CBSE 12th Exams: कोविड महामारी के कारण केंद्र सरकार ने पिछले साल की तरह इस साल भी सीबीएसई बोर्ड की 12वीं की परीक्षाएं न कराने का फैसला किया। 10वीं की परीक्षा न कराने का फैसला पहले ही कर लिया गया था। केंद्र सरकार के फैसले के बाद कई राज्यों ने भी 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं न कराने का फैसला किया है। अपने देश में 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं मील का पत्थर होती हैं। 10वीं के मुकाबले 12वीं की परीक्षा इसलिए ज्यादा महत्व रखती है, क्योंकि इस परीक्षा में मिले अंकों के आधार पर ही छात्र कालेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिला पाते हैं। कुछ छात्र ऐसे होते हैं, जो मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कई छात्र 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद विदेश पढऩे भी जाते हैं। चूंकि पिछले साल कोरोना संक्रमण फैलने के पहले कुछ विषयों की परीक्षाएं हो गई थीं, इसलिए रिजल्ट तैयार करने में कुछ आसानी हुई थी। इस बार एक भी विषय की परीक्षा नहीं हो पाई है, इसलिए रिजल्ट तैयार करने में मुश्किल पेश आएगी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है। सीबीएसई बोर्ड की ओर से केंद्र सरकार ने जल्द ही छात्रों के मूल्यांकन का तरीका बताने को कहा है। देखना है कि सुप्रीम कोर्ट उससे संतुष्ट होता है या नहीं?

सीबीएसई और अन्य राज्यों के बोर्ड छात्रों का मूल्यांकन चाहे जैसे करें, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस शैक्षिक सत्र में बहुत कम पढ़ाई हो पाई है। कुछ ही स्कूल थोड़े समय के लिए खुल सके। छात्रों ने जो भी पढ़ाई की, वह जूम और ऐसे ही प्लेटफार्म के जरिये आनलाइन ही की। आनलाइन पढ़ाई के चलते छात्र उस माहौल से वंचित रहे, जो उन्हेंं स्कूल जाने पर मिलता है। हालांकि पहले ऐसा लग रहा था कि सरकार 12वीं की परीक्षाएं आयोजित करने का मन बना रही है। कई राज्य सरकारें भी इसके पक्ष में थीं, लेकिन शायद बाद में यह पाया गया कि किसी तरह का जोखिम नहीं लिया जाना चाहिए। चूंकि अभी कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर समाप्त नहीं हुई, इसलिए परीक्षा कराना जोखिम भरा तो था ही। हो सकता है कि जुलाई-अगस्त तक माहौल परीक्षाओं के अनुकूल हो जाता, लेकिन इसकी गारंटी भी नहीं थी और छात्रों एवं अभिभावकों को और अधिक समय तक दुविधा में बनाए रखना ठीक नहीं होता। परीक्षाओं के आयोजन में एक जोखिम उसी दौरान संक्रमण की तीसरी लहर के सिर उठाने का भी था। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस लहर में बच्चों और किशोरों के चपेट में आने की आशंका है।

नि:संदेह परीक्षाओं की अपनी एक महत्ता होती है, लेकिन जानबूझकर जोखिम भी मोल नहीं लिया जा सकता। यदि सरकारें इस नतीजे पर पहुंचीं कि छात्रों की सेहत की चिंता ज्यादा जरूरी है तो यह उचित ही है। 12वीं की परीक्षाएं न कराने के फैसले के बाद प्रधानमंत्री ने छात्रों से बात की तो ज्यादातर ने इस फैसले को सही बताया। वे छात्र अधिक खुश नजर आए, जो इंजीनियरिंग या मेडिकल परीक्षा की तैयारी कर रहे हैैं। वे छात्र निराश हो सकते हैं, जो 12वीं में अधिक अंक लाकर अपने मनपसंद विश्वविद्यालय अथवा विदेश में पढऩा चाह रहे थे। फिलहाल यह कहना कठिन है कि विदेशी विश्वविद्यालय 12वीं के छात्रों की मूल्याकंन नीति को कितना महत्व देंगे? उनके साथ-साथ देश के चुनिंदा विश्वविद्यालय भी छात्रों के आकलन की अपनी कोई व्यवस्था अपना सकते हैं। ऐसे में नामी स्कूलों के छात्रों लाभ में रह सकते हैं और सामान्य स्कूलों के मेधावी छात्र घाटे में, क्योंकि यह एक धारणा है कि प्रतिष्ठित स्कूलों के छात्र पढ़ाई में अच्छे होते हैं। जो भी हो, 12वीं की परीक्षा के रद होने से परीक्षा का विकल्प खोजने की आवश्यकता बढ़ गई है। आगे हालात सामान्य होने पर क्या दशकों पुरानी परीक्षा प्रणाली बहाल की जाएगी या फिर उसका कोई विकल्प खोजा जाएगा? सवाल यह भी है कि क्या सीबीएसई और अन्य बोर्ड इतनी जल्दी कोई ऐसी तर्कसंगत एवं पारदर्शी मूल्यांकन की व्यवस्था बना पाएंगे, जो पुरानी परीक्षा व्यवस्था का उचित विकल्प साबित हो? आम तौर पर जो छात्र 12वीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास करते हैं, उन्हें आगे भी सफलता मिलती रहती है। अभी तक की जो व्यवस्था है, उसमें 12वीं की परीक्षा के अंक ही छात्रों की आगे की शिक्षा का निर्धारण करते हैं। एक तरह से यही अंक उनके भविष्य को दिशा देते हैं। अधिकांश छात्र अपनी रुचि वाली पढ़ाई के अनुरूप ही करियर का चयन करते हैं। नि:संदेह कई छात्र ऐसे भी होते हैं जो 12वीं में अच्छे अंक नहीं लाते और विश्वविद्यालयों में भी सामान्य छात्र गिने जाते हैं, लेकिन आगे चलकर सफल व्यक्ति बनते हैं और नाम कमाते हैं। आखिर ऐसे छात्रों की क्षमता और कौशल का परंपरागत परीक्षा में सही परीक्षण क्यों नहीं हो पाता? यह वह सवाल है, जो शिक्षाविदों के लिए चुनौती बना हुआ है। किशोरावस्था में किसी छात्र की मेधा के बारे में सही-सही पता कर लेना और उसके जीवन को दिशा देना आसान काम नहीं।

मोदी सरकार अपनी नई शिक्षानीति तेजी से लागू कर रही है। इस शिक्षा नीति को जब लाया गया था, तब इसका अनुमान नहीं था कि कोरोना संकट इतना विकराल रूप धारण कर लेगा। वैसे तो नई शिक्षा नीति में मेधा को पहचानने की बातें की गई हैं, लेकिन अब जब कोविड महामारी नई चुनौतियां पेश करने के साथ रोजमर्रा के जीवन को तेजी से बदल रही है और सुप्रीम कोर्ट को दो सप्ताह के अंदर मूल्यांकन का तरीका बताना है, तब फिर सदियों पुरानी परंपरागत परीक्षा का विकल्प खोजना किसी चुनौती से कम नहीं। हालांकि नई शिक्षा नीति यह कहती है कि छात्रों का मूल्यांकन महज परीक्षा में मिले अंको से नहीं होना चाहिए, लेकिन देखना होगा कि बिना परीक्षा छात्रों के मूल्यांकन का क्या तरीका अपनाया जाता है और वह मान्य भी होता है या नहीं? जो भी हो, परीक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जो छात्रों को तोता रटंत बनाने के बजाय उन्हेंं उनकी क्षमता की पहचान कराए। इसके लिए छात्रों का नियमित तौर पर रचनात्मक आकलन होना चाहिए। नई शिक्षा नीति में ऐसे आकलन पर जोर दिया गया है। राज्यों को चाहिए कि वे नई शिक्षा नीति को लागू करते समय उसके मूल उद्देश्य को हासिल करने की सार्थक कोशिश करें।

Posted By: Arvind Dubey

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