कोरोना ने एक बार फिर मध्य प्रदेश के सामने बडी चुनौती पेश की है। माना जा रहा था कि 2021 कोरोना के सफाए का साल होगा, लेकिन मार्च माह में संक्रमितों की बढती संख्या ने इस अनुमान को झुठला दिया है। प्रतिदिन मरीजों की संख्या में वृद्धि हो रही है। गंभीर रूप से संक्रमित मरीजों की तादात तो बढ़ी ही है, मृतकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। एक बार फिर इंदौर एवं भोपाल सर्वाधिक संक्रमित मरीज वाले शहरों की सूची में आ गए हैं। जिस गति से संक्रमण बढ़ रहा है, उससे साफ है कि यदि सख्ती और सावधानी न बरती गई तो आने वाले कुछ माह कठिनाई में ही बीतने वाले हैं।

यह अच्छी बात है कि 2020 की तुलना में राज्य सरकार कोरोना को लेकर ज्यादा सचेत है। उसने समय रहते एहतियाती कदम उठाए हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। पिछले साल जब कोरोना की शुरुआत हो रही थी, तब मध्य प्रदेश में कमल नाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। ठीक उसी समय कमल नाथ-दिग्विजय-सिंधिया का सियासी विवाद चरम पर था, जिसके कारण कांग्रेस में विद्रोह की भूमिका बन गई। सत्ता के संघर्ष में उलझे मुख्यमंत्री कमल नाथ कोरोना से लड़ाई में उतना समय नहीं दे सके जितना जरूरी था। जैसे-जैसे सत्ता का संघर्ष बढता गया वैसे-वैसे कोरोना भी पांव फैलाता गया। आखिरकार कमल नाथ की सरकार गिर गई, लेकिन तब तक कोरोना तेजी पकड़ चुका था। बाद में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में गठित सरकार ने कोरोना से लडने की इच्छाशक्ति दिखाई। सुरक्षा प्रबंधों के साथ चिकित्सकीय इंतजाम पर ध्यान दिया। सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था दुरुस्त करने के साथ कई निजी अस्पतालों से भी अनुबंध किया। लाकडाउन से लेकर छोटे-छोटे प्रतिबंध लगाए गए, जिसके कारण कुछ माह में कोरोना का विस्तार थमने लगा। साल 2020 के अंत तक संक्रमण दर में आशा के अनुरूप गिरावट दर्ज की गई। नए साल 2021 की शुरुआत में तो लगने लगा था कि मध्य प्रदेश कोरोना के खिलाफ लड़ाई लगभग जीत चुका है, लेकिन यह खुशफहमी ही थी। प्रतिबंधों में दी गई ढील के दौरान लोगों ने अनुशासन तोड दिया, जिसका परिणाम अब भयावह रूप में सामने आ रहा है।

आंकडों पर गौर करें तो प्रदेश में पिछले साल (2020) 20 मार्च को जबलपुर में कोरोना का पहला मरीज मिला था। इसके बाद तो इंदौर एवं भोपाल संक्रमण दर के मामले में देश के चुनिंदा शहरों में शामिल हो गए। इंदौर ने तो पूरे देश को डरा दिया था। प्रदेश में तब से मरीजों की संख्या लगातार बढ़ते हुए 2 लाख 84 हजार से ऊपर पहुंच गई है। कोरोना के कारण मध्य प्रदेश अब तक 3986 लोगों को खो चुका है। प्रशासन की ढील और लोगों की ढिंठाई के कारण एक साल बाद भी संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है। पिछले साल मार्च में सिर्फ 66 और अप्रैल में 2559 मरीज पूरे प्रदेश में मिले थे। इस साल मार्च में अकेले एक दिन में ही दो हजार से ज्यादा मरीज मिल रहे हैं। हर दिन लगभग 9 से लेकर 11 मरीजों की मौत हो चुकी है। वायरस जितना मजबूत होता जा रहा है, बचाव तंत्र को एक बार फिर उससे भी तेज गति से कसने की जरूरत है।

पिछले साल सरकार के स्तर पर शुरुआती लापरवाही जरूर हुई, लेकिन सत्ता बदलते ही शिवराज सरकार ने तेजी से प्रबंधों पर ध्यान दिया था। आम लोगों से लेकर सरकार तक में कोरोना को लेकर डर इस कदर था कि लडाई मजबूत होने लगी। जनता भी घरों में रहकर गाइडलाइन का पालन कर रही थी। कोई मरीज मिलता तो पुलिस और प्रशासन के लोग वाहनों के साथ उसके घर पहुंच जाते थे और उसे अस्पताल ले जाकर भर्ती करा देते थे। अब एक बार फिर सरकार के सामने चुनौती है कि वह जांच एवं चिकित्सा प्रबंधों में पहले वाली तेजी ले आए। हालांकि सरकार ने इस दिशा में पहल तेज कर दी है। जनता को जागरूक करने के साथ प्रशासनिक तंत्र को कसने में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो तेजी दिखाई है उससे संकेत मिलता है कि मध्य प्रदेश एक बार फिर कोरोना के विस्तार को रोकने में सफल होगा।

मुख्यमंत्री हर दूसरे-तीसरे दिन समीक्षा बैठक कर रहे हैं। हर दिन जांच करने का लक्ष्य 20 हजार सैम्पल से बढ़ाकर 30 हजार कर दिया गया है। कोरोना संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों को खोज कर उनकी जांच कराने की भी तैयारी है। मरीजों के निश्शुल्क इलाज के लिए जरूरत पर निजी अस्पतालों से अनुबंध करने की बात भी सरकार कह रही है। जरूरी है कि यह निर्णय जल्दी कर उन पर अमल शुरू किया जाए। जिस तेजी से मरीज बढ़ रहे हैं, सरकार को इंतजाम भी उसी तरह से दूरगामी सोच के साथ रखना होगा। भरपूर संसाधनों और सुविधाओं के साथ कोरोना से लड़ने के लिए तैयार रहना होगा। संक्रमण रोकने के लिए कोई सख्त कदम उठाना पड़े तो वह भी सरकार को करना चाहिए।

यह भी एक तथ्य है कि चुनावी रैलियों, सरकारी और निजी आयोजनों, धरना प्रदर्शन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर मिली छूट ने कोरोना के फैलाव का रास्ता बनाया। लोगों ने अनुशासन तोड़ा, मास्क पहनना छोडा और शारीरिक दूरी बनाने से परहेज किया, जिसका नतीजा सामने है। 9 मार्च को पूरे प्रदेश में 459 मरीज मिले थे, जबकि 31 मार्च को 2332 मरीज मिले। अब सरकार के सामने चुनौती बढ़ गई। जिस तेजी से मरीज बढ़ रहे हैं, उसी लिहाज से अस्पतालों में बिस्तर बढ़ाने और जांच के लिए सैंपलों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। होम आइसोलेशन वाले मरीजों को निगरानी और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी नए सिरे से प्रबंध होना चाहिए।

पिछले साल अप्रैल में सरकार ने मरीजों के निश्शुल्क इलाज के लिए इंदौर, भोपाल समेत ज्यादा मरीजों वाले शहरों में निजी अस्पतालों से अनुबंध किया था। अब इन अस्पतालों से या तो अनुबंध खत्म कर दिया गया है या फिर बिस्तर घटाकर पहले से करीब 20 फीसद कर दिए गए हैं। अब एक अप्रैल से फिर कुछ निजी अस्पतालों में बिस्तर बढ़ाने के लिए अनुबंध किया गया है, लेकिन जिस तेजी से मरीज बढ़ रहे हैं, उस लिहाज से बिस्तर नहीं हैं। अनेक गंभीर मरीजों को भी बिस्तर नहीं मिल पा रहे हैं। भोपाल को ही लें तो यहां निजी और सरकारी सभी अस्पतालों में पिछले साल सरकार संक्रमित मरीज के संपर्क में आए लोगों की पहचान कर यानी कांटेक्ट ट्रेसिंग कर जांच कराती थी। इस वजह से बीमारी जल्दी पकड़ में आ जाती थी। विशेषज्ञों का कहना है कि शारीरिक दूरी का पालन नहीं करने और मास्क नहीं लगाने वालों पर भारी-भरकम जुर्माना करने की जरूरत है।

Posted By: Ravindra Soni

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