देश की अर्थव्यवस्था इस समय कुछ चुनौतियों से जूझ रही है। इन चुनौतियों से निपटना नई सरकार के लिए नितांत अनिवार्य होगा। जनादेश हासिल करने के बाद सरकार के सामने उन वादों को पूरा करने की भी जिम्मेदारी होती है जिनके दम पर वह सत्ता में आती है। ये वादे संसाधनों के बिना पूरे नहीं हो सकते। ऐसे में सरकार के सामने यह दोहरी चुनौती खड़ी हो जाती है कि वह अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार करने के साथ ही जनता की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं पर भी खरी उतरे। वास्तव में यह कोई विरोधाभास नहीं। अगर अर्थव्यवस्था की तस्वीर बेहतर होगी तो सरकार की झोली भी भरी होगी। स्वाभाविक है कि इससे सरकार के पास खर्च करने की गुंजाइश भी बढ़ती है। नई सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती अर्थव्यवस्था को तेजी देने की होगी, जिसकी चाल पिछले कुछ वक्त से सुस्त सी पड़ गई है। हालांकि इसके लिए घरेलू कारकों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय पहलू भी उतने ही जिम्मेदार हैं।

पिछले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत पर अटक गई। यह दर पिछले पंद्रह वर्षों के दौरान औसतन सात फीसदी वृद्धि से कम थी, जो निश्चित ही चिंता का विषय है। इसके बावजूद भारत दुनिया में सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है, लेकिन यह भारत की संभावनाओं के मुकाबले अपेक्षाकृत कमतर है। वैश्विक अनिश्चितताओं से जहां निर्यात में आई गिरावट ने आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार कुछ कुंद की है, वहीं घरेलू स्तर पर उपभोग घटने से भी आर्थिक चाल निस्तेज पड़ी है। वाहनों से लेकर अन्य कई वस्तुओं के उपभोग में आई कमी से इसकी पुष्टि भी होती है। ऐसे हालात में निजी क्षेत्र का निवेश भी अटका हुआ है। ऐसे में सरकार को आगे आकर मोर्चा संभालना होगा। इसके लिए सरकार को अपने खजाने का मुंह खोलना होगा। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि सरकारी खर्च बढ़ाने से वित्तीय अनुशासन की स्थिति न बिगड़ जाए। इसके लिए सरकार को अधिक संसाधन भी जुटाने होंगे। इस दिशा में विनिवेश की राह पकड़ी जा सकती है तो बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की परिसंपत्तियों को भी भुनाया जा सकता है। इसके साथ ही कुछ और कदम भी उठाने होंगे। यदि संसाधन जुटाए बिना ही खर्च बढ़ा दिया गया तो राजकोषीय घाटे का दायरा बढ़ जाएगा। इससे अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर अच्छे संकेत नहीं जाएंगे। इससे देश में होने वाले निवेश से लेकर रुपए की चाल पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

किसी भी नई सरकार के लिए सुधारों का काम कुछ आसान होता है, क्योंकि चुनाव के तुरंत बाद राजनीतिक जोखिम कम होने से उसके पास साहसिक फैसले लेने की गुंजाइश होती है। मोदी सरकार ने कई अहम सुधार किए हैं, लेकिन वे अभी भी संक्रमण काल में हैं। जैसे वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी, जिसमें समय के साथ काफी संशोधन किए गए हैं, लेकिन अभी भी पेट्रोलियम उत्पादों को इसके दायरे में लाना और दरों के मोर्चे पर भी कुछ काम किया जाना शेष है। इसी तरह दिवालिया संहिता भी एक अहम सुधार है, लेकिन इसमें भी अभी तक वित्तीय क्षेत्र को शामिल नहीं किया गया है। अभी भी भूमि सुधारों व श्रम सुधारों को मूर्त रूप दिया जाना बाकी है। चूंकि इनमें राज्य सरकारें भी अहम अंशभागी हैं तो नई केंद्र सरकार को चाहिए होगा कि वह इस कवायद में प्रोत्साहक की भूमिका निभाए। कुल मिलाकर नई सरकार के लिए यह जरूरी होगा कि वह नए सुधारों को लागू करने के साथ पहले किए जा चुके सुधारों की निरंतरता को कायम रखे।

चुनावों में किसानों का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। चूंकि एक वर्ग के रूप में किसान एक बड़ा वोट बैंक है तो सरकार के सामने यह न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी बड़ी चुनौती है। कृषि क्षेत्र लंबे समय से सुधारों की बाट जोह रहा है। इसकी कायापलट देश की एक बड़ी आबादी का जीवन बेहतर बनाने में सक्षम है। इसके लिए सरकार निजी क्षेत्र को कृषि के साथ जोड़े। चूंकि काफी मात्रा में खाद्य उत्पाद बाजार तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाते हैं, इसलिए खाद्य प्रसंस्करण का दायरा बढ़ाकर उसमें उनका इस्तेमाल किया जाए। केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर कृषि सुधारों को अमली जामा पहनाए। उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी सभी स्तरों पर प्रयास किए जाने चाहिए। वैसे तो भारत और चीन के पास कृषि योग्य भूमि बराबर है, फिर भी चीन का उत्पादन भारत से दोगुना अधिक है। ऐसे में अगर उत्पादन बढ़ता है तो उद्योगों के लिए भी अतिरिक्त जमीन आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। इससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होने के साथ ही अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी बढ़ेगी।

रोजगार भी नई सरकार के लिए निश्चित रूप से एक चुनौती होगी। चुनावों में इस पर भी खूब सियासी गोलबंदी होती रही। मंदी की वजह से फिलहाल रोजगार के मोर्चे पर तस्वीर अच्छी नहीं है। ऐसे में नई सरकार को तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों तरह के उपाय आजमाने होंगे। तात्कालिक उपायों में मनरेगा जैसी योजनाएं अहम होंगी तो दीर्घावधिक योजनाओं के लिए कौशल विकास को बढ़ावा देना आवश्यक होगा। इसके लिए विनिर्माण में कपड़ा, वाहन, चमड़ा और सेवा में स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन जैसे श्रम आधारित उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इस हकीकत से भी इनकार नहीं कर सकते कि बदलते वक्त के साथ ऑटोमेशन को अपनाया जा रहा है। इससे परंपरागत नौकरियां खतरे में पड़ेंगी, लेकिन इससे नई तकनीकी नौकरियों की राह भी खुलेगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका-चीन के बीच गहराते ट्रेड वॉर सहित तमाम घटनाक्रम अनिश्चितता बढ़ाने वाले हैं। इसका असर निर्यात और विदेशी निवेश, दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे में नई सरकार के सामने घरेलू स्थायित्व बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि इसमें दरार राजकोषीय घाटे पर दबाव से लेकर रुपए की सेहत बिगाड़ सकती है। हालांकि यह वैश्विक संकट भारत के लिए कुछ अवसर भी बना सकता है, क्योंकि अमेरिका-चीन दोनों को नए व्यापार साझेदार तलाशने होंगे। ऐसी स्थिति में ट्रेड डायवर्जन होता है। नई सरकार को इस अवसर को भुनाने की कोशिश करनी होगी। इसका निर्यात और निवेश दोनों पर अनुकूल असर होगा।

महंगाई को लेकर नई सरकार को कोई खास चिंता करने की जरूरत नहीं, लेकिन यदि मानसून खराब रहा और कच्चे तेल के दाम चढ़ते गए, तब जरूर इस बारे में कुछ सोचना पड़ सकता है। फिलहाल तो नई सरकार के आर्थिक एजेंडे में यही प्राथमिकता होनी चाहिए कि वह वित्तीय अनुशासन कायम रखते हुए खर्च बढ़ाए ताकि मांग में सुधार हो सके और सुधारों की प्रक्रिया को निरंतर बनाए रखे। कृषि और रोजगार पर विशेष ध्यान दे और घरेलू स्थिरता की ऐसी क्षमता विकसित करे, जिस पर वैश्विक अस्थिरता कम से कम असर करे।

(लेखक क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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