इधर कुछ महीनों से उत्तर भारत में भूकंप के झटके बहुत आ रहे हैं। अप्रैल 2020 से दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में भूकंप के करीब 18 हल्के झटके आ चुके हैं। ये झटके इतने जोर के नहीं कि घरों को, इमारतों को धराशायी बना दें, लेकिन इतने कमजोर भी नहीं कि आए और गए और किसी को मालूम भी ना पड़े। जो जलजला रिक्टर 3 या 4 से ऊपर होता है, वह मामूली जलजला नहीं होता। सिर्फ इसलिए नहीं कि उससे हमें नुकसान पहुंच सकता है, पर इसलिए कि उससे हम ये समझ सकते हैं कि यहां की धरती अशांत है।

'बस करो भाई... आप कह सकते हैं मुझको, 'कोरोना से पहले से ही परेशान हैं हम। अब उसके ऊपर और हमें भूकंप के डर से घबराइए मत! सही है यह टोक, बिल्कुल जायज। कितने-कितने डरों को झेल सकता है इंसान? कोरोना की वजह से घरों के अंदर रहने की हिदायत मिली हुई है, सो हम सहमे-सिकुड़े हुए हैं। 'जरूरत हो, बहुत जरूरत हो तब ही बाहर निकलिए, वरना नहीं। घर के अंदर रहने में ही समझदारी है। छह फुट की दूरी याद रहे। दूरी में ही समझदारी, निकटता में खतरा!

पर भूकंप जब आता है, पैरों तले जब जमीन कांपती है, खिड़कियां जब खड़-खड़ खड़खड़ाती हैं और जब हर लम्हा घातक बन जाता है, तो घर के अंदर सिमटे हुए कौन रहने वाला है? तब घर से बाहर जल्द से जल्द निकल जाने में ही होगी समझदारी, अंदर रहने में खतरा। भूकंप का खतरा जितना असली है, वैसे खतरे कम हैं। हम उसको अपने ख्यालों से दूर रख सकते हैं, लेकिन उसको दूर नहीं कर सकते।

राजकोट, गुजरात में इधर कुछ दिनों पहले एक नहीं, दो भूकंप आए। सवेरे-सवेरे। लोग खाट-खटियों से उछलकर दौड़े बाहर। जब भूकंप आता है, उसका अंत नहीं दिखता। लगता है कि दूसरा झटका आने वाला है। अभी आया...अभी आया। डरे-डरे लोग वापस घर जाते हैं। ईश्वर को याद करते-करते!

दिल्ली में तो भूकंप इतने बार आ गए हैं कि अब साप्ताहिक सिलसिला मान लिया गया है। इसमें भी खतरा है। मामूली बात नहीं है यह कि उसको 'रूटीन समझ लिया जाए। भूकंप व्यापक तबाही का स्रोत हो सकता है। यह कहकर मैं पाठकों को चौंकाना नहीं चाहता, उन्हें चौकस जरूर करना चाहता हूं।

वर्ष 2001 में कच्छ में भूकंप आया था। 'भुज भूकंप के नाम से भी जाना जाता है यह। छब्बीस जनवरी के दिन, हमारे गणतंत्र दिवस पर, भूमि ऐसे हिली थी वहां, जैसे पहले कभी ना हिली थी। 7.7 की तीव्रता थी उस भूकंप की। सपाट हो गया था कच्छ। इधर जून 15 को, सौराष्ट्र में फिर भूमि हिली। 5.3 की तीव्रता थी। फिर जुलाई 5 को जमीन एक बार नहीं, दो बार नहीं, पूरे पांच बार हिली- 1.8, 1.7, 1.6, 2.1 और फिर 4.7 की तीव्रता में।

'अच्छा... तो फिर? पूछ सकते हैं आप। तो फिर यह कि हमें सचेत रहना है। 'सचेत? बस? नहीं, सिर्फ सचेत नहीं। हमें यानी देश को भूकंपों के बारे में सक्रिय होना होगा। कैसे सक्रिय? क्या कर सकता है इंसान कुदरत के आगे? क्या हम भूकंपों को रोक सकते हैं? नहीं, कोई भी भूकंप को रोक नहीं सकता। क्या हम भूकंपों को 'प्रेडिक्ट यानी उनके आने या आ सकने के बारे में पहले से आगाह हो सकते हैं? हां, काफी हद तक।

आजकल ऐसे यंत्र उपलब्ध हैं, जो कि 'सेंसर कहलाते हैं, जिनकी मदद से भूकंप वैज्ञानिक कह सकते हैं कि यहां भूकंप के आने के आसार दिख रहे हैं। भारत व आइसलैंड के बीच एक संयुक्त कार्यक्रम के तहत यह सेंसर कुछ भूकंपीय स्थानों पर लगाए गए हैं। यह एक सराहनीय और हमें आश्वस्त करने जैसा कार्यक्रम है। भारत में भूकंपीय क्षेत्रों की अच्छी पहचान है। भू-विशेषज्ञों के अनुमान से भारत की आधे से ज्यादा जमीन (54%) भूकंपीय है। चार क्षेत्र माने गए हैं- 2, 3, 4, 5 नंबर दिए गए हैं उन क्षेत्रों को, जिनमें क्षेत्र 5 सबसे अधिक खतरे में है। कच्छ और पूर्वोत्तर नंबर 5 पर हैं। दिल्ली, हमारी राज-नगरी, नंबर 4 पर।

विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अगले 30 वर्षों के अंदर भारत में 200 मिलियन (20 करोड़) शहर-नुमा जनता भूकंपों से ग्रस्त हो सकती है। 30 वर्षों में? 30 बरस बहुत लगते हैं। '30 वर्षों का मतलब है आज से, इस क्षण से, आगे 30 वर्षों तक...। होने को तो अभी, इस पल, वह बड़ा जलजला आ सकता है। या फिर 20-25-30 सालों में कभी भी। सेंसर हमें आगाह अवश्य करेंगे। लेकिन यह पर्याप्त नहीं। जन-सघन शहरों को खुद की तरफ गौर से देखना होगा।

भीड़-भड़ाका कोविड-19 के लिए बुरा है, तो वह भूकंपों में भी उतना ही बुरा है। हमें अपने शहरों को हल्का करना होना। शहरों को उनकी ऊंची-ऊची इमारतों से बचाना होगा। उनकी तंगियों से, उनके घनत्व से बचाना होगा। अर्थात हमें शहरों को उनके निज से, उनको अपने खुद से बचाना होगा।

हम अपने शहरीकरण को बढ़ाते आए हैं। बेलगाम घर-निर्माण, दुकान-निर्माण, सिनेमाहॉल-निर्माण, मॉल्स-निर्माण। हमने अपने खुद को सीमेंट और इस्पात में चुन दिया है। कुछ ना हो, जमीन स्थिर रहे, सब ठीक रहेगा (कोविड-19 के अलावा)। लेकिन अगर भूमि हिलती है इन भूकंपीय क्षेत्रों में, जैसा कि लाजिम है, तो...?

घनत्व घटाने में कई पहलू हैं। एक, पहले से कमजोर इमारतों को खाली करवा कर उनकी जगह भूकंप-रोधी इमारतों को बनवाना। दो, तंग मोहल्लों को पतला बनाना, यानी उनकी जनता का पुनर्वास करना। तीन, शहरों का पुनर्गठन करना।

पुनर्गठन?

दक्षिण अफ्रीका की राजधानी है प्रेटोरिया। उस देश की पार्लियामेंट बैठती है केपटाउन में। उसका उच्च न्यायालय बैठता है ब्लोएमफोंटेन में। और दक्षिण अफ्रीका का वाणिज्य केंद्र है जोहानिसबर्ग। हम क्यों उस देश से यह विकेंद्रीयकरण न सीखें? हमारे केंद्र और हमारे प्रांतों में क्यों सबकुछ एक शहर में ही टिके? क्यों न इन संस्थानों को फैलाया जाए? और यह बड़े भूकंप के आने के बाद नहीं, उससे पहले क्यों ना किया जाए?

धन, साधन, खर्च की बात उठेगी।

मैं कहता हूं कि देवियो और सज्जनो, खवातीनो-हजरात, भाइयो और बहनो, इस विकेंद्रीयकरण पर जितना भी खर्च होगा भूकंप से पहले, वह भूकंप के बाद के खर्चे से बहुत कम होगा।

जन-असुविधा की बात उठेगी।

मैं कहता हूं कि होगी असुविधा। उठाए जाएंगे ऐतराज। लेकिन भूकंप के बाद आप सब कहेंगे 'हमें पहले से क्यों नहीं तैयार किया? हमें पहले क्यों न चेताया? यह घनत्व क्यों बढ़ने दिया? आज कोविड-19 और भूकंपीयता दोनों से हमें एक संदेश मिल रहा है- हल्के हो जाएं। तंग मत रहिए, फैलिए। लोगों से भरी हुई इमारतें, बड़ी-बड़ी, भारी-भारी, जानलेवा हैं।

कुटीरों का ना सही, 'फूलों की छांव का नहीं सही, हल्के छतों वाले आवासों का सोचिए... और प्रशासनों, सरकारों, नगर पालिकाओं को एक नई सोच, जान-देवा सोच की ओर ले चलिए। जो बड़ा है, वह जरूरी नहीं कि भला भी है।

(लेखक पूर्व राजनयिक व पूर्व राज्यपाल हैं और वर्तमान में अध्यापक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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