कांग्रेस के युवा नेता जितिन प्रसाद ने आखिरकार भाजपा का दामन थाम ही लिया। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मïण नेता की पहचान रखने वाले जितिन एक रसूखदार राजनीतिक परिवार से संबंध रखते हैं। उनके पिता जितेंद्र प्रसाद, जो गांधी परिवार के नजदीक थे, कद्दावर नेताओं में गिने जाते थे। जितिन मनमोहन सरकार में मंत्री पद पर रहे और राहुल गांधी के करीबी समझे जाते थे। उनकी गिनती ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट एवं मिलिंद देवरा के साथ होती थी। पिछले वर्ष सिंधिया भाजपा में आए और अब जितिन ने भी उनकी राह पकड़ी। उनके भाजपा में शामिल होने की चर्चाएं एक अरसे से चल रही थीं। सचिन पायलट के बार में भी समय-समय पर यह कहा जाता है कि वह भाजपा के साथ जा सकते हैं।

जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने पर गांधी परिवार की तरफ से तो कोई टिप्पणी नहीं आई, लेकिन वीरप्पा मोइली, मल्लिकार्जुन खरगे और कपिल सिब्बल आदि ने अवश्य अपनी प्रतिक्रिया दी है। इन्होंने कुल मिलाकर जितिन को एक नाकाम नेता बताया है। वह बंगाल के प्रभारी थे और वहां कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन इसके लिए केवल उन्हेंं दोष नहीं दिया जा सकता। यह कहना सही नहीं होगा कि बंगाल में वाम दलों से मिलकर चुनाव लडऩे और मौलाना अब्बास सिद्दीकी से तालमेल करने के पीछे जितिन थे। यह सब तो शीर्ष स्तर पर तय हुआ होगा। यह भी ध्यान रहे कि राहुल गांधी बंगाल प्रचार करने तब गए, जब कई चरणों का मतदान हो चुका था। आखिर ऐसे में जितिन कर ही क्या सकते थे? माना जाता है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस की बागडोर जबसे प्रियंका गांधी के हाथ आई, तबसे जितिन हाशिये पर चले गए थे। कांग्रेस ने यूपी की कमान अजय कुमार लल्लू को दे दी और जितिन हाथ मलते रह गए। शायद तभी उनका मोहभंग हो गया था। उनके भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस के नेताओं की ओर से यह कहा जा रहा है कि वह लगातार चुनाव हार रहे थे। यह सही है, लेकिन आखिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की ओर से जीत ही कौन रहा था? सच तो यह है कि खुद राहुल गांधी भी अमेठी से चुनाव हार गए थे। यदि जितिन इस नतीजे पर पहुंचे कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई प्रभाव नहीं बचा है और उसकी जड़ें सूखती जा रही हैं तो इस पर हैरानी नहीं। राज्य में कांग्रेस की हालत वास्तव में दयनीय है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में ही नहीं, देश के अन्य राज्यों में भी अपना रसूख खोती जा रही है। यह ठीक है कि उसके पास अभी भी एक पुराना वोट बैंक है, लेकिन वह लगातार सिकुड़ता जा रहा है और इसी कारण विधानसभाओं से लेकर लोकसभा में उसका संख्याबल कम होता जा रहा है। लोकसभा में दूसरी बार भी वह विपक्ष का दर्जा हासिल करने लायक सांसद नहीं जिता सकी। राज्यों में उसकी कमजोरी के कारण ही उसके दिग्गज नेता राज्यसभा में नहीं जा पा रहे हैं।

जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने के बाद कपिल सिब्बल समेत कई नेताओं ने कांग्रेस में बदलाव की भी बात कही है। ऐसा पहली बार नहीं कहा जा रहा है, लेकिन किसी तरह का बदलाव होता हुआ दिख नहीं रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था, तब सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनी थीं। माना गया था कि जल्द ही कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलेगा, लेकिन यह इंतजार लंबा खिंचता जा रहा है और दूसरी ओर राहुल पर्दे के पीछे से पार्टी चला रहे हैं। लगता है कि गांधी परिवार को यही व्यवस्था रास आ रही है। जो भी हो, जितिन का भाजपा में जाना राहुल की विफलता है। कांग्रेस और गांधी परिवार लगभग पर्यायवाची हैं। कभी यह स्थिति कांग्रेस के लिए अनुकूल थी, लेकिन आज प्रतिकूल नजर आती है। राहुल के साथ-साथ प्रियंका गांधी की राजनीति का मकसद गरीबी को महिमामंडित करना और मोदी को नीचा दिखाना भर रह गया लगता है। कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के नेताओं को यह लगता है कि ये दोनों नाकाम हैं और सरकार चलाने और सदन की राजनीति करने का कोई अनुभव न होने के कारण सतही राजनीति कर रहे हैं। इन नेताओं को यह भी लगता है कि राहुल और प्रियंका चाटुकारों से घिर गए हैं और उनकी राजनीति केवल ट्विटर तक सीमित होकर रह गई है। कांग्रेस नेताओं के इस निष्कर्ष से असहमत होना कठिन है, क्योंकि राहुल और प्रियंका कहीं कोई ठोस विमर्श खड़ा नहीं कर पा रहे हैं।

जितिन प्रसाद बिना किसी महत्वाकांक्षा के भाजपा में आए होंगे, यह कहना कठिन है। खतरा इस बात का है कि बाहर से आए नेताओं की महत्वाकांक्षा पूरी करने के फेर में भाजपा कहीं अपने दिग्गज नेताओं की अनदेखी न करने लगे? अगर ऐसा हुआ तो भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। हाल के समय में भाजपा ने दूसरे दलों के कई नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। बंगाल में उसने मुकुल राय से लेकर सुवेंदु अधिकारी तक को जोड़ा, लेकिन गत दिवस मुकुल फिर से तृणमूल कांग्रेस में लौट गए। भाजपा को सोचना होगा कि अलग विचारधारा से आए लोगों को अपने साथ जोडऩे से क्या हासिल हो रहा है? ऐसे नेताओं को भाजपा से तालमेल बैठाने में समय लगता है। भाजपा को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आजकल के नेताओं में ओहदा पाने की लालसा अधिक रहती है और जन सेवा की कम। जितिन भाजपा के लिए कितना उपयोगी होंगे, यह तो समय ही बताएगा, पर इतना जरूर है कि उनके जाने से कांग्रेस अवश्य कमजोर होगी।

जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने और मुकुल राय के तृणमूल कांग्रेस में लौट जाने से भारतीय राजनीति का आयाराम-गयाराम चरित्र फिर से उजागर हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि नेताओं के लिए विचारधारा का कोई महत्व नहीं रह गया है। राजनीतिक दलों में आवाजाही के पीछे एक बड़ी वजह दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। नेता अक्सर ऊपर से थोप दिए जाते हैं। नेताओं के चयन में चुनाव प्रक्रिया का सहारा मुश्किल से ही लिया जाता है और यदि कभी लिया भी जाता है तो दिखावे के तौर पर। जब तक यह स्थिति रहेगी, नेताओं के पालाबदल पर रोक लगने वाली नहीं।

Posted By: Arvind Dubey

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