दिल्ली में भड़की भीषण हिंसा के बाद दिल्ली पुलिस एक फिर चर्चा के केंद्र में है। इससे पहले गत वर्ष नवंबर में दिल्ली की तीस हजारी अदालत में वकीलों के साथ संघर्ष की विचलित करने वाली तस्वीरें पूरे देश ने देखी थीं। अधिवक्ताओं के दुर्व्यवहार से पुलिस का मनोबल टूट गया था। इसके बाद शाहीन बाग के धरने जैसी समस्या ने दिल्ली में दस्तक दी, जिसका आज तक समाधान नहीं मिल सका। इसी दौरान दिल्ली पुलिस पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे। मानो इतना ही काफी नहीं था कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कार्रवाई को लेकर दिल्ली पुलिस पर आरोप लगे कि उसकी ढिलाई से हमलावर भागने में कामयाब रहे।

दिल्ली में बीते पांच दिनों के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि कई महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने वैसी वांछित कार्रवाई नहीं की, जैसी एक पेशेवर एवं दक्ष पुलिस बल से अपेक्षा की जाती है। इसमें एक पहलू यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे के मद्देनजर पुलिस के समक्ष दुविधा थी कि वह बल प्रयोग करे अथवा नहीं? यह असमंजस की स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रही, क्योंकि निहित स्वार्थी तत्व यही चाहते थे कि राष्ट्रपति ट्रंप के समक्ष किसी भी तरह यही सिद्ध किया जाए कि नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए एकतरफा और मुस्लिम विरोधी है। इससे यह संदेश जाएगा कि जब भारत अपनी राजधानी में ही विधि व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो पूरे देश पर उसका क्या नियंत्रण होगा? दिल्ली हिंसा के मामले में एक बार फिर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई के संबंध में यह बात सामने आई कि उसके द्वारा 120 करोड़ रुपये विध्वंसक कार्रवाई हेतु इकट्ठा किए गए और उन्हें अन्य तत्वों तक पहुंचाया गया। यह भी आरोप है कि उसका एक प्रमुख कार्यालय शाहीन बाग के समीप है और पर्दे के पीछे से वही शरारतपूर्ण कार्रवाई कर रहा है। इस धरने से आम लोगों को परेशानी हो रही है और यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस पर चिंता जताई।

हैरानी है कि उनके हस्तक्षेप के उपरांत भी कोई प्रभावी कार्रवाई दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर धरना प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। इसके उपरांत कुछ नेताओं ने भड़काऊ बयान दिए। उनके ऊपर कार्रवाई नहीं हुई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि प्राथमिकी यानी एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।

पूर्वी दिल्ली का जो इलाका हिंसा की सबसे अधिक चपेट में आया, वह वही क्षेत्र है जहां उसी दिन हिंसक घटनाएं शुरू हो गई थीं, जिस दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप दिल्ली आए थे। यह हिंसा दूसरे दिन भी जारी रही। यह हिंसा कितनी भयावह थी, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसमें 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई। इनमें हेड कांस्टेबल रतन लाल और खुफिया ब्यूरो यानी आईबी के अंकित शर्मा शहीद हो गए। अंकित शर्मा की जिस बर्बरता के साथ हत्या की गई, उससे यह स्पष्ट है कि एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत आपराधिक तत्वों ने इस वारदात को अंजाम दिया।

पूरे घटनाक्रम की यदि गहराई से समीक्षा की जाए तो कुछ तथ्य स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। पुख्ता सूचनाएं प्राप्त होने के बावजूद वांछित पुलिस कार्रवाई का न होना शर्मनाक होने के साथ-साथ अत्यंत आपत्तिजनक है। इन गंभीर परिस्थितियों में तत्काल प्रभाव से धारा 144 लागू की जानी चाहिए थी। प्रभावी निगरानी के साथ-साथ वांछित और सक्रिय अपराधियों की गिरफ्तारी पहले चरण में ही हो जानी चाहिए थी। अभियान चलाकर जायज और नाजायज हथियारों को जब्त किया जाना सुनिश्चित होना चाहिए था। अवांछित, सांप्रदायिक और आपराधिक तत्वों के विरुद्ध सीआरपीसी के तहत निरोधात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए थी। प्रभावित क्षेत्र में गश्त, नाकाबंदी, निगरानी, वॉच टावर और हाई रेजोल्यूशन सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने चाहिए थे। जिन लोगों ने भड़काऊ बयान दिए थे, वे किसी भी दल, संप्रदाय और जाति के हों अथवा किसी भी पद पर हों, उनके विरुद्ध समुचित वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए थी।

कार्रवाई तो छोड़ दें, जो पुलिस का मौलिक कार्य है रोकना, टोकना और पूछना, वह भी नहीं हो सका। इसके भयानक परिणाम हुए। अप्रत्याशित आगजनी, लूटपाट और गंभीर सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न् हो गया। साफ है कि स्थानीय तौर पर आंतरिक सुरक्षा योजना के क्रियान्वयन की जो व्यवस्था होती है, वह नहीं हो पाई, क्योंकि शायद पहले कोई पूर्वाभ्यास नहीं हुआ। यह मानने के पर्याप्त कारण हैैं कि अपराध एवं अपराधियों और स्थानीय भूगोल की अनभिज्ञता ने पुलिस का कार्य अत्यधिक दुष्कर बना दिया। परिस्थितियों से स्पष्ट है कि अपराधियों का मनोबल बहुत ऊंचा और पुलिस का बल, मनोबल उनके समक्ष वांछित स्तर का नहीं था। लगता है कि जनसंपर्क के संबंध में जो कार्रवाई होनी चाहिए थी, वह भी नहीं की गई। इससे विश्वसनीयता का सेतु नहीं बन पाया और पुलिस के प्रयास निष्प्रभावी साबित हुए।

यह संतोष का विषय है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने प्रभावित क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण किया, परंतु यह कार्य पुलिस के सभी स्तर के अधिकारियों से लेकर पुलिस आयुक्त का था कि वे जनता से संपर्क बनाए रखें, व्यापक भ्रमण करें, मोहल्ला सुरक्षा समितियों का गठन कर उन्हें सक्रिय करें, जिससे विषम परिस्थितियों में अपने संपर्क सूत्रों के माध्यम से जनता में सुरक्षा और आत्मविश्वास पैदा कर सकें, जिसका कि नितांत अभाव दिखा। सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत तीखी टिप्पणी करते हुए दिल्ली पुलिस की पेशेवर दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थल पर धरने प्रदर्शन का कोई औचित्य नहीं है, फिर भी धरना जारी है। आखिर क्यों? कल्पना करें कि यदि यही परिस्थिति अमेरिका और ब्रिटेन में बनती तो क्या होता?

यह सर्वविदित है कि प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार हेतु महत्वपूर्ण सात बिंदुओं पर कार्रवाई हेतु निर्देश जारी किए थे। यह देश का और दिल्ली का दुर्भाग्य है कि जो सुधार 2006 में ही लागू हो जाने चाहिए थे, वे आज तक लागू नहीं हो पाए और न ही भविष्य में उनके लागू होने की कोई संभावना है। आखिर राजनीति से प्रभावित और सुधार से वंचित एक पुलिस बल कारगर कैसे हो सकता है? यह कोई विवाद का प्रश्न नहीं है कि अपराधी किसी जाति, संप्रदाय या दल का हो, उसके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई निर्भीक तरीके से होनी चाहिए। भविष्य में यदि हम इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं देखना चाहते तो राष्ट्र को निर्णय लेना होगा कि पुलिस सुधार शीघ्र सुनिश्चित किए जाएं, क्योंकि अब यह विकल्प नहीं, एक अनिवार्यता है।

(लेखक उप्र पुलिस के डीजीपी रहे हैं)

Posted By: Ravindra Soni