बिहार में चुनाव का अवसर हो और इस राज्य के पिछड़ापन का मुद्दा नहीं उछले, ऐसा भला कैसे हो सकता है? हर चुनाव में यह होता है। इस बार भी यह मुद्दा उछल रहा है। किंतु विडंबना यह है कि जो राजनीतिक शक्तियां इस राज्य के पिछड़ेपन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार रही हंै, वही इस मामले में आज अधिक मुखर हैं। अविभाजित बिहार में देश का करीब 40 प्रतिशत खनिज पदार्थ पाया जाता है। बिहार की भूमि भी काफी उर्वर है। राज्य में कई सदानीरा नदियां बहती हैं। फिर भी आजादी के बाद इस राज्य में न तो कृषि का अपेक्षित विकास हुआ और न उद्योग का।

आजादी से पहले टाटानगर यानी जमशेदपुर बसा। सोन नहर का भी निर्माण अंग्रेजों ने ही कराया था। उससे वहां खुशहाली आई, पर आजादी के बाद कोई नया टाटानगर नहीं बसा। सरकारी क्षेत्र में लोक उपक्रम लगे, पर उनमें से अधिकतर सफेद हाथी ही साबित हुए। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जिस तरह की ईमानदारी एवं कार्यकुशलता की जरूरत थी, उसे सुनिश्चित नहीं किया जा सका। रेल भाड़ा समानीकरण ने अविभाजित बिहार में बड़े उद्योगों का विकास रोक दिया। उधर बिहार में कृषि-सिंचाई पर अपेक्षाकृत कम सरकारी खर्च के कारण खेती का भी अपेक्षित विकास नहीं हो सका। दरअसल कृषि प्रधान राज्य में खेती के विकास से ही किसानों की क्रय शक्ति बढ़ती। उससे उद्योगों का भी विकास होता, पर ऐसा नहीं हो सका। जब अधिकांश आबादी की क्रय शक्ति बढ़ी ही नहीं तो कारखानों के माल को कौन खरीदता? यदि कोई नहीं खरीदेगा तो कारखाने विकसित कैसे होंगे? नतीजतन बिहार को पिछड़ा रहना ही था।

पिछड़ेपन के मामले में 1970 में बिहार का देश के राज्यों में नीचे से दूसरा स्थान था। तब सर्वाधिक पिछड़ा राज्य ओडिशा था। 1993 तक बिहार आॢथक मामलों में उसी स्थिति में था जिस स्थिति में शेष भारत उससे 15-20 साल पहले था यानी अन्य राज्यों की तरक्की होती गई, पर बिहार अन्य राज्यों से पिछड़ता गया। इसके लिए कौन जिम्मेदार थे? जो जिम्मेदार रहे, उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी आज बिहार के चुनाव में कैसी-कैसी बातें कर रहे हैैं? 1951 से 1990 तक का हाल जानिए। कृषि एवं इससे संबंधित क्षेत्र में केंद्र सरकार ने बिहार में प्रति व्यक्ति 172 रुपये खर्च किए। उसी अवधि में पंजाब में 594 रुपये खर्च किए गए। आंतरिक संसाधन जुटाने में भी बिहार सरकार लगभग विफल रही। वित्तीय वर्ष 1999-2000 में बिहार सरकार ने आंतरिक स्रोत से कुल 1982 करोड़ रुपये जुटाए। उन्हीं दिनों आंध्र सरकार की सालाना आय करीब छह हजार करोड़ रुपये होती थी। केंद्रीय आॢथक सहायता राज्य के आंतरिक राजस्व के अनुपात में ही मिलनी थी। अब आप ही बताइए कि बिहार के 'बीमारूÓ राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) की श्रेणी में ला देने के लिए कौन-कौन से दल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जिम्मेदार रहे?

2005 के बाद स्थिति में सुधार होना शुरू हुआ, पर धीमी गति से ही, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। इस बीच आबादी बढ़ी। खर्च बढ़ा। लोगों की जरूरतें बढ़ीं। फिर बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग शुरू हुई। अंतत: केंद्र सरकार ने कह दिया कि यह संभव नहीं है। फिर तो बिहार सरकार को खुद ही राज्य का विकास करना है। हालांकि 2014 के बाद बिहार को मिल रही केंद्रीय सहायता में काफी वृद्धि हुई है, पर वह जरूरतों को देखते हुए नाकाफी है। बेहतर प्रशासन एवं वित्तीय प्रबंधन के कारण अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार सरकार की अपनी आय 38 हजार 606 करोड़ रुपये होगी। 2004-05 में बिहार सरकार का सालाना बजट करीब 25 हजार करोड़ रुपये का था। अब वह बढ़कर करीब दो लाख करोड़ रुपये का हो गया है। सरकारी खर्चे में 'लीकेजÓ पहले बहुत अधिक था, अब कम हुआ है, पर बंद नहीं हुआ है। चुनाव के बाद बनने वाली सरकार को इसे रोकने पर ध्यान देना होगा। तभी बिहार का विकास और भी तेज गति से संभव है।

आजादी के पहले रेल भाड़ा समानीकरण नीति नहीं थी, पर बाद में इसे लागू कर दिया गया। फिर तो रेलगाड़ी के जरिये धनबाद से खनिज पटना पहुंचाने में जितना भाड़ा लगता था, उतना ही भाड़ा मुंबई पहुंचाने में लगता था। इसका परिणाम यह हुआ कि बाहर के उद्योगपतियों के सामने बिहार आकर उद्योग लगाने की मजबूरी नहीं रह गई। आजादी से पहले ऐसी मजबूरी थी। इसीलिए जमशेदजी जी टाटा ने बिहार आकर टाटानगर में औद्योगिक नगरी बसाई।

रेल भाड़ा समानीकरण की नीति बनाते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, 'राष्ट्र को सबल बनाना है तो क्षेत्रीय विषमता मिटानी होगी। इसके लिए रेल भाड़ा समानीकरण जरूरी है।Ó इस काम में नेहरू के मुख्य सलाहकार थे-सीडी देशमुख, टीटी कृष्णमाचारी और प्रताप सिंह कैरो, पर कैरो साहब ने कृषि पर होने वाले केंद्रीय खर्च में से सर्वाधिक हिस्सा पंजाब के लिए ले लिया। उस पैसे से भाखड़ा नांगल बना। उससे पंजाब की खेती चमकी। बिहार के किसी नेता ने जब जवाहरलाल नेहरू से कोसी नदी पर बांध बनाने के लिए आॢथक मदद मांगी तो उन्होंने कहा कि इसके लिए लोगों से श्रमदान की अपील कीजिए। यदि गंडक सिंचाई योजना और कोसी नदी योजना पर आजादी के बाद से ही ठोस काम हुआ होता तो खेती के मामले में बिहार तभी विकसित राज्य हो गया होता।

जब रेल भाड़ा समानीकरण की नीति से क्षेत्रीय विषमता घटने के बदले बढ़ी तो पिछली सदी के अंतिम दशक में उसे समाप्त कर दिया गया, पर एक अनुमान के अनुसार तब तक अविभाजित बिहार को करीब 10 लाख करोड़ रुपये से वंचित हो जाना पड़ गया था। यदि टाटानगर की तरह अन्य उद्योग बिहार में लगते तो 10 लाख करोड़ रु का लाभ बिहार को मिल जाता और वह पिछड़ा नहीं रहता।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैैं)

Posted By: Arvind Dubey

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