के साथ भेदभाव तो करेगा ही, बल्कि समय के साथ उसकी कट्टरता और बढ़ती जाएगी। यह इतिहास का सबक है। ऐसे में भारत की प्रतिष्ठा पर प्रहार का पाकिस्तानी दांव सफल नहीं हो सकता। भारत ने अपने सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए पाकिस्तान से एकदम अलग आधारशिला रखी। वह राह भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में झलकती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत तो यही है कि भारत में सभी धर्म एकसमान हैं और किसी के साथ धार्मिक आधार पर कोई कानूनी या सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी भारतीय सरकारों ने इसी पथ का अनुसरण किया है। ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान में सभी धर्मों एवं सामाजिक समूहों के प्रति समानता का भाव ही झलकता है। जो नेता संकीर्ण हितों के लिए इन सिद्धांतों को तिलांजलि देने की सोचें उन्हें पाकिस्तान की नियति हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए।

(लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं।)

Posted By: Arvind Dubey

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