पाकिस्तान एक बार फिर खुद अपने ही हाथों बेनकाब हुआ। वहां की संसद में केंद्रीय मंत्री फवाद चौधरी की ओर से पुलवामा हमले को इमरान खान की बड़ी कामयाबी करार दिए जाने वाले बयान के बाद पाकिस्तान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुरी तरह शर्मसार हुआ। यह बयान पीएमएल-एन के सांसद अयाज सादिक के इस बयान के जवाब में आया कि विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई इसलिए हुई, क्योंकि भारत के हमले की आशंका में सेना प्रमुख बाजवा और विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के पैर कांप रहे थे और पसीने छूट रहे थे। पुलवामा हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने की बात पहली बार सामने नहीं आई। एनआइए का आरोप पत्र भी यही कह रहा है कि इस हमले की साजिश पाकिस्तान में रची गई। पुलवामा हमले की तरह संसद और मुंबई पर हमला भी पाकिस्तानी साजिश का नतीजा था। इसी तरह पठानकोट, उड़ी, गुरदासपुर समेत अन्य हमले भी पाकिस्तान की साजिश का ही परिणाम थे। पाकिस्तान ने इन अनगिनत आतंकी हमलों की साजिश रचने वालों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की। इसी कारण दुनिया इस नतीजे पर पहुंच रही है कि पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा है।

आतंक को समर्थन देने के कारण ही पाकिस्तान फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची में है। वह इस सूची से बाहर तो आना चाहता है, लेकिन अपने यहां के आंतकी गुटों पर लगाम लगाए बिना। इसी कारण हाल में एफएटीएफ ने एक बार फिर उसे ग्रे सूची में बनाए रखने का फैसला किया। हालांकि भारत को दुश्मन मानने की सनक में पाकिस्तान बर्बाद हो रहा है, लेकिन वह सुधरने को तैयार नहीं। वास्तव में पाकिस्तान 1947 से ही कश्मीर हड़पने की नीति पर चल रहा है। इससे अब सारी दुनिया से परिचित है कि अक्टूबर, 1947 में कश्मीर में जो कबायली हमला हुआ था, वह वास्तव में पाकिस्तानी सेना की ओर से किया गया था। यह भी किसी से छिपा नहीं कि कश्मीर के हालात इसलिए भी बिगड़े, क्योंकि नेहरू ने कश्मीरी लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के बजाय शेख अब्दुल्ला की चाहत पूरी की। इसी के नतीजे में संविधान में अनुच्छेद 370 आया। इस अनुच्छेद की आड़ में कश्मीर में जो अलगाववादी राजनीति चली, उसका पटाक्षेप पिछले वर्ष तब हुआ जब मोदी सरकार ने उसे हटा दिया। विडंबना यह है कि भारत के कई विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस कश्मीर में अलगाव को हवा देने वालों के खिलाफ खड़े होने के बजाय मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है।

महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला के हाल के बयान यही बता रहे हैं कि वे पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस महबूबा और अब्दुल्ला की ओर से बनाए गए गुपकार गठजोड़ में भले ही शामिल न हुई हो, लेकिन वह इन नेताओं के भारत विरोधी बयानों का विरोध करने को तैयार नहीं। उसे स्पष्ट करना चाहिए कि चिदंबरम किस हैसियत से अनुच्छेद 370 की वापसी की मांग कर रहे हैं? चिदंबरम के बयान पर कांग्रेस की चुप्पी यही बताती है कि वह अपना राष्ट्रवादी चरित्र खोती चली जा रही है। राहुल गांधी तो इस बात में फर्क ही नहीं कर पाते कि क्या बोलना भारत के हित में है और क्या विरोध में? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पुलवामा हमले के बाद कांग्र्रेस और कुछ अन्य दलों के नेताओं ने किस तरह यह कहने की कोशिश की थी कि चुनावी लाभ के लिए यह हमला सरकार की ओर से ही कराया गया। यह ठीक वही नैरेटिव था, जो पाकिस्तान गढ़ रहा था। इससे न केवल देश के हितों को नुकसान पहुंचा, बल्कि पाकिस्तान को भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने में आसानी हुई।

कांग्रेस को इन सवालों के जवाब देने चाहिए कि आखिर राहुल गांधी ऐसे सवाल करके किसका हित साध रहे थे कि पुलवामा हमले से किसे फायदा मिला? कांग्र्रेस के इसी रवैये की याद दिलाते हुए प्रधानमंत्री ने यह कहा कि पुलवामा में जवानों के बलिदान पर कुछ लोगों ने दुख व्यक्त करने के बजाय भद्दी राजनीति की। यह हैरानी की बात है कि शशि थरूर सरीखे कांग्र्रेसी नेता अभी भी अपने पुराने रवैये पर अड़े हैं। उनकी समझ से पाकिस्तान की दगाबाजी उनके लिए कोई खबर ही नहीं। साफ है कि वह इस बात को याद करने के लिए तैयार नहीं कि पुलवामा हमले और फिर एयर स्ट्राइक के बाद कांग्र्रेस ने कैसे-कैसे सवाल खड़े किए थे? इन्हीं सवालों के कारण तो ये मसले चुनावी मुद्दा बने थे।

फवाद चौधरी के बयान के बाद जब कांग्र्रेस को उसके नेताओं के पुराने बयानों के लिए कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, तब उसके प्रवक्ता यह पूछ रहे हैं कि जब देश में चुनाव हो रहे होते हैं तभी मोदी सरकार को पाकिस्तान की याद क्यों आती है? यह हास्यास्पद सवाल है, क्योंकि पुलवामा हमले पर बयान तो पाकिस्तानी मंत्री ने दिया है। कांग्र्रेस को यह समझना होगा कि चीन और पाकिस्तान को लेकर राहुल गांधी के बयान भारत की राजनीतिक एकजुटता को खंडित करने वाले रहे और इसी कारण इन दोनों देशों ने इन बयानों को भुनाने की कोशिश की। कोई बड़ी बात नहीं कि राहुल अपनी गलती मानने के बजाय फिर ऐसा कोई बयान दे दें जिसका पाकिस्तान या चीन बेजा इस्तेमाल करे। जो भी हो, भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लिहाजा राजनीतिक बयानबाजी तो होगी, पर यह ठीक नहीं कि यह बयानबाजी देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करे। दुर्भाग्य से कांग्रेस को इसकी परवाह नहीं।

शायद इसी कारण उसके नेता सेना का मनोबल तोडऩे वाले बयान भी देते रहते हैं। क्या कोई इसे भूल सकता है कि कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के नेताओं ने किस तरह सर्जिकल स्ट्राइक के सुबूत मांगे थे और फिर एयर स्ट्राइक के समय भी किस प्रकार यह कहा था कि इसके क्या प्रमाण कि बालाकोट में आतंकी मारे गए हैं? ऐसी बातें सैन्य अधिकारियों के ऐसे बयानों के बाद भी की गई थीं कि बालाकोट में भारी नुकसान हुआ है और आतंकियों की लाशें गिनना हमारा काम नहीं। क्या ऐसी बातें सेना का मनोबल गिराने वाली नहीं थीं? चीनी सेना के अतिक्रमणकारी रवैये पर भी कांग्रेसी नेताओं के बयान कुल मिलाकर चीन के एजेंडे को ही बल देने वाले रहे। आखिर कांग्र्रेस की यह कैसी राष्ट्रवादी राजनीति है, जो राष्ट्रीय हितों को ही नुकसान पहुंचाती है? अच्छा हो कि फवाद चौधरी के बयान के बाद कांग्रेस की आंखें खुलें।

Posted By: Arvind Dubey

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