आशीष व्यास

स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई हो या जीवन के आर्थिक उतार-चढ़ाव, जैसे ही आंकड़े आते हैं, आमतौर पर सभी उनसे दूर भागना शुरू कर देते हैं। लेकिन, कई बार इन्हें पढ़ना-समझना और बार-बार विश्लेषण करना आवश्यक होता है। विशेष रूप से तब, जब बात देश-प्रदेश के विकास की हो और उसमें हमारी भी बड़ी हिस्सेदारी हो। सामयिक संदर्भ है, हाल ही में जारी आर्थिक सर्वेक्षण सर्वे 2019 - इसमें बताया गया है कि मध्य प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय पिछले सालों के मुकाबले बढ़ी तो है, लेकिन हम 27 राज्यों की सूची में 23वें स्थान पर हैं। हमसे पीछे केवल बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि देश में जहां प्रति व्यक्ति एक वर्ष में 1 लाख 26 हजार 699 रुपए (10 हजार 558.25 रुपए प्रतिमाह) कमाता है, उसके मुकाबले मप्र में लोग 90 हजार 998 रुपए (7 हजार 583.16 रुपए प्रतिमाह) ही अर्जित कर पा रहे हैं।

दरअसल, प्रति व्यक्ति आय से किसी भी गांव, शहर, प्रदेश या फिर देश में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर और उसकी गुणवत्ता का पता चलता है। सीधा सा गणित है, जब आय कम है तो गरीबी ज्यादा होगी। साढ़े सात करोड़ की आबादी वाले मध्य प्रदेश में दो करोड़ 34 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। एक और आंकड़े पर भी ध्यान दीजिए, हमारे यहां कृषि मजदूरी की दर देश में सबसे कम 210 रुपए प्रतिदिन है। अब जिस राज्य की 70 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर हो, वहां मजदूरी कम होगी तो इसका असर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। मनरेगा में 68.25 लाख परिवार पंजीकृत हैं, यह भी बेरोजगारी का स्पष्ट संकेत है। गणित के फॉर्मूले की तरह साफ है कि जब रोजगार ही नहीं हैं तो आय कैसे बढ़ सकती है? अब चाहे वह प्रति व्यक्ति आय हो या प्रदेश की कुल आय। आमदनी कम होने का नुकसान किस तरह समाज, राज्य और देश पर पड़ रहा है, इसे इन तीन तथ्यों से समझा जा सकता है।

-देश में 1000 बच्चों में से 33 नवजात की मौत हो रही है। लेकिन, मप्र में यह आंकड़ा 1000 बच्चों पर 47 शिशुओं की मौत पर आकर टिकता है!

क्योंकि, परिवारों के पास गर्भवती व शिशुओं की देखरेख और इलाज के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है।

-देश में एक लाख प्रसव पर 130 गर्भवतियों की मौत होती है, मप्र में यह संख्या 173 है।

क्योंकि, गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पोषण और उपचार नहीं मिल पाता है।

-प्रदेश की आधी से ज्यादा महिलाएं (52.4 प्रतिशत) खून की कमी से पीड़ित हैं।

क्योंकि, परिवार की आय कम होने से सबसे कम पौष्टिक खाना उन्हीं के हिस्से आता है।

यह पूरा चक्र एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और इसमें सुधार की संभावनाएं तभी देखी जा सकती हैं, जब प्रति व्यक्ति आय बढ़ाई जाए। मप्र इस स्थिति से कैसे बाहर आ सकता है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) के पूर्व सदस्य और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के निदेशक डॉ. मनोज कुमार पांडा बताते हैं - 'मप्र ने कृषि में अच्छा विकास किया था। लेकिन, अब इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में निवेश जरूरी है। एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है - खनिज भंडार, इस पर भी मप्र को प्राथमिकता से काम करना चाहिए। मप्र अपने आसपास के राज्य महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात से भी देख-समझ सकता है कि वे किस तरह प्रति व्यक्ति आय बढ़ा रहे हैं। मप्र इतना बड़ा राज्य है कि यदि एक हिस्से में कोई प्रयोग करें, तो उसका असर पूरे प्रदेश में होने में समय लगेगा। इसलिए, ध्यान रहे कि आज परिवर्तन की जो परिभाषा लिखी जाएगी, वह कई पड़ाव पार करेगी और लक्ष्य तक पहुंचने में हो सकता है 10 से 12 साल भी लगा दे। एनएससी के पूर्व सदस्य डॉ. पीसी मोहनन एक खास बिंदु की ओर ध्यान दिलाते हैं -'मप्र में 70 फीसदी आबादी खेती और उससे जुड़े रोजगार पर निर्भर है। देशभर में जहां न्यूनतम भुगतान 250 रुपए से ज्यादा है, वहीं मप्र में मजदूरों को औसतन 217 रुपए मिल रहे हैं। सरकार को आय में समानता के फॉर्मूले पर काम कर न्यूनतम वेतन बढ़ाना चाहिए। इससे प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ने लगेगी।'

तीन राज्य मिलकर 26 राज्यों के बराबर!

फोर्ब्स-2017 की रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था को 153 खरब रुपए माना गया था। इसमें भारत के तीन राज्य महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक सबसे समृद्ध हैं। इन तीनों राज्यों का जीडीपी में योगदान 53 हजार 492 अरब रुपए का है। ये तीनों राज्य मिलकर अन्य राज्यों के बराबर योगदान कर रहे हैं। अर्थशास्त्रियों की मानें तो दो सालों में आंकड़ों में बदलाव आया होगा, लेकिन हिस्सेदारी अभी भी ऐसी ही बनी हुई है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण सर्वे के आधार पर प्रादेशिक स्तर पर आंकड़ों का आकलन कर मप्र की स्थिति बताने वाले आर्थिक एवं सांख्यिकी संचालनालय के आयुक्त चितरंजन त्यागी का मानना है -'इन आंकड़ों को थोड़ा अलग ढंग से भी समझने का प्रयास करना चाहिए। द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर 1990 तक, विश्व स्तर पर किसी भी देश के विकास को नापने का एक ही पैमाना होता था- प्रति व्यक्ति आय। यानी, विकास को 100 फीसदी आय से जोड़कर ही देखा जाता था। आर्थिक स्थिति के विश्लेषण का यह एकमात्र आधार था। 1990 से 2010 के आते-आते यह कहानी थोड़ी बदली और विश्व स्तर पर ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (मानव विकास सूचकांक) को मान्यता मिली। इसमें प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा और स्वास्थ्य की हिस्सेदारी बराबर बताई गई। 2010 के बाद आर्थिक विशेषज्ञों ने हैप्पीनेस इंडेक्स के जरिए विश्लेषण किया। इसमें छह मानकों (प्रति व्यक्ति आय, समानता, स्वास्थ्य, सेहत, उदारता और भागीदारी) को आधार बनाया गया। यहां भी विकास के लिए प्रति व्यक्ति आय का हिस्सा 20-22 फीसदी तक रखा गया।"

यदि इस पैमाने पर भी देखें तो मप्र को प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक बदलाव के क्षेत्र में बड़ा काम करना होगा। स्वास्थ्य और शिक्षा को केंद्र में रखकर योजनाएं बनानी होंगी। प्रति व्यक्ति आय में आगे रहने वाले दिल्ली, गोवा, पुडुचेरी के बजाय केरल की प्रगतिशील नीतियों से सीखना होगा। क्योंकि, यह राज्य प्रति व्यक्ति आय में भले ही आगे नहीं है, लेकिन साक्षरता में 100 प्रतिशत के करीब है। वैसे भी आंकड़ों को सामने रखकर सरकारों की आंखें खोलने वाला यह विभाग जल्दी ही मध्य प्रदेश के सभी जिलों में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े जारी करेगा। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि हमें कहां सुधार करना है और कहां निवेश।

मध्य प्रदेश के लिए अब यह सोचना जरूरी हो गया है कि वह आबादी के मान से देश का पांचवां बड़ा राज्य है। यदि यह पिछड़ेगा तो देश को भी तमाम मानकों की दौड़ में नीचे ले आएगा! आजादी के बाद से कई राज्य भी ऐसी ही विषम परिस्थितियों में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। वर्ष 2015 में गोवा जैसा छोटा राज्य दिल्ली को हरा सकता है, तो क्या इतना बड़ा मप्र विकास की आस में सोचना भी शुरू नहीं कर सकता?