आम चुनाव में कांग्रेस की करारी पराजय के बाद फिलहाल देश की इस सबसे पुरानी पार्टी में इस्तीफों का दौर चल रहा है। राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने का ऐलान करने के बाद कांग्रेस पार्टी के कई और नेता अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं। हालांकि अब भी यह साफ नहीं है कि कांग्रेस पार्टी इस तरह इस्तीफों के सिलसिले के साथ किस तरह के बदलाव की राह पर चल रही है। जहां तक राहुल गांधी की बात है तो उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के साथ कांग्रेस पार्टी पर पिछले चार दशक से लगे उस ठप्पे को कुछ हद मिटाने की कोशिश की कि यह तो नेहरू-गांधी परिवार की जागीर है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि उन्होंने आत्ममंथन करने के बाद पराजय की जवाबदेही स्वीकारने पर जोर दिया या फिर यह महज औपचारिकता है। राजनीतिक आलोचक उनके जवाबदेही लेने के तर्क को स्वीकार करने को तैयार नहीं। यह तब है, जबकि खुद राहुल बीते एक दशक में कई बार यह संकेत दे चुके हैं कि 'गांधी उपनाम का यह ठप्पा न सिर्फ पार्टी के लिए बोझ है, बल्कि वे खुद भी इसकी वजह से असहज महसूस करते हैं।

एक दशक पूर्व उन्होंने अपने राजनीतिक विकास को लेकर संशय जाहिर करते हुए कामना व्यक्त की थी कि नेहरू-गांधी खानदान से होना उनके लिए बोझ नहीं बनेगा। जुलाई 2013 में उन्होंने फिर उस नस पर उंगली रखी जो व्यवस्था में आर्थिक विकास के प्लाज्मा के सतत प्रवाह को रोक रही थी। उन्होंने आम आदमी तक पहुंच उसकी प्राथमिकताएं, जरूरतें, इच्छाएं जानने की राह में मौजूद बड़ी खामियों को बेनकाब करते हुए विकास योजनाओं के प्रमुख दोष को इंगित किया।

कांग्रेस पार्टी में जमीन से कटे हुए स्थापित नेता तकरीबन दो दशक से सलाहकार समूह के रूप में काम कर रहे हैं। इसी सलाहकार मंडली ने राहुल गांधी को विभिन्न् वर्गों तक सीधे पहुंचते हुए उनकी प्राथमिकताओं को जानने की कोशिशों को लेकर भरमाया, जबकि राहुल ऐसा करते हुए उनकी प्राथमिकताओं को जान उनसे जुड़े असल मुद्दों और उनके प्रति पार्टी की सोच व प्रतिक्रियाओं को पार्टी एजेंडा बनाना चाहते थे। इसके बजाय उनके सलाहकारों ने विभिन्न् वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में पार्टी कार्यकताओं को ही उनसे मिलवाते हुए उन्हें भ्रम में रखा। यही वजह रही कि आम चुनाव से पूर्व पार्टी का एजेंडा यथार्थवादी बदलाव की तस्वीर नहीं पेश कर सका।

हकीकत यह है कि कभी देश में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी वर्ष 1989 से लगातार स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम हो रही है। फिर भी इसके रणनीतिकारों ने कभी यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि वर्ष 1971 के बाद देश में शिक्षा के विस्तार के साथ जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुआ है, उससे कैसे तालमेल बिठाया जाए। पार्टी सिर्फ लोक-लुभावन प्रस्तावों पर टिकी रही। वर्ष 1971 में मिले जबर्दस्त जनादेश के बाद पार्टी इंदिरा गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व पर निर्भर होकर रह गई और यहीं से सही मायनों में पार्टी पर गांधी परिवार के एकाधिकार की शुरुआत हुई।

हालांकि पार्टी पर पारिवारिक जागीर होने का जो ठप्पा लगा, उसके प्रमुख जिम्मेदार अर्जुन सिंह थे, जो राजीव गांधी के निधन के तुरंत बाद पार्टी नेताओं का एक समूह लेकर उनकी पत्नी सोनिया गांधी के पास पार्टी अध्यक्ष का ताज लेकर पहुंच गए थे। हालांकि शोक में डूबी सोनिया ने तब तो इस लुभावने प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, लेकिन आगे चलकर वह सक्रिय राजनीति में उतरते हुए पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने में सफल रहीं। इसमें निर्णायक मोड़ तब आया, जब वर्ष 2014 में सोनिया गांधी ने बगैर किसी जवाबदेही के सुपर प्राइम मिनिस्टर की तरह काम करना शुरू कर दिया। वह खुद तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठीं, लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह के रूप में अपने द्वारा मनोनीत विनम्र स्वभाव के एक आजीवन नौकरशाह के साथ वह ऐसा करने में कामयाब रहीं।

सोनिया गांधी बीस साल तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज रहीं, जो इस पार्टी के 133 साल के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल है। इस दौरान वह उसी सलाहकार मंडली के साथ रहीं, जिनकी पार्टी को आगे बढ़ाने के बजाय अपने पद से चिपके रहने में ज्यादा दिलचस्पी रही। उन्होंने पार्टी के पदों पर मनोनयन या अपनी नाखुशी जाहिर करने के लिए दूसरों को पद से यूं ही हटाने की पुरानी प्रक्रिया जारी रखी। दरअसल उनके सलाहकारों को भी इसी में अपनी सुरक्षा भी दिखती थी। इन 20 सालों में कांग्रेस ने पहले के मुकाबले कुछ और राज्यों में सत्ता गंवा दी। इसके लिए राज्य इकाइयों को दोष दिया गया कि वे सोनिया की साख को मतों में तब्दील नहीं कर पाईं। पर सोनिया ने कभी यह नहीं सोचा कि हर राज्य इकाई में पार्टी पदाधिकारी उनके द्वारा ही तो मनोनीत हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष का न सिर्फ लोगों से सीधा संपर्क टूट गया, बल्कि उसके आंख और कान के रूप में जो पार्टी कैडर था वह भी उसने खो दिया, क्योंकि पार्टी संगठन के भीतर खुली और स्वतंत्र बहस के सारे रास्ते बंद कर दिए गए। वास्तव में 1977 से लेकर अब तक हार के कारणों को लेकर यथार्थपरक आत्ममंथन की कोशिश नहीं हुई है। 2019 के चुनाव के बाद भी यही आलम है। उसके नेताओं को अब भी यही लगता है कि गांधी परिवार के करिश्मे के सहारे चुनावी नैया पार हो जाएगी, जबकि 1977, 1989, 1998, 1999, 2014 और 2019 में मिली पराजयों के बाद तो यह धारणा कबकी ध्वस्त हो जानी चाहिए थी।

भारत सामाजिक-आर्थिक मोर्चे पर बड़े बदलावों से गुजरा है। हमारे देश ने जब आजादी हासिल की थी, तब साक्षरता दर 12 फीसदी थी। अधिसंख्य जनता आर्थिक-सामाजिक तौर पर अनेक अभावों से ग्रस्त थी और शैक्षिक पिछड़ेपन की शिकार थी। ऐसे में किसी एक उम्मीद के सहारे भी उनके मानस को प्रभावित करना बहुत आसान था। लेकिन अब ऐसी परिस्थितियां निर्मित करना अनिवार्य हो गया है, जो आमजन की गरिमामय जीवन जीने की आकांक्षाओं से मेल खाती हों। उन्हें अब किसी खास वंश, व्यक्तित्व या फिर सस्ती, मुफ्त चीजें देने के वादों से नहीं लुभाया जा सकता। न भूलें कि सोनिया गांधी ने लोगों की उपभोग संबंधी जरूरतों के लिए दो कार्यक्रमों के जरिए 1.9 लाख करोड़ रुपए की चैरिटी का वादा किया था और राहुल गांधी ने भी गरीबों के लिए न्यूनतम आय के नाम पर 3.60 लाख करोड़ रुपए की चैरिटी का भरोसा दिलाया। लेकिन ये दोनों ही दांव विफल साबित हुए।

राहुल गांधी पद छोड़ने की घोषणा कर चुके हैं। अब भी आसार यही हैं कि उनके स्थान पर किसी ऐसे व्यक्ति को लाया जाएगा, जो गांधी परिवार का वफादार हो। लेकिन दिलचस्प दौर अब शुरू होता है। देखना यह होगा कि क्या राहुल गांधी के पद-त्याग से बाकी नेताओं का स्वाभिमान जागेगा या फिर वे अब भी करबद्ध मुद्रा ही अपनाए रखेंगे?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)