प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल की दूसरी पारी में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को मिलाकर जल शक्ति मंत्रालय बना दिया है। इस मंत्रालय की कमान गजेंद्र सिंह शेखावत को सौंपी गई है। शेखावत ने इस मंत्रालय की कमान संभालते ही यह घोषणा की कि अभी देश के 18 प्रतिशत ग्रामीण घरों में ही नल से जल की आपूर्ति होती है, लेकिन अगले पांच साल में शेष सभी 82 प्रतिशत घरों में भी नल से पेयजल की आपूर्ति की जाएगी। इस आशय का वादा भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में भी किया था। इस वादे के अनुसार जल के लिए नया मंत्रालय बनाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी नदियों को जोड़ने के अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि पीने के पानी की समस्या का समाधान करने के साथ ही सिंचाई के लिए भी पानी उपलब्ध कराया जा सके।

ग्रामीण इलाकों में हर घर को नल से जल पहुंचाने की योजना चुनौती भरी है। यह चुनौती गरीबों को रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने और शौचालयों का निर्माण कराने से अधिक कठिन है, लेकिन इसे पूरा करना भी आवश्यक है। यह योजना इस कड़वी हकीकत को इंगित करती है कि देश की आजादी के 72 वर्षों बाद भी हम सभी को पेयजल उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। अर्थव्यवस्था के लिहाज से भारत से पिछड़े कई देश अपने लोगों को बिजली, पानी एवं अन्य नागरिक सुविधाएं देने में समर्थ रहे हैं। कई देश तो ऐसे हैं, जो सभी को पेयजल उपलब्ध कराने के साथ उसकी गुणवत्ता भी बनाए रखने में सक्षम हैं। यूरोपीय समुदाय में शामिल होने वाले देशों के सामने तो एक शर्त यह थी कि वे पेयजल संबंधी मानकों को पूरा करें।

अपने देश में पेयजल के मामले में मानक तो बने हुए हैं, लेकिन उनका पालन मुश्किल से ही होता है। यही कारण है कि बड़े शहरों में भी गंदे जल की आपूर्ति की शिकायतें सामने आती रहती हैं। स्थानीय निकाय समुचित मात्रा में पानी की आपूर्ति करने में अक्षम हैं।

एक आंकड़े के अनुसार देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वर्ष 2001 में 1816 क्यूबिक मीटर थी, जो वर्ष 2011 में 1544 क्यूबिक मीटर हो गई, लेकिन केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 में पूरे देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1140 क्यूबिक मीटर रह जाने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार यदि प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1000 क्यूबिक मीटर से नीचे आती है, तो उसे जल संकट माना जाता है।

समस्या यह है कि देश के कई नदी बेसिन में जल उपलब्धता का पैमाना नीचे जा रहा है। इनमें कृष्णा, कावेरी, साबरमती भी हैैं। इसे देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि देश का एक भाग रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है। आज देश के कितने ही गांवों में महिलाओं को सिर पर पानी ढोकर मीलों चलना पड़ता है। कई जगह यह पानी शुद्ध व पीने लायक भी नहीं होता। अनेक शहरों का भी बुरा हाल है।

अनियोजित विकास ने हर घर को पानी पहुंचाने के लक्ष्य को और मुश्किल बना दिया है। ध्यान रहे कि देश की राजधानी दिल्ली तक में ऐसे इलाके हैं, जहां के लोग पानी के टैंकरों पर निर्भर रहते हैं। भारत में पेयजल की किल्लत का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि तमाम ऐसे इलाकों में भी ट्यूबवेल से भूमिगत जल का दोहन किया जा रहा है, जहां नल से जल भेजने की सुविधा है। इसके चलते भूजल स्तर गिरता जा रहा है।

एक बड़ी समस्या यह भी है कि भूमिगत जल दूषित हो रहा है। कहीं-कहीं तो इतना दूषित हो गया है कि वह न तो पीने के लायक हैै और न ही सिंचाई के लायक। उल्टे वह दूषित पानी लोगों में बीमारियां फैलाने का काम कर रहा है।

अपने देश में पीने और सिंचाई के पानी की समस्या आज से नहीं, बल्कि आजादी के पहले से है। इसी तरह नदी जल के बंटवारे की समस्या भी बहुत पुरानी है। आज भी नदी जल बंटवारे को लेकर कई राज्यों के बीच तनातनी चलती रहती है। कर्नाटक और तमिलनाडु के मध्य कावेरी जल को लेकर विवाद है, तो पंजाब और हरियाणा के बीच सतलज नदी के जल को लेकर। वहीं देश के कुछ हिस्से ऐसे भी हैं, जो दूसरे देश से आने वाली नदियों के पानी को लेकर परेशान होते रहते हैं।

पानी से जुड़ी समस्याएं इसलिए बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि सामाजिक-आर्थिक कारणों से भारत अब तक ढंग की कोई जल नीति नहीं बना पाया है। अब जब मोदी सरकार ग्रामीण क्षेत्र में हर घर को नल से जल पहुंचाने की योजना आगे बढ़ा रही है तब फिर उसे इस पर ध्यान देना होगा कि नदियों के जल का ठीक से बंटवारा हो, भूमिगत जल का अनावश्यक दोहन न हो, उसे प्रदूषित होने से रोका जाए और बारिश के जल का संरक्षण और संचयन हो। यदि बारिश के जल के एक चौथाई हिस्से को भी ढंग से संरक्षित और संचित किया जा सके तो पेयजल और सिंचाई के पानी की सारी जरूरतें पूरी हो सकती हैं, लेकिन इस दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा सके हैं। जो कदम उठाए भी गए हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। गौरतलब है कि जल संरक्षण की योजनाएं सतत निगरानी और बेहतर रख-रखाव की मांग करती हैं। इसके अभाव में ये योजनाएं वैसे ही नाकाम हो सकती हैं, जैसे सीवेज शोधन संयंत्र हो रहे हैं। जल संरक्षण की योजनाओं का नियमन और उनका रख-रखाव बेहतर ढंग से किया जाना इसलिए अनिवार्य हो गया है, क्योंकि जल संकट बढ़ता जा रहा है। जल संकट से बचने के लिए इस सवाल को भी सुलझाना होगा कि जल को संविधान की समवर्ती सूची में लाया जाए या नहीं?

आज देश के तमाम हिस्सों में छोटी-छोटी नदियां नालों में तब्दील हो चुकी हैं। कुछ तो नष्ट होने की कगार पर है। नदियों के अलावा अन्य पंरपरागत जलस्रोत भी अनदेखी का शिकार हैं। स्पष्ट है कि नवगठित जल शक्ति मंत्रालय को इन समस्याओं पर गंभीरता से गौर करना होगा।

चूंकि केंद्र सरकार का काम नीतियां बनाना और उन पर अमल करना राज्यों का काम है, इसलिए राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और यह देखना होगा कि स्थानीय निकाय अपना काम सही ढंग से करें, क्योंकि पानी के प्रबंधन का काम उनके ही जिम्मे आता है। यदि ऐसा नहीं होता तो मोदी सरकार की हर घर को नल से जल पहुंचाने की योजना को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

यह तय है कि इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए अच्छा-खासा धन चाहिए होगा। राज्यों ने इस योजना पर अमल के लिए जितने धन की जरूरत जताई है, उससे यह स्पष्ट है कि अगले पांच सालों में केंद्र को इस योजना के मद में बड़ी धनराशि का प्रबंध करना होगा। अगर अगले पांच साल में इस योजना पर सही ढंग से अमल हुआ तो देश के लोगों को एक बड़ी राहत तो मिलेगी ही, मोदी सरकार को 2024 में वैसी ही राजनीतिक सफलता मिल सकती है, जैसी हाल के आम चुनावों में गरीबों को रसोई गैस उपलब्ध कराने और उनके घरों में शौचालय निर्माण संबंधी योजनाओं से मिली।

(लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)

Posted By: Ravindra Soni