सैकड़ों वर्षों से एक संस्थान के रूप में लोकतंत्र सरकार का सबसे बढिय़ा स्वरूप रहा है। इसका अर्थ है कि चुने हुए लोग ही शासन के अधिकारी हैं। लोकतंत्र एक ऐसा मॉडल है, जहां बहुमत ही तय करता है कि उन पर किसे और कैसे शासन करना चाहिए? अंग्र्रेजी के 'डेमोक्रेसीÓ शब्द का उद्भव ग्र्रीक भाषा से हुआ है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला 'डेमोसÓ जिसका अर्थ एक विशेष नगर-राज्य के भीतर रहने वाले समस्त नागरिक और इसका दूसरा हिस्सा है 'क्रेटोसÓ अर्थात सत्ता या शासन। 1863 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने पेंसिलवेनिया में कहा था कि, 'लोकतंत्र जनता के लिए, जनता द्वारा और जनता की सरकार है।Ó तबसे यह लोकतंत्र की एक प्रकार से मानक परिभाषा बन गई। यह उस दौर की बात है, जब दुनिया केवल भौतिक रूप से जुड़ी हुई थी। तब नेता या तो अपने कठिन परिश्रम से उभरते-स्थापित होते था या अपनी कथनी के कारण। उनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं होता था। वे विचारक भी होते थे। अब दुनिया डिजिटल दौर से गुजर रही है, जहां लोग कई घंटे वर्चुअल संसार में बिताते हैं। वहां लोकतंत्र के मूलभूत तत्वों में ही बदलाव आ रहा है। इंटरनेट डिजिटल संसार में लोगों का पीछा करता है। न केवल पूर्वाग्र्रह से प्रेरित सूचनाओं की बमबारी करता है, बल्कि लोगों की निजी पसंद और नापसंद पर भी पकड़ रखता है। हमारी ब्राउजिंग आदत और एप्स उपयोग के आधार पर हमारे ब्राउजर में कुकीज, हिडन प्रोग्र्राम्स और मालवेयर हम पर नजर बनाए रखते हैं। इसी सिलसिले में हम सभी ने कैंब्रिज एनालिटिका प्रकरण देखा।

हमने यह भी देखा कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किस प्रकार इंटरनेट मीडिया का इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि झूठे विमर्श के जरिये अमेरिकी संसद तक पर हमला कराकर लोकतांत्रिक संस्थान को अस्थिर करने और चुनी हुई सरकार की राह में बाधा उत्पन्न की गई। चूंकि फर्जी बातों को वास्तविकता का चोला पहनाया जा रहा है तो इससे मतदाताओं को बरगलाना और प्रतिद्वंद्वी की छवि को मलिन करना आसान हो जाएगा। चुनाव मेहनत या छवि पर नहीं, बल्कि विमर्श गढ़कर प्रतिद्वंद्वी को क्षति पहुंचाने पर केंद्रित होंगे। चुनाव में धरातल पर काम का महत्व नहीं रह गया है। अब तो इंटरनेट युग के वर्चुअल संसार में काम का बोलबाला है। नेतृत्व के खास मायने नहीं रहे। चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र सत्ता के दलालों और उन पेशेवर नेताओं के हाथ में सिमटते जा रहे हैं, जो इंटरनेट मीडिया के माध्यम से जनता को मूर्ख बनाकर और संस्थानों पर काबिज होकर सत्ता में बने हुए हैं। इंटरनेट मीडिया का राजनीति से जितना जुड़ाव होता जाएगा, राजनीति वास्तविकता से उतनी ही कटती जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकतंत्र के सिद्धांत और व्यवहार में व्यापक बदलाव आया है। ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि वैश्विक नेताओं के इंटरनेट मीडिया अकाउंट पर गाज गिर रही है, लेकिन इससे खास मदद नहीं मिलने वाली।

इंटरनेट मीडिया का इस्तेमाल ताकतवर तिकड़मियों के पक्ष में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने लिए जारी रहेगा। ऐसे में लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक संस्थानों पर दृष्टि डालने के लिए नए तौर-तरीके खोजकर कदम उठाना आवश्यक हो गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि नागरिकों एवं शासन के नजरिये से इंटरनेट मीडिया लोकतंत्र के जांचे-परखे रूप को विरुपित कर रहा है। प्रख्यात फ्रांसीसी विचारक मांटेस्क्यू ने सत्रहवीं शताब्दी में कहा था कि 'व्यापक जनकल्याण के अभाव में विभिन्न गुटों के बीच संघर्ष से लोकतंत्र के नष्ट होने की आशंका होती है, जहां प्रत्येक गुट व्यापक सार्वजनिक कल्याण की कीमत पर अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के प्रयास में होता है।Ó आज की तारीख में इंटरनेट मीडिया को उन गुटों की संज्ञा दी जा सकती है।

जब हम वर्चुअल संसार की हलचल को देखते हैं तो यही प्रतीत होता है कि इंटरनेट मीडिया लोकतंत्र के साथ असंगत है। इतना ही नहीं यह लोकतंत्र के निर्णय और उपलब्ध विकल्पों की ïवैधानिकता के समक्ष जोखिम उत्पन्न करता है। इंटरनेट मीडिया के इस्तेमाल एवं प्रसार ने लोकतंत्र के आधारभूत तत्वों का अवमूल्यन किया है। यह लोगों की धारणाएं प्रभावित कर किसी विशेष विचारधारा, विमर्श या शख्सियत के पक्ष में मतदान करने का संभावित हथियार बन सकता है।

पहले लोग चुनाव में जीतने के लिए काम को तवज्जो देते थे। वे चुनाव के लिए प्रचार का भी सहारा लेते थे, लेकिन अब यह सब वर्चुअल दुनिया से तय हो रहा है। अक्सर उसमें धारणा, छल-प्रपंच और जोड़तोड़ का सहारा लिया जाता है। वास्तव में चुनाव कल्पित धारणा और झूठे विमर्श पर जनमत संग्र्रह बन गए हैं। समय के साथ लोकतंत्र एवं इंटरनेट मीडिया के बीच की यह दुरभिसंधि और गहरी होकर खतरनाक होती जाएगी। कुछ दशकों पहले तक सामाजिक कार्यकर्ता और जमीनी स्तर पर सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मेहनत के दम पर चुनाव जीते जाते थे, लेकिन अब इंटरनेट मीडिया की तिकड़मों के सहारे जीत तय होने लगी है। ये बिचौलिये और सत्ता के दलाल हैं, जिन्होंने नेताओं की एक नई पीढ़ी तैयार की है, जिसने सत्ता कायम रखने के लिए लोकतंत्र को अपनी बपौती बना लिया है। राजनीति अब सेवा करने वाले नेतृत्व से नहीं, बल्कि सेलेब्रिटी वाले पहलू से पहचानी जाने लगी है। इस सबका जिम्मेदार है इंटरनेट मीडिया।

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया और अब उसकी जगह इंटरनेट मीडिया लेता जा रहा है। जनता पर इसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए मैं उसे मनोवैज्ञानिक मीडिया कहना चाहूंगा। कुछ साल पहले एक लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान मैंने कहा था कि वह दिन दूर नहीं जब इंटरनेट मीडिया दिग्गज ही न्यूज चैनल बन जाएंगे और वक्त के साथ चीजें काफी स्पष्ट भी होती जा रही हैं। इंटरनेट मीडिया में न केवल समाचार दिखाने, बल्कि समाचार 'गढऩेÓ की अपार क्षमता है जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। यह प्रसार का नहीं, बल्कि प्रभावित करने का मसला अधिक है।

हाल में दुनिया के एक दिग्गज अरबपति को मात्र एक ट्वीट के कारण 15 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। यदि हम ऐसी बातों के देश पर पडऩे वाले प्रभाव को देखें तो इससे युद्ध तक भड़क सकता है। भविष्य में राष्ट्रों पर इसका और व्यापक प्रभाव होगा। ऐसे में हमें इंटरनेट मीडिया के दौर में लोकतंत्र से जुड़े विमर्श का सांचा बदलना होगा। हमें नए दौर के लोकतंत्र की आवश्यकता है और अब इस पर बहस अवश्य शुरू होनी चाहिए।

(लेखक लोक नीति विशेषज्ञ और वल्र्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन के प्रमुख हैं)

Posted By: Arvind Dubey