आशीष व्यास

प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने 1977 में एक कटाक्ष-कथा लिखी थी - 'जादू की सरकार।' संदर्भ था - कांग्रेस की 'सत्ता-यात्रा' के 30 साल। व्यंग्य के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं - '...खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाए कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा। जो दाएं नहीं है, वह कांग्रेस है। जो बाएं नहीं है, वह कांग्रेस है। जो मध्य में नहीं है, वह कांग्रेस है। जो मध्य से बाएं है, वह कांग्रेस है। मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है। कांग्रेस सर्वत्र है। हर कुर्सी पर है। हर कुर्सी के पीछे है। हर कुर्सी के सामने खड़ी है। कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा। जो कहा, वह किया नहीं। जो किया, वह बताया नहीं। जो बताया, वह था नहीं। जो था, वह गलत था। एकता पर जोर दिया लेकिन लड़ाते रहे। आश्वासन दिए पर निभाए नहीं। जिन्हें निभाया, वह आश्वस्त नहीं हुए। ...'यूथ' को बढ़ावा दिया, बुड्ढों को टिकट दिया। जो केंद्र में बेकार था, उसे राज्य में भेजा। जो राज्य में बेकार था, उसे केंद्र में ले आए।' स्वाभाविक है ढेर सारे तात्कालिक प्रसंग ही ऐसी धारणाओं के केंद्र में रहे होंगे। कुछ अनकहे रह गए होंगे और कुछ ऐसे भी होंगे जिन्होंने शब्द पाकर खुद को हमेशा के लिए जीवित कर लिया। आज चार दशक बाद यदि ऐसे संदर्भ की प्रसंग सहित व्याख्या करें तो संक्षिप्त में जो सामने आएगा वह यह बताएगा कि - 'अनिर्णय और अंतर्विरोध के कारण कुछ ऐसा लगातार घट रहा होगा जो अनुशासन और अराजकता के बीच फंसे दल को दलदल में धकेल रहा होगा!'

इसी कहानी को नए किरदारों के साथ अब लेकर आते हैं मध्य प्रदेश। कलह के कारणों और विवाद की वजहों तक पहुंचने से पहले वे सवाल, जो इन दिनों मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में 'कलमबद्ध-कदमताल' कर रहे हैं। क्या कांग्रेस में गुटीय राजनीति चरम पर है? क्या क्षेत्रीय-क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाओं ने अनुशासन को क्षत-विक्षत कर दिया है? क्या पार्टी के पुराने चेहरे नई उम्मीदों पर सवार होकर 'सत्ता-सुख' के लिए 'निर्णायक-संघर्ष' में लगे हैं? क्या 15 साल पुराने राजनीतिक वनवास को समाप्त करने में योगदान देने वाले हक से अपना हर्जाना मांग रहे हैं? क्या उम्र, अनुभव और अभ्यास की राजनीति ने देश की सबसे पुरानी पार्टी की परिभाषा बदल दी है? या फिर, नई-पुरानी पीढ़ी में होने वाले स्वाभाविक मन-मतभेद से प्रदेश कांग्रेस भी अब सीधा संवाद कर रही है?

पार्टी के ढेर सारे जिम्मेदार-जवाबदेह चेहरे ऐसी किसी स्थिति से अपनी असहमति दर्ज करवा रहे हैं और सार्वजनिक रूप से यह मान भी रहे हैं कि कहीं कुछ तो ऐसा है, जिसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। एक ही दृष्टिकोण से आए दो अलग बयान यह बताते हैं कि कुछ भी अस्वीकार कर लिया जाए, लेकिन इस स्थापना को मन से मानने में कोई संदेह-संशय नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस की दलगत एकता अब तार-तार हो चुकी है। आगे बढ़ने से पहले कांग्रेस की जड़ों से जुड़ी स्थापित कुर्सियों की कुछ चुनिंदा पंक्तियां। आरोप-प्रत्यारोप के सियासी घमासान के बीच पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने ऊपर उठ रहे सभी सवालों को नकार दिया और कहा - '...मैं आरोपों से विचलित नहीं होता। मुझे राजनीति में 50 साल हो गए हैं। पिछले चार दिनों में जो कुछ भी हुआ, उसे मैं सीएम कमलनाथ और कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष पर छोड़ता हूं। हर पार्टी में अनुशासन होना चाहिए। चाहे कितना भी बड़ा नेता क्यों ना हो, कार्रवाई होनी चाहिए।' सत्ता और संगठन के शीर्ष पर बैठे मुख्यमंत्री-प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ परिवार के वरिष्ठ की तरह सामने आए और बोले - '...हर स्तर के नेताओं को अनावश्यक बयानबाजी से बचना चाहिए और बंद कमरे में बैठकर चीजों को सुलझाना चाहिए।' ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वन मंत्री उमंग सिंघार बनाम दिग्विजय सिंह विवाद पर कहा - 'सरकार को स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए, इसमें किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। सरकार खुद के आधार और दम पर चलना चाहिए। कमलनाथ जी को उमंग सिंघार की बात सुनना चाहिए, दोनों पक्षों को बैठाकर सुलह-मशविरा भी होना चाहिए।'

बयानों की इस खुली राजनीतिक जंग से आखिर क्या सीखा-समझा जाए?

क्या एक समय मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया अब प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सूबे की सियासत करना चाहते हैं? यदि नहीं...तो पार्टी के आंतरिक अनुशासन से अलग सार्वजनिक बयानबाजी क्यों?

क्या इस अंतर्विरोध पर मुख्यमंत्री कमलनाथ के आग्रह-आदेश का असर कुछ कम हो रहा है? यदि नहीं...तो बयानों की बंदरबांट बंद क्यों नहीं हो रही है?

क्या वास्तव में दिग्विजय सिंह 'शैडो-सीएम' की भूमिका में काम कर रहे हैं? यदि नहीं...तो आरोपों का केंद्र बार-बार उन्हीं के इर्द-गिर्द क्यों आ जाता है?

गहरा और गंभीर आश्चर्य इस बात को लेकर भी होता है कि एक ही वर्ष में कांग्रेस के दो चेहरे प्रदेश में दिखाई देने लगे हैं!

एक कांग्रेस वह थी!

अभूतपूर्व एकता दिखाते हुए, एक मन-एक वचन से विधानसभा चुनाव लड़ा। तब ना खेमेबंदी की खड़खड़ाहट थी और ना ही गुटबाजी की कलाबाजियां। जन आशीर्वाद यात्रा पर निकले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घेराबंदी करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने योजनाबद्ध तरीके से अलग-अलग राजनीतिक यात्राएं शुरू कर दीं। 15 साल पुरानी भाजपा सरकार से तर्क-तथ्य के साथ ढेर सारे सवाल पूछे गए। गांव-कस्बों से लेकर राजधानी के राजनीतिक गलियारों में जीत के लिए रणनीतिक फैसले किए गए! सालों से सोई कांग्रेस की ऐसी सक्रियता वर्षों बाद प्रदेश में महसूस की गई।

परिणाम देखिए...

बिजली-पानी-सड़क जैसे बुनियादी मुद्दों पर सत्ता से अपदस्थ हुई पार्टी ने चौंकाने वाली वापसी की।

एक कांग्रेस यह है!

अंतर्विरोधों ने एकता और अनुशासन जैसे शब्दों के अर्थ ही बदल दिए। पद-कद का प्रभाव शून्य में समा गया, निष्ठा-प्रतिष्ठा की लड़ाई शीर्ष पर आ गई। वरिष्ठ कहे जाने वाले नेता सार्वजनिक रूप से याचना करते रहे, अनुसरण करने वाली पंक्ति उन्हें अनसुना करती रही। बंद कमरों के खुले झगड़े सोशल मीडिया के जरिए गली-मोहल्लों की लड़ाई में बदलते दिखाई देने लगे। सम्मान से दी जाने वाली सलाह का स्थान अपमान और भाषाई अराजकता ने ले लिया। व्यक्तिगत हित बचाने और बनाए रखने के लिए शुरू हुई दौड़ ने स्वार्थ और सिद्धांत को एक साथ सिद्ध करना शुरू कर दिया। क्या कांग्रेस को सत्ता सौंपते हुए मतदाताओं ने ऐसी किसी अस्थिर स्थिति की कल्पना की होगी?

परिणाम देखिए...

मध्य प्रदेश में लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना सवालों के घेरे में आ गई है।

बहरहाल, यह सियासी घमासान दिल्ली दरबार तक पहुंच गया है। असंतोष के कारणों पर विस्तार से कहानी लिखी जा रही है। उपेक्षा से आहत नेताओं की बात भी सुनी जा रही है। स्वाभाविक है, इसी के बीच से ही सुलह का रास्ता निकाला जाएगा। एक होकर, एक दिखाई भी दें, यह पाठ फिर से दोहराया जाएगा। प्रयास यह भी किया जाएगा कि नाक का सवाल बनता निजी संघर्ष, विपक्ष के कानों तक नहीं पहुंचे! कटार जैसे कटाक्ष से व्यंग्य को स्थापित करने वाले हरिशंकर परसाई ने कहा भी है - 'मेरा ख्याल है नाक की हिफाजत सबसे ज्यादा इसी देश में होती है और या तो नाक बहुत नर्म होती है या छुरा बहुत तेज, जिससे छोटी-सी बात से भी नाक कट जाती है।'