जॉन मेनार्ड कींस बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के सबसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे। वर्ष 1929 में शुरू हुए ग्रेट डिप्रेशन यानी महामंदी का अध्ययन करने के पश्चात उन्होंने पैराडॉक्स ऑफ थ्रिफ्ट यानी किफायत के विरोधाभास की अवधारणा पेश की। थ्रिफ्ट शब्द मूल रूप से पैसों के सावधानीपूर्वक उपयोग से जुड़ा है। कींस ने 1929 की महामंदी के बाद व्याप्त आर्थिक स्थितियों को समझाने के लिए उसका इस्तेमाल किया। 1929 में शेयरों और वस्तुओं की कीमतों में गिरावट के बाद लोगों ने बड़े पैमाने पर अपना खर्च घटा लिया। यदि कोई व्यक्ति अपने खर्च में कटौती करता है तो यह अलग बात है, लेकिन अगर यही चीज सामूहिक स्तर पर होने लगे तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि एक व्यक्ति का खर्च दूसरे व्यक्ति की आय है। इसलिए जब भी कभी समाज का एक बड़ा हिस्सा पैसा खर्च करना कम कर देता है तो अर्थव्यवस्था के लिए संकट खड़ा हो जाता है। इसे ही पैराडॉक्स ऑफ थ्रिफ्ट कहते हैं।

पिछले कुछ महीनों में ऐसा ही कुछ भारतीय अर्थव्यवस्था में देखने को मिल रहा है। गाड़ियों, दोपहिया वाहनों, ट्रैक्टरों और वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री बहुत ज्यादा गिरी है। अगर अगस्त के महीने को ही देखें तो यात्री कारों की बिक्री करीब 41.1 प्रतिशत गिरी। वहीं दोपहिया वाहनों की बिक्री में 22.2 फीसदी गिरावट आई। इसी तरह वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री 38.7 प्रतिशत गिरी है। इसके अलावा लोग बिस्कुट जैसी वस्तुओं का भी कम ही उपभोग कर रहे हैं। ये सभी पैराडॉक्स ऑफ थ्रिफ्ट का जीता-जागता उदाहरण हैं।

यदि आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने खर्च में कटौती करता है तो लगभग पूरी आबादी की आय प्रभावित होती है। इस श्रेणी में बड़े कारोबारियों से लेकर किराने की दुकान चलाने वाले व्यापारी तक सभी शामिल हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं होता। इस स्थिति में प्रतिस्पर्द्धी बने रहने के लिए व्यापारी कर्मचारियों को नौकरी से निकालते हैं। ऐसा अभी वाहन और उससे जुड़े क्षेत्रों में देखा भी जा सकता है। कई कंपनियां अपने उत्पादन में कटौती कर रही हैं। इन सभी चीजों से खर्च में और कमी आती है। अब प्रश्न यही है कि ऐसे हालात में क्या किया जा सकता है? कींस का मानना था कि ऐसी स्थिति में किफायत के विरोधाभास को तोड़ना बहुत जरूरी है। यह तभी हो सकता है, जब सरकार अपनी तरफ से ज्यादा पैसा खर्च करे। इस खर्च से लोगों की आय बढ़ेगी और फिर वे उस पैसे को खर्च करेंगे और धीरे-धीरे किफायत के विरोधाभास का तिलिस्म टूटेगा।

वर्ष 2008 में वित्तीय संकट की दस्तक के बाद भारत सरकार ने कुछ ऐसा ही करते हुए जमकर पैसा खर्च किया था। सरकारी बैंकों ने भी उदारता के साथ कर्ज दिए। इसके पीछे यही कोशिश थी कि किफायत का विरोधाभास पैठ न बनाने पाए। इसके अनुकूल नतीजे भी मिले। वर्ष 2009 से 2011 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था काफी तेजी से बढ़ी, मगर उसके बाद एक-एक करके समस्याएं आनी शुरू हो गईं। मसलन मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर दस प्रतिशत से ज्यादा हो गई। बैंकों के कर्ज फंसने से उन पर एनपीए का बोझ बढ़ने लगा। चूंकि देश अभी भी इस संकट से जूझ रहा है, इसीलिए सरकारी खर्च में बेतहाशा इजाफा उचित नहीं होगा। ऐसी स्थिति में सरकार और क्या कर सकती है? सरकार सीधे पैसा खर्च करने के बजाय लोगों के हाथों में पैसा दे सकती है जिसे वे खर्च कर उपभोग बढ़ा सकते हैं। यह प्रत्यक्ष रूप से आयकर कटौती और अप्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर जीएसटी दरों में कटौती के माध्यम से किया जा सकता है। जीएसटी की फिटमेंट कमेटी ने कहा है कि गाड़ियों पर जीएसटी की दर को कम नहीं किया जाएगा, क्योंकि इससे राजस्व का नुकसान होगा, मगर जब कर की ऊंची दरों पर गाड़ियों की बिक्री ही नहीं होगी तब उसके एवज में सरकार को राजस्व कहां से मिलेगा? अगर दर घटाई गई तो ज्यादा गाड़ियां बिक सकती हैं और सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है। यहां नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री रिचर्ड थालर की बात पर गौर करना होगा।

हाल में फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में थालर ने कहा, 'यदि आप चाहते हैं कि लोग कुछ करें तो उस काम को आसान बनाएं। इस बात को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि अब यह जरूरी हो गया है कि जीसएटी की पेचीदगियों को सुलझाया जाए। इन पेचीदगियों की वजह से सरकार को अपेक्षित राजस्व भी हासिल नहीं हो पा रहा है। इसमें एक या दो दरें होनी चाहिए, जैसा कि जीएसटी अपनाने वाले अधिकांश देशों में है। इससे व्यापारियों को भी लाभ होगा। तमाम छोटे व्यापारियों के लिए जीसएटी बड़ा सिरदर्द बन गया है। इसके साथ ही अब समय आ गया है कि सरकार घाटे में चल रहे तमाम सरकारी उपक्रमों पर पैसा बर्बाद करना बंद करे। इनमें विनिवेश के साथ ही इन कंपनियों की रियल एस्टेट परिसंपत्तियों को भी भुनाने की दरकार है। इससे राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर भी सरकार को मदद मिलेगी, यानी सरकार को बाजार से कम उधार लेना होगा और ब्याज दरें भी मौजूदा स्तर पर कायम रहेंगी। इसी के साथ जिन सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो सकता है, उनका निजीकरण किया जाना चाहिए। अंग्र्रेजी में एक कहावत है 'द बिजनेस ऑफ गवर्मेंट इज नॉट रनिंग बिजनेस। यानी सरकार का काम कारोबार करना नहीं है। अब वक्त आ गया है कि इसे लागू किया जाए। सरकार को हर जगह अपना दखल बढ़ाने के बजाय कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर खास तौर पर ध्यान देना होगा।

समय की यह भी मांग है कि देश में उद्यमशीलता की प्रक्रिया को वास्तविक रूप से आसान बनाया जाए। इंस्पेक्टर राज से पूरी तरह मुक्ति पानी होगी। इतिहास साक्षी है कि किसी अर्थव्यवस्था में नौकरियां तभी बढ़ती हैं, जब छोटी कंपनियों का दायरा बड़ा होता है। भारत में अमूमन छोटी कंपनियां छोटी रह जाती हैं या और सिकुड़ जाती हैं। जमीन खरीदने और बेचने की प्रक्रिया को आसान बनाने की जरूरत है। खासतौर से भूमि उपयोग कानूनों में बदलाव लाने की जरूरत है। क्लियर लैंड टाइटल्स से भी उद्यमशीलता को बढ़ावा मिलेगा। रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए सरकार को विभिन्न् क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई की और अनुमति देनी चाहिए। मिसाल के तौर पर मल्टी ब्रांड रिटेल में शत प्रतिशत एफडीआई से जहां कृषि आपूर्ति श्रृंखला में सुधार होगा, वहीं युवाओं को नौकरियां भी मिलेंगी। इससे किसान भी लाभान्वित होंगे। यहां जिन कदमों की चर्चा की गई है, उनमें से अधिकांश दीर्घावधि में ही फायदेमंद साबित होंगे। ध्यान रहे कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।

(स्तंभकार ख्यात अर्थशास्त्री और ईजी मनी ट्रायलॉजी के लेखक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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