प्रकाश के प्रति आकर्षण भारतीय परंपरा में आरंभ से ही रहा है। भारतीय समाज में आज भी अनेक व्रत और उत्सव प्रकाश के नियामक चंद्र, सूर्य और अग्नि को केंद्र में रख कर आयोजित होते हैं। दिन और रात की नियमित प्राकृतिक व्यवस्था में अंधकार और प्रकाश हमारे अनुभव की दुनिया के अकाट्य और स्थायी हिस्से के रूप में आते हैं, जिनकी परिधि के अंतर्गत ही सारे जीवन व्यापार आयोजित होते हैं। बिना थके-हारे अंधकार से जूझना और प्रकाश को पाने का क्रम अनवरत चलता रहता है। उल्लेखनीय है कि सूर्य के प्रकाश की ऊष्मा की शक्ति पशु, पक्षी, मनुष्य तथा वनस्पति सबके लिए जीवनदायी होती है। ऐसे में जहां प्रकाश को आशा, उत्तेजना, गति और उत्कर्ष का संकेत करने वाला मान लिया गया, वहीं अंधकार को निराशा, शिथिलता, ठहराव और गिरावट को व्यंजित करने वाला। अंधकार को तम भी कहते हैं। इसके कई अर्थ मिलते हैं जैसे- दुखी होना, भ्रम, शोक, पाप और अज्ञान आदि। प्रकृति के तीन गुणों में सत और रज के साथ एक तमो गुण भी है, जो निष्क्रियता को बताता है। इसके विपरीत प्रकाश चमकने वाला, दीप्ति, कांति, आभा, उज्ज्वलता और प्रस्फुटन को दर्शता है। इस प्रकार प्रकाश भारत की सजग सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा भी बन चुका है। श्रीराम के अयोध्या आगमन के अवसर पर आयोजित भव्य दीपोत्सव भी इससे जुड़ा है, तो भगवान महावीर का निर्वाण भी। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रसंग में भी दीपोत्सव से जुड़े हैं।

दीपावली का उत्सव ग्रीष्म ऋतु के बाद शीत के आगमन और खेती-किसानी में समृद्धि के अनुभव के अवसर के रूप में उपस्थित होता है। इस समय घर की अच्छी तरह साफ-सफाई की जाती है और फिर घर-घर दीपक जलाए जाते हैं। प्रज्वलित दीप उद्दीप्त करने वाला होता है। उसकी आभा से घना से घना अंधेरा भी भाग खड़ा होता है, पर भौतिक अंधेरे से अधिक कठिन है मन और अज्ञान का अंधेरा। अज्ञान होने पर दुनिया सिमट जाती है। कार्य करने के अवसर संकुचित हो जाते हैं। दीपावली का त्योहार हमें खुद को भी टटोलने का न्योता देता है कि हम व्यापक जीवन में भी सत्य और ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हों। अज्ञान ही सबसे बड़ा अंधकार है और उसे दूर करना तथा उसके असर से बचा रहना बड़ा ही आवश्यक है। मुश्किल यह है कि कई बार हम कुछ और तरह के आकर्षण में आकर ज्ञान के मार्ग से विचलित हो जाते हैं और अधेरी राह पर चल पड़ते हैं, जिसके परिणाम भयावह होते हैं। अज्ञान से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता और ज्ञान जैसा हित साधने वाला कोई मित्र नहीं होता है। सही-गलत का भेद हो या शत्रु-मित्र की पहचान हो, गैर जानकारी में कुछ भी उचित ढंग से नहीं हो पाता। आज बहुत-सी जानकारी और कौशल आम नागरिक की तरह जीने के लिए जरूरी है। हमारे मन में पल रहे दुराग्रह और भेदभाव के विचार भी अंधकार की ही तरह काम करते हैं।

आज अपने से भिन्न मत, विचार और धर्म के प्रति सहिष्णुता कम हो रही है। अपने ऊपर अभिमान की परत चढ़ाकर हममें से बहुतों की दृष्टि संवेदनशून्य होती जा रही है। अपने सीमित आत्मबोध को ही सत्य की कसौटी मानकर लोग नियम-कानून का पालन न करना, झूठ बोलना और अवैधानिक तौर-तरीके अपना कर अवांछित लाभ उठाने से नहीं हिचकते। ये सब भी अंधकार के ही रूप हैं। हममें से बहुतेरे लोग अज्ञान और भ्रम के कारण उचित-अनुचित का विवेक नहीं कर पाते और दूसरों का शोषण करते हैं। समाज में व्याप्त कुरीतियां भी अंधकार का ही रूप हैं। आज पाखंड और मिथ्याचार तेजी से बढ़ रहा है। झूठ-फरेब को सफलता की युक्ति की तरह प्रयोग में लाया जा रहा है। प्रकाश यानी ज्ञान और उससे आने वाली समृद्धि के लिए हमें व्यक्तिगत और सामाजिक स्तरों पर व्याप्त प्रकट और प्रच्छन्न अंधकार से जूझना होगा। यह लड़ाई निरंतर चलने वाली है।

हिंदी के श्रेष्ठ कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने 1931 में 'वर दे वीणा वादिनी वर देÓ शीर्षक से सरस्वती वंदना लिखी थी, जो बड़ी लोकप्रिय हुई। यह कालजयी कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। याद रहे यह वही दौर था, जब गुलाम भारत में पूर्ण स्वराज्य की मांग उठी थी, गांधी-इरविन समझौता हुआ था और प्रख्यात क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे भारत माता के वीर सपूतों को अंग्रेज सरकार ने फांसी दी थी। पूरे देश में स्वतंत्रता की भावना प्रबल हो रही थी। तब निराला जी ने ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती आह्वान करते हुए कहा-

काट अंध-उर के बंधन-स्तर/ बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर

कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर/ जगमग जग कर दे!

इन पंक्तियों में निराला जी ज्ञान की देवी सरस्वती से यह प्रार्थना करते हैं कि हृदय में व्याप्त अज्ञान, भ्रम का अंधकार बंधन के रूप में विद्यमान है। उस बंधन को काट फेंकिए और ज्योति यानी ज्ञान के प्रवाह में सबको सराबोर कीजिए, ताकि हर तरह के कलुष या वैमनस्य के अंधकार का नाश हो जाए और चारों ओर पावन प्रकाश फैल जाए। यह प्रार्थना आज हर देशभक्त के मन में जग रही है,जगनी चाहिए। साम्राज्यवाद के दैत्य से लड़कर महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश को आजादी मिली। भारत ने लोकतंत्र का मार्ग चुना, जिसके लिए समता, समानता, बंधुत्व और समरसता को आधार बनाया गया। सात दशकों में लोकतंत्र को सुरक्षित रखते हुए हम आगे बढ़े हैं, परंतु उसका प्रकाश सब तक अभी भी नहीं पहुंच पा रहा है। देश के भाव से जुडऩा और सबको जोडऩे की मानसिकता विकसित कर ही हम देश को प्रगति पथ पर ले जा सकेंगे।

(लेखक पूर्व कुलपति एवं दर्शनशास्त्री हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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