लगभग पांच शताब्दी की लंबी प्रतीक्षा के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन समारोह संपन्न् हो गया। कोविड महामारी के बावजूद इस समारोह ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। स्वाभाविक रूप से एक बड़े वर्ग ने इस समारोह का स्वागत करते हुए राम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इसी के साथ खुद को वामपंथी, सेक्युलर और लिबरल कहने वालों ने इस दिन को भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात करने वाला दिन बताया। देश के सांस्कृतिक-धार्मिक मूल्यों से कटे हुए इन लोगों ने यह साबित करने की भी कोशिश की कि इतिहास पांच अगस्त को एक ऐसे दिन के रूप में याद रखेगा, जब बहुसंख्यकवाद को थोपने का काम किया गया।

ऐसे दुराग्रही लोगों की सोच बदलना मुश्किल है, क्योंकि उनकी सोच बहुत संकुचित है। इस सोच के मूल में है उनकी शिक्षा-दीक्षा। यह वर्ग पाश्चात्य संस्कृति से इतना अभिभूत है कि वह अपनी संस्कृति और उसकी मान्यताओं से परिचित ही नहीं होना चाहता। इसी कारण वह राम मंदिर की महत्ता को नहीं समझ रहा। राम मंदिर महज एक और मंदिर नहीं है। इसकी महत्ता एक तीर्थस्थल से बढ़कर है, क्योंकि यह राम के जन्म-स्थल पर निर्मित हो रहा है। इसकी महत्ता उतनी ही है, जितनी मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर की। दुराग्रही वर्ग यह समझने को भी तैयार ही नहीं दिखता कि किसी देश की आत्मा उसकी अपनी संस्कृति में रची-बसी होती है और राम इस देश की संस्कृति में बहुत गहरे रचे-बसे हैं।

यह किसी से छिपा नहीं कि आजादी के बाद की शिक्षा व्यवस्था में वामपंथी हावी रहे और उन्होंने जान-बूझकर इतिहास को एकपक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया। गलत इतिहास के साथ ही उस विजातीय सेक्युलरिज्म ने भी ऐसे लोगों के चिंतन को दूषित किया, जो तुष्टीकरण का पर्याय बनकर रह गया है। इस सेक्युलरिज्म में हिंदू मूल्यों और मान्यताओं के लिए कहीं कोई स्थान नहीं। इस सेक्युलरिज्म को सही समझने वाले इस मुगालते से ग्रस्त हैं कि भारत इसलिए सेक्युलर है, क्योंकि संविधान में सेक्युलर शब्द का उल्लेख किया गया है। ध्यान रहे कि संविधान में सेक्युलर शब्द आपातकाल के दौरान जोड़ा गया। संविधान निर्माताओं ने इसकी आवश्यकता इसीलिए नहीं समझी थी, क्योंकि वे यह जानते थे कि भारत तो सदियों से पंथनिरपेक्षता का पोषक है और सर्वधर्म समभाव उसके स्वभाव में है। सेक्युलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यकों और खासकर मुस्लिम समाज को या तो भयभीत करने का काम किया गया या फिर उसकी अनुचित मांगों को मानने का। शाहबानो मामला इसका सटीक उदाहरण है। सेक्युलरिज्म की इस विकृत राजनीति के कारण ही अयोध्या विवाद का समाधान होने में बहुत देरी हुई। कथित सेक्युलर-लिबरल लॉबी ने इसके लिए पूरी कोशिश की कि उच्चतम न्यायालय अयोध्या विवाद सुलझाने का काम न करे।

कायदे से आजादी के बाद अयोध्या विवाद का समाधान उसी तरह होना चाहिए था जैसे सोमनाथ का किया गया, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और इसकी वजह रही नेहरू की वामपंथी सोच। नेहरू सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के भी खिलाफ थे, लेकिन गृह मंत्री सरदार पटेल और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आगे उनकी नहीं चली। कांग्रेस नेहरू की सोच को ही आगे बढ़ाती रही और मुसलमानों का जमकर तुष्टीकरण करती रही। इसी कारण वह समान नागरिक संहिता पर मौन रही या फिर उसका विरोध करती रही। राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन समारोह पर मीन-मेख निकाल रहे लोग यह सुनने-समझने को तैयार नहीं दिख रहे कि इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने क्या कहा? उन्होंने मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को राष्ट्र को जोड़ने का उपक्रम बताने के साथ ही यह रेखांकित किया कि यह मंदिर वर्तमान को अतीत से और स्वयं को संस्कार से जोड़ने की पहल है। प्रधानमंत्री ने यह कहकर कि राम ने सामाजिक समरसता को अपने शासन की आधारशिला बनाया था, यही स्पष्ट किया कि एक समरस भारत का निर्माण होना चाहिए। राम मंदिर देश में एकता और बंधुत्व की भावना को बल दे, इस पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी बल दिया। उन्होंने राम मंदिर निर्माण को भारत के निर्माण का शुभारंभ ही नहीं बताया, बल्कि सबको जोड़ने वाला भी कहा। यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंदू समाज की कमजोरी के कारण ही भारत कमजोर पड़ा और विदेशी आक्रमणकारी देश को नष्ट-भ्रष्ट करने में सफल रहे।

भाजपा ने राम मंदिर और अयोध्या को लेकर अपने विचार कभी नहीं बदले, लेकिन कांग्र्रेसी नेताओं के बयानों से साफ है कि उन्हें देश का माहौल देखते हुए अपनी सोच बदलनी पड़ी। इसमें संदेह है कि देश इतनी आसानी से भूल जाएगा कि कांग्रेस ने किस तरह राम मंदिर निर्माण में अड़ंगे लगाए? शायद कांग्रेस को अपनी गलतियों का अहसास हो रहा है और इसी कारण राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत अन्य कांग्रेसी नेताओं ने राम का स्मरण किया, लेकिन तथ्य यह भी है कि कई कांग्र्रेसी राम मंदिर के खिलाफ बयान देने में लगे हुए हैं। इन कांग्रेसी नेताओं की सोच वैसी ही है, जैसी विदेशी मीडिया में राम मंदिर के विरोध में लेख लिखने वालों की है। विदेशी मीडिया में कई ऐसे लेख लिखे गए हैं, जिनका मकसद मुस्लिम समाज की भावनाओं को भड़काना और मोदी के नेतृत्व वाले भारत को नीचा दिखाना है। विडंबना यह है कि कई पढ़े-लिखे भारतीय इन लेखों से प्रभावित दिख रहे हैं। कुछ कह रहे हैं कि अयोध्या में अस्पताल या विश्वविद्यालय बनता तो बेहतर होता। आखिर राम जन्म-स्थल पर ही अस्पताल या स्कूल बनाने की जिद क्यों? क्या अन्य स्थलों पर इनके निर्माण के लिए जगह का अभाव है? सवाल यह भी है कि क्या अयोध्या विवाद ने इस पर रोक लगा रखी थी कि देश में अन्य कहीं अस्पताल या स्कूल न बनें?

चूंकि राम मंदिर के खिलाफ एक वर्ग विष वमन करने में लगा हुआ है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी यही काम कर रहा है इसलिए सरकार को कूटनीति के जरिये यह सुनिश्चित करना होगा कि यह वर्ग न तो माहौल खराब करने पाए और न ही देश की अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल करने पाए। नि:संदेह राम मंदिर निर्माण का दायित्व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का है, लेकिन इस मंदिर के खिलाफ दुष्प्रचार की काट करना सरकार की जिम्मेदारी है। हर भारतीय को भी यह समझना होगा कि जो अपनी संस्कृति का निरादर करते हैं वे कहीं भी आदर नहीं पाते। यह सबकी जिम्मेदारी है कि हिंदू संस्कृति और समाज अपनी खामियों और कुरीतियों से मुक्त हो। यह तभी होगा, जब राम मंदिर निर्माण के साथ ही चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को भी बल दिया जाएगा।

(लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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