डॉ. जयंतीलाल भंडारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक अर्से से देशवासियों से खरीदारी करते समय स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील कर रहे हैं। यह अपील वह बिहार की चुनावी सभाओं में करते दिखे और मन की बात कार्यक्रम में भी। वास्तव में जबसे चीन की भारत के प्रति आक्रामकता बढ़ी है तबसे प्रधानमंत्री स्थानीय उत्पादों के उपयोग पर कुछ ज्यादा ही बल दे रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है। अच्छी बात यह है कि उनकी अपील का असर भी दिख रहा है। पिछले कई वर्षों तक त्योहारों के मौके पर देश के बाजार सस्ते चीनी सामानों से भर जाते थे, लेकिन इस बार बाजारों में स्थानीय सामान की बहुतायत है। दीपावली पर भी भारतीय बाजार से चीनी दीपक, झालर और अन्य सजावटी सामान लगभग गायब हैं। यह एक शुभ संकेत है। दरअसल चीन को आॢथक चुनौती देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा टिकटॉक सहित विभिन्न चीनी एप्स पर प्रतिबंध, चीनी सामान के आयात पर नियंत्रण, शुल्क वृद्धि, सरकारी विभागों में चीनी उत्पादों की जगह यथासंभव स्थानीय उत्पादों के उपयोग की प्रवृत्ति जैसे विभिन्न कारण चीन से आयात में बड़ी गिरावट की वजह हैं। चीन में निॢमत सस्ते कच्चे माल को प्राथमिकता देने वाले भारतीय उत्पादकों ने भी सस्ते कच्चे चीनी माल का आयात कम कर दिया है। गौरतलब है कि कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने जून माह से ही चीन के उत्पादों के बहिष्कार का अभियान शुरू किया हुआ है। कैट का मानना है कि ऐसे अभियान के कारण चीन से इस वर्ष राखियां और गणेश मूॢतयों के आयात में बड़ी कमी आई। माना जा रहा है कि इस बार दीपावली से संबंधित करीब 40 हजार करोड़ रुपये के विभिन्न सामान भी भारतीय बाजार में नहीं आएंगे।

देश के बाजारों में चीन निर्मित वस्तुओं ं की कमी का जो परिदृश्य है, वह आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2020-21 के शुरुआती पांच महीनों (अप्रैल से अगस्त) में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा घटकर करीब 12.6 अरब डॉलर का रह गया है। यह व्यापार घाटा वर्ष 2019-20 में करीब 22.6 अरब डॉलर, 2018-19 में करीब 23.5 अरब डॉलर और 2017-18 में करीब 26.33 अरब डॉलर था। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि पिछले पांच-छह महीनों में भारत में चीन से आयात में बड़ी गिरावट आई है। जहां इस वर्ष अप्रैल से अगस्त माह के बीच भारत में चीन से आयात में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 27.63 फीसद की गिरावट आई है, वहीं भारत से चीन को निर्यात में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 27 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इसमें कोई दो मत नहीं कि देश में कई वस्तुओं का उत्पादन बहुत कुछ चीन से आयातित कच्चे माल और आयातित वस्तुओं पर निर्भर है। खासतौर से दवाई उद्योग, मोबाइल उद्योग, चिकित्सा उपकरण उद्योग, वाहन उद्योग तथा इलेक्ट्रिक जैसे कई उद्योग बहुत कुछ चीन से आयातित माल पर आधारित हैं। यद्यपि भारत दवा के क्षेत्र में अग्रणी देश बनकर उभरा है, लेकिन दवा बनाने की मूल सामग्री यानी बल्क ड्रग या एपीआइ के मामले में बहुत कुछ चीन से आयात पर निर्भर है। वस्तुत: एक समय भारत एपीआइ के मामले में आत्मनिर्भर था, लेकिन इसके चीन से आयात के आॢथक फायदे के कारण हम इसमें पिछड़ गए।

यद्यपि उत्पादन से जुड़े चीन के कच्चे माल का एकदम कोई विकल्प नहीं तैयार हो सकता, लेकिन पिछले छह-सात महीनों में देश के उत्पादक चीन से आयातित कुछ कच्चे माल को स्थानीय उत्पादों के आधार पर तैयार करने की डगर पर आगे बढ़े हैं। इसके साथ-साथ सरकार भी एपीआइ के घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और चीन से आयातित केमिकल्स के आयात को कम करने के लिए तेजी से आगे बढ़ी है। देश में ही इनके उत्पादन के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव (पीएलआइ) स्कीम के तहत आगामी पांच वर्षों में 25 हजार करोड़ रुपये निवेश करने की व्यापक योजना सुनिश्चित की गई है। नि:संदेह अब चीन से और अधिक व्यापार घाटा कम करने के लिए चीन से आयातित कच्चे माल के देश में ही उत्पादन के लिए बनाई गई रणनीति को साकार करना होगा। इसके साथ ही चीनी उत्पादों के स्थानीय विकल्पों को विकसित करने की डगर पर भी तेजी से आगे बढऩा होगा। यद्यपि भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के प्रावधानों के तहत चीन के आयात पर प्रत्यक्ष प्रतिबंध नहीं लगा सकता है, लेकिन भारतीय उत्पादों को भारी हानि पहुंचाने वाले चीनी सामानों पर एंटी डंपिंग ड्यूटी अवश्य लगाई जा सकती है। भारत सरकार को इस पर अंतिम निर्णय शीघ्र लेना चाहिए, क्योंकि चीन के सुधरने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। ज्ञातव्य है कि भारत की तुलना में चीन ने अधिक भारतीय उत्पादों पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाई है। निश्चित रूप से चीन से व्यापार घाटा और कम करने के लिए हमें अपने उद्योग-कारोबार क्षेत्र की कमजोरियों को भी दूर करना होगा। इसके लिए उन ढांचागत सुधारों पर जोर देना होगा, जिससे निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके। बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करके भी अपने सामान की उत्पादन लागत कम करनी होगी। भारतीय उद्योगों को चीन के मुकाबले में खड़ा करने के लिए शोध और नवाचार पर और अधिक ध्यान देना होगा।

कुल मिलाकर हमें उम्मीद करनी चाहिए कि देश में लोग चीनी उत्पादों की जगह यथासंभव स्थानीय उत्पादों के उपयोग को जीवन का मूलमंत्र बनाएंगे। देश के उद्यमी और कारोबारी आयातित चीनी कच्चे माल और चीनी वस्तुओं के स्थानीयविकल्प प्रस्तुत करेंगे। स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन दिए जाने से देश में लघु एवं कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करके बड़ी संख्या में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकेंगे। आत्मनिर्भर भारत ही चीन को आॢथक टक्कर देने और उसकी महत्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण का एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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