आशीष व्यास

बतौर कलेक्टर मेरे पास एक ग्रामीण परेशानी लेकर आया। कागज देखकर मैंने अधीनस्थ अधिकारियों से कहा कि इस समस्या का समाधान करें। अफसरों ने उसे एक कागज थमा दिया। वह चला गया। लगभग आठ महीने बाद वही व्यक्ति दोबारा पहुंचा और मुझे एक कागज दिया। उस पर लिखा था - समस्या का निदान 'सक्षम न्यायालय' से होगा। उसने बड़ी मासूमियत से कहा - मुझे यह जगह कहीं नहीं मिली! कोई मुझे बता ही नहीं पा रहा है कि 'सक्षम न्यायालय' कहां है! मैंने तत्काल संबंधित अधिकारी को बुलाया और पूछा कि 'सक्षम न्यायालय' क्या होता है? उसने आसानी से कह दिया -'सिविल कोर्ट'। अब अगला सवाल था - तो फिर सिविल कोर्ट क्यों नहीं लिखा? उसने कहा कि सरकारी भाषा में 'सक्षम न्यायालय' ही लिखा है!

मतलब - काम करने की यह जो सरकारी भाषा है, कई बार परेशान कर देती है!

बतौर प्रमुख सचिव, दोपहर 12 से 01 बजे के बीच ऑफिस का समय 'फ्री-ऑवर' घोषित कर रखा था। इस दौरान कोई भी बिना पूर्व अनुमति के मिल सकता था। एक सेवानिवृत्त शिक्षक आवेदन लेकर आए। उन्हें नौ साल से पेंशन नहीं मिली थी। कारण पूछा तो पता चला कि उनकी सेवा पुस्तिका में कुछ दिनों का उल्लेख नहीं है। मैंने कहा - शाम को आइए, कोशिश करता हूं कि आज आपके पेंशन-पेपर जारी करवा सकूं। उन्होंने इस तरह से देखा कि जैसे पूछना चाह रहे हों - जो काम नौ साल में नहीं हुआ, वह शाम तक कैसे हो जाएगा? थोड़ी पड़ताल की तो सचिव ने बताया कि नियमानुसार 15 दिन के सेवाकाल का उल्लेख विभाग से ही किया जा सकता है। इसके बाद नोटशीट तैयार हो गई। शाम को पेंशन ऑर्डर देखकर सेवानिवृत्त शिक्षक स्तब्ध थे!

मतलब - काम करने का यह जो सरकारी तरीका है, कई बार परेशान कर देता है!

दोनों घटनाओं का संदर्भ जुड़ा है मध्य प्रदेश में पदस्थ रहे सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी एके वाजपेयी से। ये दोनों घटनाएं इस बात का प्रमाण भी हैं कि सरकारी तंत्र कैसे परंपरागत पद्धतियों पर काम करता है! और, इस बात का सबूत भी कि प्रशासनिक समझ से यदि छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना किया जाए तो समाधान तत्काल सामने लाए जा सकते हैं। ऐसे मामले शासन, प्रशासन और जनता के बीच टूटे-फूटे संवादों की कड़ियां जोड़ते हुए भी दिखाई देते हैं और यह भी बताते हैं कि लोक और तंत्र के बीच संवाद कितना आसान और सहज होना चाहिए। यदि संवाद शुरू होगा तो उसके सार्थक होने की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन बुनियादी प्रश्न यही है कि क्या संवाद होता है? शासन की लोक कल्याणकारी भावना को आम आदमी तक पहुंचाने में प्रशासनिक प्रक्रिया सहयोग करती है या संकट बनती है, इसी से निर्धारित हो जाता है कि आम आदमी किसी भी व्यक्ति-व्यवस्था या शासन-प्रशासन के बारे में क्या सोचता है? संवाद की इसी श्रृंखला में प्रदेश सरकार ने 'आपकी सरकार-आपके द्वार' कार्यक्रम शुरू किया है। इस स्पष्ट उद्देश्य के साथ कि आम आदमी खास तक पहुंच नहीं पाता है, इसलिए सरकार खुद जाएगी, समस्याएं सुनेगी और यथासंभव समाधान भी तत्काल देगी। जनसंवाद या जनजुड़ाव के कई तरीके अलग-अलग सरकारों में काम करते रहे हैं। यह लक्ष्य लेकर कि सरकारी अमला और जनता ऐसी सार्वजनिक जगह पर मिले, जहां लोगों का सबसे ज्यादा आना-जाना हो। जैसे सामुदायिक भवन, धर्मशालाएं, हाट-बाजार या फिर चौपाल। इससे सार्वजनिक स्थलों की व्यवस्थाएं चाक-चौबंद रहती हैं और सभी के लिए वहां पहुंचना भी आसान होता है। लेकिन, बड़ा सवाल फिर वही है कि सिर्फ चौपाल पर पहुंचने, जनसुनवाई में सैकड़ों लोगों के जुटने या फिर बस भरकर अफसरों के गांव-कस्बों तक पहुंच जाने से ही समस्या-समाधान या सार्थक-संवाद हो जाएगा?

अब बात करते हैं दो सरकारों की, दो पहल पर। पहली - शिवराज सरकार के दौरान शुरू हुई थी जनसुनवाई। शुरुआत प्रभावी थी। इसी क्रम में एक और प्रयोग शुरू हुआ था - सीएम हेल्पलाइन। जिस तरह से इसे तैयार किया गया था, उससे लगा था कि सिस्टम अपने आप ही 'चेक-बैलेंस' होता रहेगा और लोगों की सुनवाई लगातार होती रहेगी। शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री खुद 'हॉट सीट' पर बैठे। निराकरण न करने वालों को सजा भी सुनाई, लेकिन तमाम चौकसी के बावजूद यह व्यवस्था भी लालफीताशाही की भेंट चढ़ गई। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में अभी भी 10 हजार से ज्यादा मामले अटके पड़े हैं। इनमें से अधिकांश 'लेवल-04' पार चुके हैं। मतलब, नीचे के स्तर पर कोई सुनवाई हुई ही नहीं। दूसरी - कमलनाथ सरकार का नया प्रयोग 'आपकी सरकार-आपके द्वार'। इसके तहत जिले के सारे अधिकारी एक साथ, एक गांव में जाएंगे, वहीं बैठकर समस्याएं भी सुलझाएंगे। पहले किए गए सभी प्रयोगों की तरह इसमें भी सबसे बड़ा फायदा यह है कि आम आदमी इस बात को लेकर खुश हो सकता है कि व्यवस्था से जुड़े सभी पायदान, छोटे-बड़े निर्णय लेने वाले सभी पड़ाव एक साथ उसके दरवाजे पर हैं। सरकार की मंशा को व्यावहारिक धरातल पर उतारने वाले प्रशासनिक नुमाइंदों को यह समझना चाहिए कि आहत आदमी तत्काल राहत चाहता है, नियम-कानून के दायरे में ही सही एक ऐसे समाधान की अपेक्षा रखता है, जिससे वह किसी भी व्यवस्था को अपना मान सके। उसे इस बात का विश्वास हो सके कि शासन-प्रशासन न केवल उसके साथ हैं, बल्कि उसकी समस्याओं से लड़ने के लिए उसके आगे खड़े हैं!

यह तो हुई समस्या तक पहुंचने और हल तलाशने की बात। लेकिन, इसके आगे क्या? क्या यह संभव है कि आम आदमी की एक-एक समस्या को खास मानकर, उसे जांचने-परखने का कोई तंत्र बनाया जा सकता है? सच मानिए, तकनीकी प्रयोग और सुविधाओं के इस सर्वश्रेष्ठ दौर में सब कुछ संभव है! उदाहरण के लिए इंदौर में सक्रिय संस्था - सिटीजन कॉप फाउंडेशन। मूल रूप से महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली इस संस्था ने ग्रीन-जीन एप लांच किया है। इसकी मदद से कोई भी व्यक्ति, किसी भी पेड़ से संबंधित जानकारी एप पर दे सकता है। संस्था लोगों को पर्यावरण से जोड़ने के लिए खुद पेड़ लगाएगी और हर महीने एप के माध्यम से बताएगी कि पेड़ कितना बड़ा हुआ है! यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि इस व्यवस्था में अब हर पेड़ का यूनिक क्यूआर कोड है! इससे सालों बाद भी पेड़ लगाने की तारीख और अन्य जानकारियां कभी भी ली जा सकेंगी।

क्या आम आदमी के आवेदन का कोई क्यूआर कोड हो सकता है? केवल इसलिए कि, उसकी पीड़ा को परिभाषा देते एक-एक शब्द का कभी भी हिसाब लिया-दिया जा सके!