आंदोलन गैरजिम्मेदार राजनीतिक कर्मकांड नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो जीवंत जनतंत्र की प्राण ऊर्जा होते हैं। आंदोलनकारी अपने विचार के पक्ष में लोकमत का परिष्कार और संस्कार करते हैं। ध्येयनिष्ठ आंदोलनकारी संविधान और विधि व्यवस्था को तोड़ने का काम नहीं करते। बीते कई दिनों में आंदोलन के नाम पर देश के विभिन्न् हिस्सों में अरबों रुपये की संपदा आगजनी और तोड़फोड़ में स्वाहा कर दी गई। अकेले रेलवे को करीब 90 करोड़ रुपए की क्षति हुई। हिंसक विरोध प्रदर्शन के कारण 20 से अधिक लोग मारे गए और एक बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए। इस हिंसा में तमाम सरकारी-गैरसरकारी वाहन भी फूंके गए और वह भी तब, जब कई जगह सड़कों पर उतरे लोग गांधी, आंबेडकर आदि के पोस्टर भी लिए हुए थे। मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने ठीक लिखा है, 'गांधी, आंबेडकर, लोहिया वर्तमान भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक आंदोलनों के लिए प्रासंगिक हैं। जो समाज व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, उन्हें तीनों का अध्ययन करना चाहिए। भारत के स्वाधीनता आंदोलन से दो उपलब्धियां हासिल हुईं। इसमें स्वाधीनता पहली उपलब्धि है। दूसरी उपलब्धि यह रही कि इस आंदोलन ने राष्ट्रजीवन को समाजसेवा, राष्ट्रभक्ति, त्यागपूर्ण राजनीति और अहिंसक जीवन मूल्य दिए। स्वाधीनता आंदोलन के आदर्श जीवन मूल्य लोकमानस में संजोकर रखे जाने वाले हैं। संविधान में उल्लिखित मूल कर्तव्यों में कहा गया है कि 'स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।

संविधान का अनुच्छेद 51 ए/बी कहता है कि 'सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और हिंसा से दूर रहना भी संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन हाल के कई आंदोलनों में स्वाधीनता आंदोलनों के आदर्श सिरे से गायब दिखे हैं। स्वाधीनता आंदोलन में जब विदेशी सत्ता से भारत का टकराव था, तब भी आंदोलन आदर्श जीवन मूल्यों से प्रतिबद्ध था तो इसीलिए कि यह भाव प्रबल था कि आंदोलन की अपनी मर्यादा बनी रहनी चाहिए।

गांधी जी स्वाधीनता आंदोलन के निर्विवाद नेता थे। आंदोलन की धार तेज करने के लिए उन्हें सरकारी आदेशों की अवज्ञा का विचार आया। गांधी जी ने इसे 'सविनय अवज्ञा आंदोलन कहा। मार्च 1940 में उनसे बार-बार प्रश्न पूछे जा रहे थे कि सविनय अवज्ञा आंदोलन कब शुरू करेंगें? संपूर्ण गांधी वांग्मय (71.380) के अनुसार गांधी जी ने कांग्रेस कार्यसमिति में कहा, 'देश अभी सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए तैयार नहीं है। छोटी सी अनुशासनबद्ध कांग्रेस को लेकर मैं विश्व से लड़ सकता हूं, लेकिन कांग्र्रेस लचर है। सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया तो 'अवज्ञा ही बचेगी, 'सविनय लुप्त हो जाएगा। गांधी जी के आंदोलन आदर्श में 'सविनय अहम था। अहिंसा और भी अहम। आंदोलन की हिंसा पर गांधी जी के विचार दोटूक थे। संपूर्ण गांधी वांग्मय (77.459) के अनुसार गांधी जी ने कहा, 'तोड़फोड़ की कवायद और इसमें शामिल सभी बातें, संपत्ति का विनाश अपने आप में हिंसा है।

स्वतंत्र भारत के तमाम आंदोलनों में स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय मूल्य नहीं दिखे। आंदोलन और अराजकता पर्यायवाची हो रहे हैं। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में राष्ट्रव्यापी संपूर्ण क्रांति आंदोलन (1975-1977) हुआ था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुआ यह आंदोलन स्वाधीनता आंदोलन के आदर्शों से ओतप्रोत था। तब हम लोग नारा लगाते थे 'हमला चाहे जैसा भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा। तब अहिंसा का मूल्य ही आदर्श था। इसी आंदोलन के दौरान आपातकाल की घोषणा हुई। आपातकाल के तहत मौलिक अधिकार भी छिने, लेकिन आंदोलन ऐतिहासिक रूप में सफल रहा। आंदोलनों के सदाबहार नेता डॉ. राममनोहर लोहिया सविनय अवज्ञा को सिविल नाफरमानी कहते थे। उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह भी किए। सामाजिक मुद्दों पर उनके आंदोलन प्रगतिशील थे। अंग्र्रेजी हटाओ का विषय उनके आंदोलन के मूल में था। उनके आंदोलन का व्यवहार शास्त्र आदर्श था। नारा था कि गलत बात मानेंगे नहीं, मारेंगे भी नहीं। आंदोलन को जनतंत्र की मजबूती का हथियार बनाना ही राष्ट्र का प्रेय श्रेय है। कुछ साल पहले ही अण्णा हजारे के नेतृत्व में भी राष्ट्रव्यापी आंदोलन हुआ। आंदोलन को लेकर प्रतिबद्धता तो थी, लेकिन सार्वजनिक संपदा को क्षति पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने, लोगों को भयभीत करने जैसी अराजकता नहीं थी।

आंदोलन राजनीतिक हमला नहीं होते। वे तो सत्ता और समाज का ध्यानाकर्षण होते हैं। मुद्दा आधारित सभी विमर्श आंदोलन हैं। सभा, जुलूस और प्रदर्शन आंदोलन के ही भिन्न् रूप हैं। इधर कुछ विषयों पर मोमबत्ती लेकर भी जुलूस निकाले गए हैं। इनमें अतिरिक्त शालीनता रही है। आंदोलन राज और समाज को दिशा दे सकते हैं, लेकिन अराजकता आंदोलन को प्रभावशून्य कर देती है। शालीन आंदोलनकारी जननायक दिखाई पड़ते हैं, अराजकता उन्हें जनता की नजरों में गिराती है। रूसी चिंतक साहित्यकार टॉल्सटॉय ने असहमति व्यक्त करने के लिए 'पैसिव रेजिस्टेंस शब्द इस्तेमाल किया था। गांधी जी को 'पैसिव रेजिस्टेंस या निष्क्रिय प्रतिरोध की भावना से प्रेम था। गांधी जी ने इसकी जगह पहले अंग्र्रेजी का सिविल डिसओबिडिएंस शब्द सोचा, लेकिन सबके परामर्श से सत्याग्रह शब्द चुना। गांधी जी से सीखा जा सकता है कि आंदोलन की संरचना के लिए नाम, मर्यादा, अहिंसा और ध्येय की भूमिका महत्वपूर्ण है। सत्याग्रही आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या संस्था का विरोधी नहीं होता। ऐसे आंदोलन में सत्य का आग्रह होता और आग्रह में आत्मबल। यह किसी का विरोधी नहीं होता और इसीलिए वह अहिंसक होता है।

प्रकृति अराजक नही। यह सुसंगत व्यवस्था में है। राजव्यवस्था का जन्म और विकास अराजकता को हटाने के लिए ही हुआ। यह बात हॉब्स ने लिखी। कुछ ऐसी ही बात वैदिक साहित्य में भी है। राजव्यवस्था संविधान के बंधन में है।

आंदोलनकारी संविधानप्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार पाते हैं, लेकिन इस मौलिक अधिकार में भी लोक व्यवस्था के बंधन हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 को वैध ठहराया। डॉ. राममनोहर लोहिया ने इस धारा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक समूह द्वारा लोक व्यवस्था को छिन्न्-भिन्न् करने की अनुमति से कोई भी लोकतंत्र नहीं चल सकता। मधु लिमये के ऐसे ही वाद में सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने भी यही कहा। संप्रति धारा 144 पर हल्ला है। कई जाने-माने लोग यह ज्ञान दे रहे कि धारा 144 तो गैरकानूनी है और उसका लगना आपातकाल की आहट है। यह हास्यास्पद है।

डॉ. बीआर आंबेडकर भी आंदोलनकारी थे। उन्होंने प्रदर्शन आंदोलन के साथ लेखन से भी जनजागरण किया। उन्होंने 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के अंतिम भाषण में कहा था, 'यदि हमें लोकतंत्र को यथार्थ रूप में बनाए रखना है तो हम सामाजिक, आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति हेतु दृढ़तापूर्वक संवैधानिक रीति अपनाएं। अवज्ञा आंदोलन का त्याग करें। असंवैधानिक रीति अपनाना न्यायसंगत नहीं। ये नीतियां अराजकता के सिवा और कुछ नही हैं। आचार विहीन आंदोलन और अराजकता पर्यायवाची है। डॉ. आंबेडकर ने इन्हें अराजकता कहा था। आंदोलनों का कोई आचार शास्त्र तो होना ही चाहिए।

(लेखक उप्र विधानसभा के अध्यक्ष हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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