प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में मामल्लपुरम के समुद्र तट पर साफ-सफाई करके एक बड़ा संदेश दिया। इसे प्रेरक पहल से जुड़े व्यावहारिक अर्थशास्त्र की एक और अनूठी मिसाल कहा जा सकता है, जो भारत में व्यावहारिक बदलाव लाने से जुड़ी है। वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में इस पर व्यापक दृष्टि डाली गई है कि प्रेरक पहल के माध्यम से कैसे व्यवहारगत बदलावों को मूर्त रूप दिया जा सकता है। चूंकि तमाम नीतियां राज्यों के स्तर पर लागू होती हैं, इसलिए राज्यों के नीति-निर्माताओं को चाहिए कि वे आम लोगों को प्रेरित करने वाले तौर-तरीकों की अहमियत समझें। यदि कोई प्रेरक पहल की संभावनाओं को समझना चाहते हैं तो उस वक्त को याद कीजिए जब आपने जागने के लिए सुबह छह बजे का अलार्म लगाया हो और उसके बजने पर चिड़चिड़ाकर उसे बंद करके फिर से सोने लगे हों? प्रेरक पहल के माध्यम से व्यावहारिक बदलाव के लिहाज से यह क्यों महत्वपूर्ण है? यह इसलिए अहम है, क्योंकि परंपरागत अर्थशास्त्र के सिद्धांत हमें इंसानी ताकत और कमजोरियों से मुक्त रोबोट जैसा मानते हैं, लेकिन अर्थशास्त्र की एक शाखा- व्यावहारिक अर्थशास्त्र ऐसी भी है जो हमें हमारे अनूठेपन के साथ मानव के रूप में ही देखती है। मानव व्यवहार, व्यावहारिक अर्थशास्त्र हमें इस बात की परख कराते हैं कि वांछित व्यवहार की दिशा में लोगों को नेक पहल के माध्यम से कैसे प्रेरित किया जाए।

भारत में जहां सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानक लोगों के व्यवहार को प्रभावित करने में अहम भूमिका अदा करते हैं, वहां हमारे व्यवहार में लाभदायक परिवर्तन लाने के लिहाज से व्यावहारिक अर्थशास्त्र एक महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो सकता है। मिसाल के तौर पर लाभदायक सामाजिक मानकों को सकारात्मक पहल द्वारा और विस्तार दिया जा सकता है। इनमें हमारे दोस्त और पड़ोसी या वे लोग आदर्श होते हैं, जिन्हें हम खुद से जोड़कर देख सकते हैं। दूसरा, विकल्प चुनते समय हम सभी व्यापक निष्क्रियता के वशीभूत होकर अक्सर यथास्थितिवाद वाले विकल्प को पकड़े रहते हैं। इस निष्क्रियता से बाहर निकलने और बदलाव लाने में बमुश्किल ही कोई खर्च आता है। ऐसे में अपने विकल्पों को प्रभावित किए बिना ही वांछित व्यवहार को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। तीसरा, अक्सर हमारे लिए अच्छी आदतों को निरंतर बनाए रखना मुश्किल होता है। ऐसे में प्रेरक वचन और पहले किए गए अच्छे कामों को याद करने से व्यवहार में बदलाव को निरंतरता देने में मदद मिलती है।

बीते पांच वर्षों के दौरान सरकार पहले ही सफल व्यावहारिक बदलावों को मूर्त रूप दे चुकी है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी पहल से बालिका जन्म दर में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह बेटी को परिवार पर बोझ के बजाय पिता का गौरव बताने के मकसद से शुरू किए गए 'सेल्फी विद डॉटर जैसे अभियान ने भी मानवीय भावनाओं की शक्ति को रेखांकित करते हुए व्यावहारिक बदलावों को दिशा दी है। अपने सत्याग्र्रह से अंग्र्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले गांधी जी की जयंती पर शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान के तहत स्वच्छाग्र्रहियों की अवधारणा भी व्यावहारिक बदलाव लाने में प्रेरक पहल के सिद्धांत की उम्दा मिसाल है। ऐसी तमाम पहल हुई हैं और उनसे मिली सीख के साथ लैंगिक समानता, स्वस्थ भारत और कर अनुपालन के जरिए सामाजिक बदलाव के महत्वाकांक्षी एजेंडे को सिरे चढ़ाया जा सकता है। जहां बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान से बहुत मदद मिली है, वहीं लैंगिक असमानता के लिए क्रांतिकारी अभियान की दरकार है। हमारे धर्मग्रंथों में महिलाओं को देवी माना गया है और उनमें स्पष्ट उल्लेख है कि जिन समाजों में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि का वास होता है। इस संदेश की महत्ता को देखते हुए अभियान का जोर सांस्कृतिक एवं सामजिक मानकों पर होना चाहिए, क्योंकि वे भारत में व्यवहार को बहुत निर्णायक तरीके से प्रभावित करते हैं। इस अभियान को बेटी आपकी धन लक्ष्मी-विजय लक्ष्मी का नाम दिया जा सकता है। इसमें धन लक्ष्मी से संपन्‍नता की देवी लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी से जीत की देवी का आभास होता है। खासतौर से महिला के लक्ष्मी रूप से जुड़े संदेश पर विशेष जोर देने की जरूरत है।

अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सरकारों ने व्यावहारिक पहलुओं पर गौर करने के लिए विशेष इकाइयां बना रखी हैं। उनसे संकेत लेकर प्रभावी नीतियां बनाई जाती हैं। तमाम अभिभावक स्कूल में अपने बच्चे की एक साल और पढ़ाई पर प्रतिफल को कम महत्व देते हैं। वे बच्चे के हाईस्कूल में पहुंचने तक स्कूली पढ़ाई को निरर्थक मानते हैं। तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो अपने बच्चों को कुछ साल के लिए घर बैठा लेते हैं, जबकि वे पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम होते हैं। मेडागास्कर में कम शिक्षित अभिभावकों को यहां तक बताया जाता है कि बच्चे की एक और साल तक स्कूली पढ़ाई का उनकी औसत आमदनी के साथ क्या समीकरण बन सकता है? इसी कड़ी में अमेरिका में एक साधारण से बदलाव ने लोगों की बचत में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी करा दी। दरअसल लोग खर्च पर पर्याप्त नियंत्रण न होने के कारण उतनी बचत नहीं कर पाते, जितनी वे करना चाहते हैं। लोगों को ऐसे विशेष खातों की पेशकश की गई जिसमें बचत के एक निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने से पहले धन निकासी का विकल्प नहीं था। तकरीबन 30 प्रतिशत ने इस विकल्प को अपना लिया। एक साल में ही बचत अधिशेष 74 प्रतिशत चढ़ गया। लोग अपनी निष्क्रियता और सकारात्मक प्रेरणा के अभाव में ही अपेक्षित बचत नहीं कर पाते। लोगों को बचत से जुड़े उनके लक्ष्यों को याद दिलाने के लिए नियमित रूप से प्रेरक संदेश भेजे गए। केवल इन्हीं संदेशों के दम पर बचत राशि में छह प्रतिशत बढ़ोतरी हो गई।

निष्क्रियता-अकर्मण्यता लोगों को अनिर्णय का शिकार बनाती है, जिसमें वे यह जानते हुए भी फैसलों को टालते रहते हैं कि इसके कितने खराब परिणाम हो सकते हैं? उर्वरकों की खरीद में किसानों की टालमटोल से निपटने के लिए अफ्रीका में उर्वरक की होम डिलीवरी का प्रयास हुआ। इससे उर्वरक प्रयोग 70 प्रतिशत बढ़ गया। यह प्रभाव कुछ ऐसा था मानो पचास प्रतिशत मूल्य सबसिडी को अंजाम दिया गया हो। ये सभी उदाहरण प्रेरक पहल के अहम फायदों को दर्शाते हैं कि वे कैसे व्यावहारिक बदलाव लाने में सहायक हो सकते हैं। हमारे राज्यों को भी केंद्र सरकार द्वारा की गई पहल या अन्य देशों में आजमाए जा रहे कुछ अच्छे विचारों को अपनाकर नीतियों को व्यावहारिक अर्थशास्त्र से जोड़ना चाहिए।

(लेखक वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)

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