राजनीति में गौरव, आकांक्षा, हताशा और उद्वेलना जैसे सामाजिक भावों की अभिव्यक्ति नारों और जुमलों के माध्यम से होती रही है। समाज में व्यापक रूप से स्वीकार्य होने पर ये अभिव्यक्तियां उस दौर की राजनीति को परिभाषित भी करती रही हैं। जैसे इंदिरा गांधी का 'गरीबी हटाओÓ नारा निराशा के माहौल में आशा की किरण दिखता था या फिर एक समय 'गर्व से कहो हम हिंदू हैंÓ छद्म धर्मनिर्पेक्षता से त्रस्त हिंदुओं का विप्लव घोष बना। इसी तरह लोकनायक जेपी का आह्वïान 'इंदिरा हटाओ देश बचाओÓ आपातकाल के बाद सत्ता परिवर्तन का मंत्र बना। हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी नारों या जुमलों को जन स्वीकार्यता मिली हो। वर्ष 2004 में भाजपा के 'इंडिया शाइनिंगÓ को जनता ने ठुकरा दिया। कुछ जुमलों को तो जनता ने न सिर्फ नकारा, बल्कि एक जवाबी नारा देकर पुरजोर विरोध भी किया। जैसे 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी द्वारा दिए गए नारे 'चौकीदार चोर हैÓ का प्रतिकार 'मैं भी चौकीदारÓ रूपी प्रचंड गर्जना में मिला। फिर भी ऐसी जन फटकार से बेफिक्र कांग्र्रेस के युवराज राहुल गांधी नए-नए जुमले गढ़ते रहे। इसी कड़ी में उन्होंने पिछले कुछ समय से 'अंबानी और अदाणीÓ को अपशब्द के रूप में उपयोग कर अपनी राजनीति का केंद्र बिंदु बना लिया है। यह दुस्साहस ही है कि जिस गांधी परिवार पर तमाम घोटालों के आरोप लगते रहे और जो भ्रष्टाचार के मामलों में जमानत पर बाहर हैं वे आखिर उन कारोबारी घरानों को क्यों निशाना बना रहे हैं जिन्होंने उद्योग लगाकर, रोजगार देकर बड़ी मात्रा में राष्ट्र के लिए संपदा सृजन किया है। यही नहीं कांग्र्रेस ने इन्हीं अंबानी और अदाणी से चुनावी चंदा और यात्रा के लिए चार्टर्ड विमान जैसी सुविधाएं भी बेहिचक ली हैं। साथ ही अंबानी और अदाणी को अपने शासनकाल में विभिन्न उद्योगों के लाइसेंस व स्वीकृति भी दी हैं। ऐसी विसंगतियों और प्रकट पाखंड के बावजूद राहुल गांधी द्वारा बार-बार की जा रही इस जुमलेबाजी के बाद 'अंबानी-अदाणीÓ का मसला आज चर्चा के केंद्र में है। यहां तक कि दिल्ली में जारी किसान आंदोलन में भी दोनों उद्योगपति निशाने पर हैं। जहां राहुल ने कृषि कानूनों को 'अंबानी अदाणी कानूनÓ बताया वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों ने उनके उत्पादों के बहिष्कार की मुहिम शुरू कर दी।

राहुल को लगता है कि बड़े उद्यमियों से ईष्र्या भाव का राजनीतिक दोहन करने के साथ ही वह उनकी गुजराती पृष्ठभूमि के कारण जनता के मन में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति शंका के बीज रोपित कर पाएंगे। यह आकलन क्षुद्र वृत्तियों के सहज मानवीय संबोधन की आशा पर आधारित है। जबकि पिछले चुनाव में राफेल जैसे आरोपों को सिरे से खारिज कर जनता ने मोदी की ईमानदारी पर अपनी मुहर लगाई। यदि राहुल ने पिछले कुछ जनमतों को ठीक से समझा होता तो वह जानते कि भारतीय समाज अब जाति, भाषा और क्षेत्रीयता की बेडिय़ों को तोड़कर आकांक्षाओं से भरा वह भविष्योन्मुखी और आश्वस्त समाज बन रहा है जिसमें अंबानी और अदाणी ईष्र्या के पात्र न होकर युवाओं के लिये प्रेरणास्रोत हैं। साम्यवाद और समाजवादी राजनीति का सिमटता दायरा इसका प्रमाण है। नए भारत में वर्ग संघर्ष, धन-संपन्नता से द्वेष और उस द्वेष को बौद्धिक प्रपंचों द्वारा गढ़े गए विचारधारा रूपी ढकोसलों में कोई रुचि नहीं है। माक्र्स और उनके देसी चेले अब भारतीय युवाओं को वे आकॢषत नहीं करते। इसके उलट वॉरेन बफे, स्टीव जॉब्स और इंदिरा नूई नए आदर्श हैं। यदि फिल्मों को लोक संस्कृति का बिंब माना जाए तो वहां भी कथानक बदल रहे हैं। उनमें कभी उद्यमियों का खलनायक के रूप में चित्रण हुआ करता, परंतु आज उनके नायकत्व पर फिल्में बनती हैं। मणिरत्नम जैसे दिग्गज फिल्मकार खुद धीरूभाई अंबानी के जीवन पर 'गुरुÓ फिल्म बना चुके हैं। तमिल फिल्म 'अंबासमुद्रम अंबानीÓ में उद्यमी बने नायक शंकरनारायणन ने रिलीज के बाद अपना नाम ही अंबानी शंकर रख लिया।

देर से ही सही, परंतु भारतीय अब समझने लगे हैं कि उनका भविष्य समाजवादी नारों में नहीं बल्कि उद्योग, व्यवसाय और संपदा सृजन में है। हालांकि इस बोध से आगे बढ़कर वैश्विक स्पर्धा में संपन्नता के संबंध में अमेरिकी विचारक पीटर जेक ओ रूर्क के विचार उल्लेखनीय है। वर्ष 1998 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'ईट द रिचÓ में उन्होंने प्रश्न किया कि 'क्यों कुछ स्थान अन्य जगहों से अधिक संपन्न होते हैं?Ó वह जवाब देते हैं कि इसकी वजह बुद्धि तो नहीं हो सकती, क्योंकि 'कोई भी जगह बेवर्ली हिल्स से ज्यादा मूढ़़ नहीं, परंतु वहां के नागरिक पैसों में लोट रहे हैं जबकि शतरंज की लोकप्रियता वाले रूस में लोग सूप बनाने के लिए पत्थर उबाल रहे हैं।Ó तब रूस की वित्तीय हालत बहुत खस्ता थी। इस प्रकार ओ रूर्क कहते हैं कि 'यदि खनिज संपदाएं संपन्नता तय करतीं तो कई अफ्रीकी देश स्कैंडेनेवियाई देशों से अमीर होतेÓ और यदि शिक्षा संपन्नता का कारण होती तो 99 प्रतिशत साक्षरता दर वाले उत्तर कोरिया की प्रति व्यक्ति आय 44 प्रतिशत साक्षरता दर वाले मोरक्को से एक चौथाई न होती। कई पहलुओं पर विचार के बाद ओ रूर्क का निष्कर्ष यही रहा कि संपदा सृजन और उद्यमियों का सम्मान करने वाले समाज ही संपन्न बनते हैं। अमेरिका इसका जीवंत उदाहरण है। हेनरी फोर्ड और रदरफोर्ड से लेकर जैक वैल्च और बिल गेट्स अमेरिकी समाज के हीरो हैं। दूसरी ओर राहुल और उनकी जैसी उद्योग विरोधी मानसिकता के लोग हमारे सफल उद्यमियों को अपशब्द का पर्याय बनाकर हमें वापस उस समाजवादी खुमारी में वापस धकेलना चाहते हैं जिससे देश बड़ी मुश्किल से उबरा है। यदि 'अदाणी-अंबानीÓ की राहुल की निंदा का आशय 'क्रोनी कैपिटलिज्मÓ यानी साठगांठ वाले पूंजीवाद से है तो भी वह मोदी सरकार के किसी नीतिगत फैसले पर वाजिब सवाल उठाने में भी नाकाम रहे हैं।

वहीं संप्रग का शासन अवश्य तमाम घोटालों का गवाह रहा। उसमें खास लोगों को लाभ पहुंचाया गया। कोयला घोटाले से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम की बंदरबांट हुई। नेशनल हेराल्ड मामले में जांच की आंच तो गांधी परिवार की देहरी तक पहुंच गई। इस लिहाज से देखें तो क्रोनी कैपिटलिज्म के लिए 'अदाणी-अंबानीÓ के बजाय 'वाड्रा-गांधीÓ कहीं अधिक उपयुक्त जुमला था। अपनी पुस्तक 'द राइज एंड फॉल ऑफ नेशंसÓ में रुचिर शर्मा बताते हैं कि यह भारत का वह दौर था जिसमें दिल्ली के छतरपुर स्थित फार्म हाऊस पाॢटयों में आए अधिकांश अतिथि या तो बेल पर छूटे हुए होते थे या फिर जेल जाने की तैयारी में। ऐसे में जब राहुल 'चौकीदार चोर हैÓ या 'अदाणी-अंबानीÓ सरीखे जुमले फेंकते हैं तो वह न सिर्फ भ्रम फैलाते हैं, बल्कि अपने वक्त के शासकीय अपराधों का ठीकरा भी मोदी सरकार पर ही फोडऩे का प्रयास भी करते हैं।

(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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