आज देश में विचारधाराओं के संघर्ष से वैमनस्य और उन्माद उपज रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा-राजग सरकार बनने के बाद यह और ज्यादा मुखर हुआ है। स्वतंत्रता के बाद केरल और त्रिपुरा वामपंथी गढ़ हुआ करते थे, लेकिन देश के अन्य भागों जैसे कानपुर (जहां कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म हुआ), बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र आदि में भी उनकी उपस्थिति रहती थी। बंगाल में 1977 से करीब 30 वर्षों तक वामपंथी सरकार रही। आज केरल के अलावा हर जगह से वामपंथी सरकार साफ हो चुकी है। 1990 के दशक में सोवियत संघ में साम्यवाद के अंत और कम्युनिस्ट चीन में उदारवाद के अभ्युदय से वामपंथ की नींव हिल गई। भारत में वामपंथ की अस्मिता पर ग्रहण लग गया, जिसे बचाने हेतु कई क्षेत्रों में उग्र-वामपंथ और नक्सलवाद का फैलाव हुआ। आज जेएनयू की हिंसा को वामपंथी अस्मिता संकट के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है, अन्यथा शीर्ष वामपंथी नेता समस्या के साथ नहीं, वरन केवल वामपंथी छात्रों के साथ ही क्यों खड़े दिखाई देते?

भारतीय लोकतंत्र वैचारिक स्पर्द्धा का खुला मंच है। संविधान इस स्पर्द्धा को मान्यता देता है। संविधान के प्रथम अनुच्छेद में ही कहा गया है- इंडिया, दैट इज भारत अर्थात जिसे हम 'इंडिया कहते हैं वह 'भारत है। जो लोग देश को 'इंडिया के रूप में परिभाषित करते हैं वे प्रगतिशील और वामपंथी कहलाते हैं और जो उसे 'भारत के रूप में देखते हैं उन्हें दक्षिणपंथी, हिंदुत्ववादी, संघी और भाजपाई कहा जाता है। इस प्रकार इंडिया और भारत परस्पर विरोधी विचारधाराओं के प्रतीक हैं। इंडिया शब्द का वजूद तो नया है जो 17वीं शताब्दी से प्रयोग हुआ, लेकिन भारत का विचार तो हजारों वर्ष पुराना है जिसमें 'वयं ब्रह्मास्मि (हम सब ब्रह्म हैं) और 'वसुधैव कुटुंबकम (संपूर्ण धरती परिवार है) की अवधारणाएं समाहित हैं। वे समस्त मूल्य और सांस्कृतिक तत्व समाहित हैं जो भारतीयता के प्रतीक थे। इंडिया के प्रयोग से हमें योरपीय लोकतांत्रिक मूल्यों, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का पाठ पढ़ाकर शिष्ट बनाने की कोशिश की गई, लेकिन शायद हम भूल गए कि ये सभी हमारी सांस्कृतिक विरासत के अभिन्न् अंग रहे हैं। स्वतंत्रता के लिए हमें ईसा पूर्व 11वीं शताब्दी में बनी अजंता-एलोरा और खुजराहो की कलाकृतियों और उनमें व्यक्त कामुक-भंगिमाओं को देखना होगा जिसे 'पब्लिक-स्पेस में स्वतंत्रता की पराकाष्ठा कहा जा सकता है। जहां पश्चिम में काम को वासना से जोड़ा गया, वहीं भारतीय संस्कृति उसे सृजन, संस्कार और देवत्व से संबद्ध करती है इसीलिए देश में शिवलिंग की सर्वाधिक पूजा-अर्चना होती है। पाश्चात्य जगत हमें समानता का क्या पाठ पढ़ाएगा? विश्व में आज लैंगिक-समानता की बात हो रही है, पर भारत में हजारों वर्ष पूर्व आदिशक्ति की परिकल्पना 'अर्द्ध-नारीश्वर के रूप में की गई, जिसमें स्त्री-पुरुष समानता अपने सर्वोत्कृष्ट स्वरूप में विद्यमान है। बंधुत्व में हमसे आगे कौन हो सकता है, जहां वसुधा को परिवार माना गया और बेंथम के 'अधिकतम लोगों और मार्क्स के 'सर्वहारा से आगे जाकर 'सर्वे भवंतु सुखिन: की परिकल्पना की गई। इसी प्रकार, सेक्युलरिज्म और सहिष्णुता को आधुनिक संकल्प मानकर 'आइडिया ऑफ इंडिया को परिभाषित किया जाता है, लेकिन प्राचीन भारत में असंख्य पंथों व असीमित विभिन्न्ताओं वाले सामजिक परिवेश का अस्तित्व प्रमाणित करता है कि जब योरप सेक्युलरिज्म और सहिष्णुता से अपरिचित था तब भारत में ये संकल्प सामाजिक-संस्कृति की आधारशिला थे। संविधान निर्माताओं ने पश्चिम से कुछ ग्रहण किया जरूर पर स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, सेक्युलरिज्म और सहिष्णुता जैसे संकल्पों की संपदा तो स्वयं हमारे पास थी। इसीलिए उन्होंने 'इंडिया को 'भारत की पहचान दी।

हमारे संविधान में वामपंथ और दक्षिणपंथ, दोनों का समावेश है। किसी को भी हीन या अछूत नहीं समझा गया है। जनता भी विचारधारा को लेकर सहिष्णु है अन्यथा बंगाल, त्रिपुरा और अन्य क्षेत्रों में वामपंथ को स्वीकारने के बाद वह उसे अस्वीकृत क्यों करती? एक लंबे समय तक देश में मध्यमार्गी-वामपंथी कांग्रेस को सत्ता देने के बाद वह उसे अपदस्थ कर दक्षिणपंथी भाजपा को सत्ता क्यों देती? मूल प्रश्न है कि जनता किन परिस्थितियों में किस विचारधारा को स्वीकार करती है और क्यों? जिस दल को जनादेश मिलता है, उसे अपनी विचारधारा के अनुरूप नीतियां बनाने, निर्णय लेने, नियुक्तियां करने का अधिकार है। प्रधानमंत्री नेहरू के समय से यही सिलसिला चला आ रहा है। आज वामपंथी और मध्यमार्गी-वामपंथी क्यों भाजपा से उम्मीद करते हैं कि वह उनके हिसाब से चले?

वास्तविक लोकतांत्रिक सहिष्णुता तो यही है कि आज मोदी को अपना काम करने दो, कल जब तुम फिर आना तो अपने हिसाब से काम करना। आज यदि मोदी के लिए 'ताजमहल से ज्यादा 'गीता आइडिया ऑफ इंडिया को अभिव्यक्त करती है तो वामपंथ को आपत्ति क्यों? अगर पिछले 70 वर्षों में भारतीय विश्वविद्यालयों में वामपंथियों की नियुक्ति हुई है तो अब दक्षिणपंथियों की नियुक्ति पर सवाल क्यों?

आज कांग्रेस एवं वामपंथी विपक्ष के सामने अस्मिता का संकट है। वामपंथी तो राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्वीकृत हो चुके हैं। फिर वे करें क्या? उनके लिए मोदी सरकार की हर बात बुरी है, हर नीति खराब है, हर निर्णय खोटा है, हर कार्यक्रम धोखा है, अन्यथा मोदी सरकार की प्रत्येक बात का वे इतना संगठित और सतत विरोध क्यों करते? जिस तरह नागरिकता के मुद्दे पर अनेक दल विरोध को हवा दे रहे हैं और मुद्दों को उलझाकर जनता को गुमराह कर रहे हैं, उसमें शांत और बौद्धिक विमर्श का स्थान बचा ही कहां है?

हाल में केरल में 'इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में मुख्य अतिथि राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान के साथ वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब ने जैसी बदसलूकी की वह वामपंथ की वैचारिक असहिष्णुता की एक बानगी भर थी। विपक्ष यह नहीं समझ पा रहा कि लोकतंत्र में तर्कपूर्ण असहमति और विरोध अनिवार्य है, पर उसमें अभद्रता, संघर्ष और विद्रोह को मान्यता नहीं। आज विपक्ष ने संघर्ष और विद्रोह की लीक पकड़ ली है। ऐसे लोकतंत्र में समाधान के दो रास्ते होते हैं। एक हमें सैनिक हस्तक्षेप की ओर ले जाता है और दूसरा जन-हस्तक्षेप की ओर। कोई भी राजनीतिक दल सैन्य-हस्तक्षेप की कल्पना नहीं करना चाहेगा। तो दूसरा विकल्प जन-हस्तक्षेप का ही बचता है, जिसमें दो मार्ग हैं। एक हमें सिविल-वॉर और दूसरा चुनावों की ओर ले जाता है। अमेरिका में हम इन दोनों विकल्पों का प्रयोग देख चुके हैं जहां रंगभेद को लेकर दक्षिणी व उत्तरी राज्यों में 1861-65 के बीच सिविल-वॉर हुआ, लेकिन उसके बावजूद आज वह एक विकसित राष्ट्र के रूप में जाना जाता है और अपवादों को छोड़ अमेरिकी समाज समावेशी और सभ्य माना जाता है। बेहतर होता कि वामपंथी और मध्यमार्गी-वामपंथी कुछ वैचारिक सहिष्णुता का परिचय देते और भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी विचारधारा को भी स्पेस देते जिससे लोकतंत्र एंव संविधान की छत्रछाया में जनता को वैचारिक स्पर्द्धा का आनंद मिलता और समाज एवं राज्य लोक-कल्याण व विकास में आगे बढ़ते रहते।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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