चार राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों के परिणामों से कांग्रेस का हौसला निश्चित ही बढ़ा होगा, जिसकी कि उसे खासी जरूरत भी थी। कर्नाटक में उसने भाजपा से बेल्लारी सीट छीन ली और बिहार में भागलपुर को अपने कब्जे में कर लिया। इससे पहले भी उत्तराखंड में हुए उपचुनावों में कांग्रेस सभी तीन सीटें जीतने में कामयाब रही थी। लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस कुछ समय तक इस पसोपेश में रही थी कि विजेता दल को अपने हनीमून पीरियड का मजा लेने का मौका दे या नहीं, लेकिन हाल के दिनों में ऐसा लगता है कि उसने अधिक आक्रामकता दिखाने का निर्णय किया है। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों पृथ्वीराज चव्हाण और भूपिंदर सिंह हुड्डा और सहयोगी दल झामुमो के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी हूटिंग के बाद प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा न करने को लेकर जो रुख अपनाया, उससे यही जाहिर होता है।

हाल ही में संपन्न् हुए बजट सत्र के दौरान कांग्रेस न्यायिक नियुक्ति आयोग संबंधी विधेयक में अपने मनचाहे संशोधन कराने में कामयाब रही थी। बीमा विधेयक को राज्यसभा की प्रवर समिति में भिजवाने में भी वह सफल रही। पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की वार्ता विफल होने से भी पहले पाक से बातचीत करने के लिए वह सरकार को आड़े हाथों ले चुकी थी। लगता है कांग्रेस ने मान लिया है कि आक्रमण ही आत्मरक्षा का सबसे अच्छा तरीका है।

लेकिन इसके बावजूद लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार का विश्लेषण करने की उसने कोई वास्तविक कोशिश नहीं की है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता एके एंटनी ने हार के कारणों की पड़ताल करने की कवायद की और उन्होंने अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंप दी, लेकिन जाने क्यों उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। एंटनी गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं। यह पहली बार नहीं है, जब एंटनी को कांग्रेस की हार के कारणों की समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई हो। वर्ष 1999 में जब कांग्रेस महज 114 सीटों पर सिमटकर रह गई थी, तब भी एंटनी ने हार के कारणों की समीक्षा करते हुए एक भीमकाय दस्तावेज रचा था। लेकिन अपने शांत स्वभाव के लिए विख्यात एंटनी के लिए भी 2014 के चुनावों में कांग्रेस को मिली शर्मनाक हार की ठंडे दिमाग से समीक्षा करना बहुत मुश्किल साबित हुआ होगा। 1999 में एंटनी द्वारा पेश की गई जांच रिपोर्ट आज 24 अकबर रोड की किसी भूली-बिसरी अलमारी में धूल खा रही होगी और अनेक लोगों को लगता है कि 2014 की रिपोर्ट का भी जल्द ही यही हश्र होने वाला है।

बड़ी अजीब बात है कि एंटनी अपनी रिपोर्ट में बड़ी मशक्कत करने के बाद इसी नतीजे पर पहुंच सके कि पार्टी नेतृत्व हार के लिए दोषी नहीं है। अगर एंटनी को राहुल गांधी को बचाने का ही काम सौंपा गया था, तो फिर उसके लिए जांच समिति बिठाने का तामझाम करने की भी क्या जरूरत थी? कम से कम तब हार के वास्तविक कारणों पर परदा डालने की कोशिशें तो सुर्खियों में नहीं आतीं। क्या कारण है कि चुनावों के तीन माह बाद भी पार्टी में रद्दोबदल की कोशिशें नजर नहीं आतीं? यहां तक कि इस अवधि में कोई चिंतन शिविर भी आयोजित नहीं किया गया, जो कि कांग्रेस का प्रिय शगल रहा है। महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के सिलसिले में कोई अधिवेशन भी नहीं आयोजित किया गया। इस तरह की कवायदों से कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ता है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस की राजनीति में एक किस्म का भोथरापन आ गया है। चुनावों के तुरंत बाद कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक जरूर हुई थी, लेकिन वह सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा इस्तीफों की पेशकश करने और कार्यसमिति द्वारा उसे स्वीकारे नहीं जाने की कवायद में ही गुजर गई।

आज कांग्रेस दो स्तरों पर समस्याओं का सामना कर रही है : नेता और नीति। भाजपा में नेतृत्व का हस्तांतरण बहुत स्पष्ट तरीके से हुआ है और अटल-आडवाणी दौर के बाद नरेंद्र मोदी आज पार्टी के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरकर सामने आए हैं, लेकिन कांग्रेस में ऐसा नहीं हो सका। राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस की कमान है, लेकिन नहीं भी है। वे देश के लोगों से जुड़ पाने में नाकाम रहे हैं। वास्तव में आज कांग्रेस नेताओं को चुनावों में मिली हार इतनी चिंतित नहीं करती, जितने कि वे पार्टी में नेतृत्व के अभाव की स्थिति से चिंतित हैं। राहुल गांधी को आज 'चालू" तो कल 'बंद" की स्थिति वाला नेता माना जाता है। खुद कांग्रेसजनों द्वारा ही दबी जुबान से उन्हें 'गले की हड्डी" बताया जाता है, जिसे न निगला जा सके, न उगला जा सके। आज कांग्रेस के सामने दुविधा यह है कि गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना वह कई धड़ों में टूटकर बिखर सकती है, जबकि गांधी परिवार में कोई प्रभावी नेतृत्व नजर नहीं आ रहा है।

राहुल द्वारा लिए गए चंद अच्छे निर्णयों में से एक यह है कि उन्होंने पार्टी में युवा प्रवक्ताओं की एक टीम तैयार की। हाल के दिनों में इन्हें तथ्यों और आंकड़ों को जुटाकर पार्टी के बचाव में मैदान में उतरना पड़ा है। नेतृत्व का गुण इसी तरह विकसित होता है। यदि खुद राहुल गांधी भी एक सांसद के रूप में दस वर्षों की अवधि में संसद में महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी बात रखते तो आज देश में एक नेता के रूप में उनकी अधिक स्वीकार्यता होती। वास्तव में आज कांग्रेस पार्टी के पास इसके सिवा कोई और चारा नहीं रह गया है कि राज्यस्तरीय नेतृत्व विकसित करे और जुझारू नेताओं को बढ़ावा दे, जैसे कि राजस्थान में सचिन पायलट और दिल्ली में अरविंदर सिंह लवली। साथ ही उसे अब विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ करने से भी कोई परहेज नहीं करना चाहिए, जैसा कि उसने बिहार में सफलतापूर्वक किया।

कांग्रेस के सामने दूसरा संकट है नीति या विचारधारा का। संयोग की बात है कि इसकी तरफ एंटनी ने ही ध्यान आकृष्ट कराया था। एंटनी ने कहा था कि कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के कल्याण पर जरूरत से ज्यादा बल दिया है, जिससे बहुसंख्यक समुदाय उससे असंतुष्ट हो गया है। मतदाताओं में इसके कारण ध्रुवीकरण की स्थिति निर्मित हुई, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। चुनाव प्रचार के दौरान सोनिया गांधी ने कहा था कि कांग्रेस का जो 'आइडिया ऑफ इंडिया" है, वह भाजपा से बहुत भिन्न है। अब कांग्रेस को देशवासियों को बताना चाहिए कि भारत के प्रति उसके विचार भाजपा से किस तरह से और क्यों भिन्न हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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