आशीष व्यास

क्या मध्य प्रदेश में राजनीतिक दल अब पीढ़ीगत बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं? यह सवाल केवल इसलिए कि पिछले कुछ वर्षों से कमल नाथ और दिग्विजय सिंह के इर्द-गिर्द घूमती प्रदेश कांग्रेस की रीति-नीति को, अब युवा नेताओं की असहमतियों का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा में भी पुराने नेता, नए स्वरों को सुना-अनसुना करने लगे हैं! युवा नेतृत्व की इस 'अघोषित' मांग का असर यह है कि कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी के नेता भी अब दबी जुबान इस मांग को समर्थन दे रहे हैं। मप्र की तरह कई अन्य राज्यों में भी यह देखा गया है कि राजनीतिक वर्चस्व का दौर, एक समय के बाद ढलान पकड़ ही लेता है। राजनीति के जानकार पूरी ईमानदारी से यह मानते हैं कि विरासत सौंपने की यह प्रक्रिया जितनी सहज और सामान्य रूप से स्वीकार की जाएगी, दलगत विचारधारा को आगे बढ़ने में उतनी ही मदद मिलेगी। अब यह पहल पुरानी पंक्ति की तरफ से की जाए या फिर युवा जोश से भरे नए चेहरे खुद ही पहल करें, यह भविष्य ही तय करेगा!

इतिहास के साथ वर्तमान भी ऐसे अनेक बदलावों का गवाह रह चुका है। जैसे, पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के बेटे नकुल नाथ की बीते दिनों सामने आई यह धारणा - 'विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की कमान मैं संभालूंगा!' यह बयान ऐसे समय आया, जब मध्य प्रदेश और राजस्थान की राजनीति 'सिंधिया' और 'पायलट' में उलझी हुई है। सभी इस उधेड़बुन में लगे हुए हैं कि युवाओं की महत्वाकांक्षाओं को सही ठहराएं या अनुशासनहीनता को झूठा साबित कर दें। इस बयान को सिर्फ कांग्रेस, भाजपा या मध्य प्रदेश के दायरे में सीमित रखकर देखेंगे तो हो सकता है, भ्रम का गहरा भाव हमारे सामने आ जाए। दरअसल, यह नई और पुरानी पीढ़ी का द्वंद्व है। यह एक ऐसा दौर है, जो खास अंतराल में आता ही है। नए-पुराने नेताओं में सहमति-असहमति के इस खेल को पड़ोसी प्रदेश राजस्थान भी बहुत करीब से देख रहा है। कांग्रेस में अनुभवी राजनेताओं की पीढ़ी यह तक कहने से नहीं चूकी कि - 'जो नई पीढ़ी आई है, उसकी ढंग से रगड़ाई नहीं हो पाई। अगर ऐसा हुआ होता तो ये और अच्छे से काम करते, बल्कि हमसे अच्छा काम कर ले जाते।' सचिन पायलट पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह भी कहा कि - 'लोग कहते हैं हम नई पीढ़ी को पसंद नहीं करते हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है।' यह बात अलग है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते ही राजस्थान में कांग्रेस अब कोहनी पर टिक गई है।

राजनीतिक हस्तातंरण या विरासत सौंपने की मांग के इस दौर में भाजपा का इतिहास भी कांग्रेस से अलग नहीं है। मप्र भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव का ये बयान भी आपको याद ही होगा कि - 'किसान का बेटा किसान, कारोबारी का बेटा व्यापारी, तो क्या नेता का बेटा भिखारी बनेगा?' कारण बहुत स्पष्ट है, राजनीतिज्ञ भी अपनी ही पीढ़ी को सियासत में बढ़ते और बने रहते देखना चाहते हैं। यहां दो तर्क दिए जा सकते हैं। पहला - यदि यह बदलाव सहज, सामान्य और तार्किक हो, तो कोई सवाल नहीं उठेगा। दूसरा - जैसे ही कुपात्र, अयोग्य और नेतृत्व क्षमता की कमी वाले चेहरे सामने आएंगे, समूचा दल कठघरे में खड़ा दिखाई देगा।

बहरहाल, वंशवाद को लेकर राजनीतिक पार्टियां भले ही एक-दूसरे को दोष दे रही हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि जैसे फिल्मी सितारों के बच्चों को विरासत में फिल्में मिलती हैं, उसी तरह राजनेताओं के 'होनहारों' को राजनीति ही सुहाती है। मप्र में भी ऐसे अनेक मुख्यमंत्री हुए हैं, जिनके बच्चे या करीबी रिश्तेदार न सिर्फ राजनीति में आए, बल्कि मंत्री- मुख्यमंत्री पद तक की यात्रा भी कर चुके हैं।

  • विद्याचरण और श्यामाचरण शुक्ल : मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के बेटे विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल राजनीति में आए। श्यामाचरण शुक्ल तीन बार मुख्यमंत्री और विद्याचरण शुक्ल केंद्रीय मंत्री बने।
  • हर्ष सिंह : मप्र के छठवें मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के दो बेटे हर्ष सिंह और ध्रुव नारायण सिंह ने भी सियासत में कदम रखा। हर्ष सिंह शिवराज सरकार में मंत्री और ध्रुव नारायण एक बार विधायक रहे।
  • दीपक जोशी : मप्र के दसवें मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी को शिवराज सिंह चौहान ने मंत्री पद दिया।
  • ओमप्रकाश सखलेचा : मप्र के 11वें मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा के बेटे ओमप्रकाश सखलेचा चार बार विधायक रहे। अब मंत्री हैं।
  • सुरेंद्र पटवा : दो बार मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा के दत्तक पुत्र सुरेंद्र पटवा शिवराज सरकार में मंत्री रहे और अब विधायक हैं।
  • अजय सिंह : तीन बार मप्र के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह छह बार विधायक बने। मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपनी राजनीतिक सक्रियता दर्ज करवा चुके हैं।
  • अरुण वोरा : दो बार मप्र के मुख्यमंत्री रहे मोतीलाल वोरा के बेटे अरुण वोरा छत्तीसगढ़ में विधायक रहे।
  • जयवर्द्धन सिंह : दो बार मप्र के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्द्धन सिंह को सियासत विरासत में मिली। कमल नाथ सरकार में मंत्री थे।
  • नकुल नाथ : पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के बेटे नकुल नाथ ने पिता की परंपरागत लोकसभा सीट पर जीत हासिल की और पहली ही बार में सांसद बन गए।

भारतीय राजनीति में विरासत जब पुरानी से नई पीढ़ी के पास पहुंची, तो बहुत से विवाद, मतभेदों ने जन्म लिया। अनेक अवसरों पर न तो सुलह हुई और न ही इन्हें सुलझाने की कोशिश की गई। कांग्रेस ने भी अपने जन्म के समय से ही स्वस्थ सहमतियों-असहमतियों का लंबा दौर देखा है। जैसे, 15 जनवरी 1942 को वर्धा में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को अपना वारिस घोषित करते हुए कहा था - 'मुझसे किसी ने कहा कि जवाहरलाल और मेरे बीच अनबन हो गई है। यह बिलकुल गलत है। जब से जवाहरलाल मेरे पंजे में आकर फंसा है, तब से वह मुझसे झगड़ता ही रहा है। परंतु, जैसे पानी में चाहे कोई कितनी ही लकड़ी क्यों न पीटे, वह पानी को अलग नहीं कर सकता, वैसे ही हमें भी कोई अलग नहीं कर सकता। मैं हमेशा से कहता आया हूं कि अगर मेरा वारिस कोई है, तो वह जवाहरलाल है। वह जो जी में आता है, बोल देता है, मगर काम मेरा ही करता है। मेरे मरने के बाद वह मेरा सब काम करेगा। तब मेरी भाषा भी बोलेगा। आखिर हिंदुस्तान में ही पैदा हुआ है न। हर रोज वह कुछ सीखता है। मैं हूं, तो मुझसे लड़ लेता है। परंतु मैं चला जाऊंगा तो लड़ेगा किससे? और, लड़ेगा तो उसे बर्दाश्त कौन करेगा? आखिर मेरी भाषा भी फिर वही इस्तेमाल कर पाएगा। ऐसा न भी हो तो भी कम से कम मैं तो यही श्रद्धा लेकर मरूंगा।'

क्या गांधी-नेहरू के सपनों की कांग्रेस, नई पीढ़ी के जरिये मध्य प्रदेश में अपनी प्रभावी और पारदर्शी उपस्थिति दर्ज करवा पाएगी? क्योंकि, राजनीति की नई पीढ़ी को किसी भी कीमत पर यह तो समझना ही पड़ेगा कि 'राजपथ' का रास्ता 'जनपथ' से होकर ही जाता है!

Posted By: Ravindra Soni

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