वर्ष 1962 के बाद लद्दाख की पहाड़ियों पर युद्ध के बादल एक बार फिर घुमड़ने लगे हैं। इसका एक कारण तो अहंकारी चीन की विस्तारवादी प्रवृत्ति है। दूसरा कारण है, आजादी के बाद के हमारे नेतृत्व की भयानक भूलें। तिब्बत को स्वायत्तशासी बफर राज्य बनाए रखना ब्रिटिश शासन की नीति थी और उसी दृष्टि से उसने 1914 का त्रिपक्षीय सीमा समझौता किया था, जिसे मैकमोहन लाइन के नाम से जाना गया, लेकिन नेहरू ने चीन के प्रति नीति बदल दी। चीन में अक्टूबर 1949 में माओ सत्ता में आ गए और 1950 में चीनी सेना कोरिया में अमेरिका के विरुद्ध युद्ध में कूद पड़ी। इसके साथ ही चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण के लिए अपनी सेनाएं रवाना कर दीं। वे सेनाएं हमारे अक्साई चिन के एक पुराने अविकसित मार्ग से होते हुए तिब्बत पहुंचीं। चीनी आक्रमण के जिस मार्ग को विश्व ने जाना, उसे हमने न जानने का नाटक किया। ब्रिगेडियर दलवी अपनी पुस्तक 'हिमालयन ब्लंडर में स्टॉफ कॉलेज, वेलिंगटन का अपना संस्मरण लिखते हैं। उन्होंने लिखा- अक्टूबर 1950 की बात है। एक दिन अचानक जनरल लेंटेन उद्विग्न होकर लेक्चर हॉल में आए और बोले कि तुम्हारे नेताओं की अकर्मण्यता के कारण चीन ने भारत के उत्तर में आज एक बड़ा दरवाजा खोल लिया है। तुम्हारी मुश्किलें कितनी बढ़ जाएंगी, इसका तुम्हें अंदाजा ही नहीं है।

यह मानना कि भारत सरकार को अक्साई चिन में बन रही सड़क की जानकारी नहीं थी, स्वीकार्य नहीं है। सीमावर्ती क्षेत्रों के हालात की इंटेलिजेंस रिपोर्ट सामान्यत: प्रधानमंत्री को प्रेषित होती थी। अक्साई चिन में बन रही सड़क की फोटो और रिपोर्ट नेहरू को प्रस्तुत न की गई हों, यह असंभव है, लेकिन नेहरू के लिए अक्साई चिन ऐसा पथरीला इलाका था, जहां घास का तिनका तक नहीं उगता।

उस वक्त चीन कोरिया युद्ध में फंसा था। उस समय उसे भारत की ओर से अक्साई चिन छोड़ देने की एक चेतावनी भी पर्याप्त होती। हमारी एयरफोर्स इतनी सक्षम तो थी ही कि चीन को सड़क का काम रोकना पड़ता, लेकिन वह सड़क बनने दी गई, क्योंकि नेहरू चीन को साथ लेकर 'एशिया फॉर एशियंस अर्थात 'एशिया एशियावालों के लिए जैसा दिवास्वप्न देख रहे थे। इस दिवास्वप्न के चलते चीन का तुष्टीकरण हमारी नीति बन गई। वर्ष 1957 में उस सड़क का उद्घाटन हुआ। विश्व भर में समाचार फैला, तो हमारे नेतृत्व ने भी चकित होने का ड्रामा किया। हमारे नेतृत्व द्वारा तिब्बत को स्वायत्तशासी राज्य के स्थान पर चीन के आधिपत्य का प्रदेश मानने का परिणाम यह हुआ कि तिब्बत से भारत के जो भी परंपरागत सीमा, व्यापार, सांस्कृतिक समझौते हुए थे, वे सब अर्थहीन हो गए। यदि तिब्बत चीन का प्रदेश था, तो एक प्रदेश को तो दूसरे देश से समझौतों का अधिकार ही नहीं होता।

वास्तव में हमारे ढुलमुलपन के कारण चीन के लिए मैकमोहन लाइन और लद्दाख की परंपरागत सीमा रेखाओं को अस्वीकार करना आसान हो गया। इस तरह जो भारत-तिब्बत सीमा थी, वह भारत-चीन सीमा हो गई। फिर पंचशील जैसा आदर्शवादी समझौता कर तिब्बत में जो भी हमारे अधिकार थे, वे सब छोड़ दिए गए। तिब्बत की प्रताड़ना प्रारंभ हो गई। एक अध्ययन के अनुसार शांतिपूर्ण तिब्बती भिक्षुओं और लामाओं सहित करीब एक लाख आठ हजार तिब्बती मारे गए। छह हजार मोनेस्ट्री ध्वस्त की गईं। आचार्य कृपलानी ने 1954 के पंचशील समझौते पर कहा था कि यह समझौता एक प्राचीन राष्ट्र के विनाश पर हमारी सहमति के पाप से उत्पन्न् हुआ।

1962 का युद्ध 20 अक्टूबर को प्रारंभ होता है। इसके पहले तीन अक्टूबर को चीन से थागला रिज खाली कराने के मुद्दे पर जनरल थापर से नेहरू कहते हैं कि हमारी इस कार्रवाई पर चीन कोई प्रतिक्रिया नहीं करेगा। 12 अक्टूबर को उनका बयान यह था कि सेनाएं चीनियों से अपना इलाका खाली कराएंगी। नेहरू यह मानते रहे कि चीन बड़ी प्रतिक्रिया नहीं करेगा। उस समय शीतयुद्ध के चलते दुनिया दो खेमों में बंट रही थी। पाकिस्तान अमेरिकी खेमे में शामिल हो गया और उसे शस्त्रों की आपूर्ति भी प्रारंभ हो गई।

1959 के बाद परिस्थितियां हमें बड़ी तेजी से दो मोर्चों पर युद्ध की दिशा में ले जा रही थीं, लेकिन हम सपनों में थे। जनरल थिमैया ने अपने रिटायरमेंट पर बड़ी मायूसी से सैनिकों से कहा था- कहीं मैं तुम्हें सिर्फ मरने के लिए तो नहीं छोड़कर जा रहा हूं? ऐसे हालात के बावजूद नेहरू राष्ट्रीय सुरक्षा को हाशिये पर छोड़ विश्व शांति की मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ रहे थे। विश्व युद्ध में पूरी तरह बर्बाद हो गए देश जापान, जर्मनी, फ्रांस प्राण-पण से अपने-अपने विकास में लगे थे और हम आदर्शवादी गुटनिरपेक्ष नीति को लेकर मुग्ध थे। 1962 की भीषण पराजय के बाद हम अकेले पड़ गए। हमारी ओर से एक भी देश नहीं बोला। गुटनिरपेक्षता की असलियत सामने आ गई। दलाई लामा अपनी पुस्तक 'फ्रीडम इन एक्जाइल में लिखते हैं- 1962 के बाद नेहरू ने उनके समक्ष स्वयं स्वीकार किया था कि हम मूर्खों की दुनिया में रह रहे थे।

दरअसल समाधान की सोच का अभाव एक बड़ी समस्या थी। अहिंसक विचारधारा समस्याओं का समाधान तुष्टीकरण और विभाजन में देखती है। तिब्बत समस्या चीन के तुष्टीकरण की नीति का परिणाम थी। समाधान तो यह था कि अमेरिका, ब्रिटेन के साथ संयुक्त रूप से तिब्बत को स्वतंत्र देश स्वीकार कर सैन्य सहायता दी जाती। कोरिया युद्ध में व्यस्त चीन के लिए बहुत कुछ कर पाना संभव न होता। तिब्बत के लिए भी कोरिया की तरह शांति सेनाएं भेजी जा सकती थीं, लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा हम थे। स्पष्ट सैन्य समाधान के विकल्प के बावजूद कश्मीर विवाद को अनिस्तारित रखते हुए हमने स्वयं दो मोर्चे बना लिए थे।

चाहे कश्मीर समस्या हो या चीन-तिब्बत की समस्या, ये नेहरू की नीतिगत पंगुता का ही परिणाम हैं। चीन से उत्तरी सीमा पर युद्ध की स्थितियां ही न बनतीं, यदि पूर्ववर्ती ब्रिटिश शासन की तिब्बत संबंधी नीतियों और शीत युद्ध के दौर की जमीनी सत्ता-शक्ति के समीकरणों को संतुलित करते हुए राष्ट्रहित के लक्ष्य को प्राथमिकता दी गई होती। ऐसा न करने के घातक परिणाम हुए, लेकिन यह 1962 नहीं है। गलवन के बलिदान से नया अवतार ले चुकी भारतीय सेना द्वारा 29/30 अगस्त की रात लद्दाख में कई चोटियों पर कब्जा कर क्षेत्रीय वर्चस्व कायम करना चीन के लिए अकल्पनीय है। सैन्य कमांडरों की वार्ताएं असफल रही हैं। चीन सीमा पर 50 हजार सैनिक, मिसाइलें, रॉकेट, टैंक बढ़ा रहा है। चीनी प्रत्याक्रमण पर भारतीय प्रतिक्रिया चुशूल सेक्टर में स्थानीय युद्ध में बदल सकती है। युद्ध की आशंका के बाद भी संतोष की बात यह है कि भारत अब नेहरू वाला भारत नहीं है।

(लेखक पूर्व सैनिक एवं पूर्व प्रशासक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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