फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की बातों पर विविध प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। मुस्लिम नेताओं की ओर से भी। यदि दोनों को मिलाकर देखें तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफिर-मोमिन संवाद का उदाहरण है। भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी चर्चा हो रही है। इसलिए अच्छा रहेगा कि सभी बातों को सामने रखकर मूल्यांकन करें, क्योंकि कई बिंदुओं पर भारतीय स्थिति में भी ये बातें लागू हैं। मैक्रों की बातों में मुख्य बात फ्रांस में अलगाववाद का मुकाबला करना है। उन्होंने इस्लामवाद का भी उल्लेख किया। मैक्रों के अनुसार, इस्लाम एक विश्वव्यापी संकट का सामना कर रहा है, जिसमें धार्मिक और राजनीतिक तत्वों के बीच तनाव प्रमुख है। उन्होंने फ्रांस में इस्लामी व्यवहार को विदेशी प्रभाव से मुक्त करने की जरूरत बताई। स्थानीय इमामों का बाहर प्रशिक्षण, फ्रांसीसी शिक्षा से दूरी, स्थानीय इस्लामी संस्थाओं को विदेशों से आने वाले धन, आदि इसके उदाहरण हैं। यह सब फ्रांसीसी मुसलमानों को फ्रांस के राष्ट्रीय मूल्यों 'सेक्युलरिज्म और स्वतंत्रताÓ से दूर करते हैं। इसलिए मैक्रों ने एक 'विवेकशील इस्लामÓ की जरूरत बताई। पेरिस में एक चेचेन मुस्लिम द्वारा शिक्षक सैम्युयल पैटी के कत्ल के बाद मैक्रों ने फ्रांस के राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा पर और भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि उग्रवादी लोग ऐसे काम करते हैं ताकि चाहे-अनचाहे सभी मुसलमानों को अपनी ओर खींच सकें, जबकि सभी मुसलमान उन कारनामों का समर्थन नहीं करते। इसके लिए उन्होंने 'इस्लामी अलगाववादÓ के विचार को दोषी बताया, जो फ्रांस में राष्ट्रीय व्यवस्था से अलग 'एक समानांतर व्यवस्थाÓ बनाना चाहता है।

मैक्रों के शब्दों में, 'हमारा संघर्ष मजहब के नाम पर पतन की ओर जाने के विरुद्ध है।Ó हमें ऐसे लोगों को बचाना है, जो मजहब में विश्वास के साथ-साथ फ्रांस के राष्ट्रीय मूल्यों में भी निष्ठा रखते हैं। उन्होंने दोहराया कि फ्रांसीसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी भी विचार या व्यक्तित्व की आलोचना या कार्टून बनाना शामिल रहा है। इसे रोकने के लिए घृणा, हिंसा और दूसरों का अपमान बंद होना चाहिए। ज्ञात हो कि हालिया वर्षों में फ्रांस में तमाम जिहादी हमलों में एक-एक बार में सौ से अधिक लोगों को मारा जा चुका है। पेरिस में शिक्षक के कत्ल के बाद तीन और लोग नीस शहर में मार दिए गए। फ्रांस के कई मुस्लिम नेताओं ने मैक्रों की चिंता का समर्थन किया है, पर मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मुहम्मद ने बेहद हिंसक और भड़काऊ बयान दिया। उन्होंने मैक्रों को संबोधित करते हुए ट्विटर पर लिखा कि 'अतीत के संहारों के कारण मुसलमानों को क्रोधित होने और लाखों-लाख फ्रांसवासियों को मार डालने का अधिकार है। चूंकि आपने एक क्रोधित आदमी के काम के लिए मुसलमानों के धर्म को दोषी ठहराया, इसलिए मुसलमानों को फ्रांसीसियों को दंड देने का अधिकार है।Ó यह निश्चित रूप से गलत आरोप है। मैक्रों ने वैसा कुछ नहीं कहा, जैसा महातिर कह रहे हैं। मैक्रों ने तो राजनीतिक इस्लाम और इस्लाम के धाॢमक पक्ष को अलग करके देखने का ही आह्वïान किया है। इस पर चुप्पी से ही कट्टर इस्लामी तत्व आम मुसलमानों को अपनी अलगाववादी योजनाओं में घसीट लेते हैं। मानों कानूनों का उल्लंघन कर शरीयत को सब पर थोपना, इसके लिए कत्ल और हमले करना आदि भी धर्म ही हो।

इस्लाम के धाॢमक पक्ष यानी नमाज, रोजा, हज, ईद, मस्जिद आदि से फ्रांसीसी राष्ट्र को कोई समस्या नहीं है। समस्या राजनीतिक इस्लाम से है, जो देश की लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राज्य-प्रणाली को चुनौती देते हुए उस पर शरीयत लादना चाहता है। यह संपूर्ण राष्ट्रीय जीवन पर कब्जे की योजना है, जिसमें विचार-विमर्श, शिक्षा, खान-पान, पोशाक, सामुदायिक व्यवहार, आदि सब कुछ पर इस्लाम थोपने की मंशा है। इसे खुलकर खारिज किए बिना कोई लोकतांत्रिक, सेक्युलर राज्य टिक नहीं सकता। महातिर का हिंसक बयान इसी का सुबूत है कि उनके जैसे इस्लामी नेता हर कहीं इस्लामी राजनीति थोपने के लिए गलतबयानी और हिंसा का आह्वïान करते रहते हैं, जबकि उनके अपने शासन वाले देशों में गैर-मुस्लिमों की स्थिति दूसरे-तीसरे दर्जे की रखी जाती है, लेकिन फ्रांस या भारत जैसे देशों पर दबाव बनाया जाता है कि वे दुनिया भर के इस्लामी नेताओं की दखलंदाजी स्वीकार करें, वरना गालियां, धमकियां सुनें। यह कोई धाॢमक व्यवहार नहीं, बल्कि खुली राजनीतिक तानाशाही है।

खुद मलेशिया में भारतीय, चीनी मूल के नागरिकों के विरुद्ध वैधानिक रूप से भेदभाव होता है, जो अधिकांश हिंदू या बौद्ध हैं। वहां संविधान की धारा 153 की आड़ में मुसलमानों को 'स्थानीयÓ कहकर विशेषाधिकार दिए गए हैं। चूंकि मलेशिया में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनके विरोध की सीमा है। कुछ यही विशेषाधिकार यूरोपीय देशों में लेने का दबाव ही महातिर का आशय है। इसके लिए 'लाखों-लाख फ्रांसीसियों को मार डालने का अधिकारÓ जताना खुली धमकी है। क्या इसी से यह स्पष्ट नहीं कि राजनीतिक इस्लाम को धाॢमक इस्लाम से अलग करना और उस पर अंकुश रखना कितना जरूरी है? जो मतवाद अपने राज में तो दूसरों को नीचा दर्जा देता ही है, दूसरों के राज वाले देशों में भी हिंसक दबाव बनाना अपना अधिकार समझता है, वह धर्म के लिफाफे में शुद्ध राजनीति है।

महातिर मुहम्मद कोई जिहादी नेता नहीं, बल्कि विश्व के सबसे उम्रदराज मुस्लिम राजनेता हैं। उनकी बातें किसी भटके हुए उग्रवादी की नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 'मैक्रों नहीं दिखा रहे कि वह सभ्य हैं। वह इस्लाम और मुसलमानों को उस अपमानजनक शिक्षक की हत्या का दोषी बताने में बड़े आदिम लगते हैं।Ó सवाल है कि क्या किसी भिन्न मत के व्यक्ति का गला काट देना अत्यंत बर्बर, असभ्य काम नहीं? फ्रांस को अपने संविधान और नैतिकता से चलने का वही अधिकार है, जो मलेशिया को है। भारतीयों को इसलिए ध्यान देना चाहिए, क्योंकि गत जनवरी में ही महातिर ने नागरिकता संशोधन कानून के बाद भारत की भी तीखी आलोचना की थी। तब वह प्रधानमंत्री पद पर थे। तब भी उन्होंने साफ तौर पर भड़काऊ बयानबाजी की थी।

विवेकशील मुसलमानों को धाॢमक इस्लाम से राजनीतिक इस्लाम को बिल्कुल अलग करके खारिज करना होगा, क्योंकि यही सारी दुनिया में गैर-मुसलमानों पर दबदबा जमाने के लिए पूरे मुस्लिम समुदाय को उभारता है। तमाम जिहादी हिंसा का कारण कुछ नासमझ मुसलमान नहीं, बल्कि वह राजनीतिक मतवाद है, जो उन्हें इसके लिए प्रेरित करता है। अत: इस मतवाद से लडऩा ही होगा। यह सैनिक युद्ध नहीं, बल्कि वैचारिक लड़ाई है। इससे बचना आत्मघाती होगा।

(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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