यह सुखद आश्चर्य ही माना जाना चाहिए कि अपने कार्यालय में प्रवेश के पहले ही दिन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को भारत की नई शिक्षा नीति का प्रारूप प्रस्तुत किया गया। इस प्रारूप के पीछे लगभग चार वर्षों का राष्ट्रीय स्तर का विचार-विमर्श शामिल है। देशभर में इस प्रारूप पर बहस जारी है। नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को लेकर समिति के अध्यक्ष प्रो. कस्तूरीरंगन ने प्रस्तावना में लिखा है- शिक्षा प्रणाली में बदलाव की इस नीति की यह परिकल्पना अनुभवी और उत्साही स्कूल व कॉलेज शिक्षकों के बिना संभव नहीं हो पाएगी। इसे पढ़ते समय कोठारी कमीशन का वह वाक्य याद आना स्वाभाविक है कि भारत के भविष्य का निर्माण उसके स्कूलों में हो रहा है। इसी प्रकार 1986-92 की शिक्षा नीति में भी यह दोहराया गया था कि किसी भी देश के लोगों का स्तर उनके अध्यापकों से ही ऊंचा हो सकता है। जिस देश की संस्कृति में गुरु और गोविंद में गुरु को प्राथमिकता देने का चलन हो, वहां अध्यापकों की स्थिति को लेकर चिंताजनक स्थिति पैदा हो जाए, यह ठीक नहीं। प्रारूप में यह स्पष्ट स्वीकार किया गया है कि शिक्षकों के माध्यम से ही बच्चों में ज्ञान, संवेदना, मानवीय मूल्य, वैचारिकता, सृजनात्मकता जिज्ञासा जैसे गुणों का विकास होता है। भारत की प्राचीन ज्ञानार्जन परंपरा में सिर्फ सबसे अच्छे विद्वान ही शिक्षक बनते थे।

भारतीय समाज में सदैव शिक्षकों का जीवन अनुकरणीय माना गया। समाज उनकी जरूरतों की पूर्ति करता था। वे अपने निर्णय स्वयं लेते थे और जानते थे कि उनका उत्तरदायित्व समाज में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल ज्ञान और कौशल को बच्चों तक पहुंचाने का ही उत्तरदायित्व नहीं निभाना होता था, वरन नए ज्ञान का सृजन भी करना होता। इस कारण जीवन-पर्यंत अध्ययन उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति थी। आज जब वैश्विक स्तर पर यूनेस्को जीवन-पर्यंत सीखने को शिक्षा का एक आधार स्तंभ घोषित कर रहा है, तब हम में से कितनों को याद आता है कि भारत की ज्ञान परंपरा में यावद्जीवेत अधीयते विप्र: बहुत पहले ही समझ लिया गया था और हर समझदार व्यक्ति उसका अनुपालन करता था। शिक्षा नीति प्रारूप में वर्तमान स्थिति को समझाने का प्रयास किया गया है और संभावित समाधान भी सुझाए गए हैं। अपेक्षा की गई है कि शिक्षक भावप्रवण हो, सुशिक्षित और उचित प्रशिक्षण प्राप्त कर्मठ व्यक्ति हो जिसकी प्रतिबद्धता अपने व्यवसाय, बच्चों, समाज एवं देश के प्रति समर्पित हो। यह तभी संभव होगा जब अध्यापकों को आदर-सम्मान और सहयोग हर तरफ से मिले। उन्हें अपने ज्ञान और कौशल के संवर्द्धन के उपयुक्त अवसर उपलब्ध हों। शिक्षक के लिए बच्चों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संदर्भ से परिचित होना अनिवार्य होना चाहिए। यह समाज, व्यवस्था और सरकार का कर्तव्य है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा करें जिनमें अध्यापक अपने शिक्षक होने पर गर्व कर सके। आज ऐसा नहीं है। सरकारी दफ्तरों में छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए अध्यापकों को न केवल भटकना पड़ता है वरन उन्हें कई प्रकार के अपमान भी सहन करने पड़ते हैं। देश में एक भी शिक्षक को सेवानिवृत्ति के बाद अपनी पेंशन के लिए भटकना पड़े तो तहलका मच जाना चाहिए। यदि नियमों का पालन और नई तकनीक का उपयोग एक साथ हो तो ऐसी अनेक अपमानजनक स्थितियां समाप्त की जा सकती हैं।

प्रारूप समिति ने थोड़े से मानदेय पर अध्यापकों की नियुक्ति को समाप्त करने की संस्तुति की है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में नियमित अध्यापकों की संख्या योजनाबद्ध ढंग से घटाई गई है। उसके दुष्परिणामों से कोई चिंतिंत नहीं था, क्योंकि निर्णय लेने वाले सभी लोगों के बच्चे निजी स्कूलों में जाते हैं। मुझे तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह निर्णय सराहनीय लगता है कि सकारी खजाने से वेतन पाने वाले हर व्यक्ति के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें। यदि ऐसा हो जाए तो शिक्षा में पिछड़े माने जाने वाले प्रांतों की स्कूली शिक्षा में अभूतपूर्व सुधार संभव हो सकेगा। मेरा विश्वास है कि बहुत अधिक वर्षों तक सरकारी स्कूलों की दुर्दशा लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे। जब समाज जागृत होगा, पड़ोस का स्कूल हर बच्चे के लिए खुला होगा और कोई भेदभाव स्वीकार्य नहीं होगा। तब अध्यापक भी अपने शैक्षणिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति और अधिक सचेत-सक्रिय होंगे।

अध्यापक व बच्चे के सीखने की गुणवत्ता के बीच की दूरी बढ़ाने वाले अनेक तत्व अब सर्वविदित हैं। अध्यापकों को गैरशैक्षिक कार्यों में लगाना लगातार जारी है। अदालत के आदेशों का खुलेआम उल्लंघन होता है। इस सबकी ओर ध्यान दिलाते हुए इस प्रारूप में कुछ अत्यंत व्यवहारिक और जरूरी सुझाव भी दिए गए हैं। प्रतिभावान युवाओं को आकर्षित करने के लिए बड़ी संख्या में छात्रवृत्तियां देने से उन्हें शिक्षक बनाने के लिए प्रेरित करनें में सफलता मिल सकती है। अध्यापकों के प्रारंभिक प्रशिक्षण के लिए चार वर्षीय पाठ्यक्रमों को स्वीकार गया है। प्रतिभावान प्रशिक्षित अध्यापकों को तीन साल के शिक्षण के अनुभव के बाद शिक्षक प्रशिक्षक बनाने के लिए एकवर्षीय पाठ्यक्रम में भेजा जाना चाहिए। शिक्षक प्रशिक्षक विशेष रूप से तैयार किए जाएं तो इन संस्थाओं में जीवंतता के पनपने की संभावना ढूंढी जा सकती है। प्रारूप समिति के सुझावों में नियुक्ति प्रथा में सुधार और स्थानांतरण के बोझ से मुक्ति के सुझाव दिए गए हैं। इनमें से अनेक ऐसे हैं जो पहले भी नीतियों और शैक्षिक सुधारों के प्रतिवेदन में शामिल रहे हैं, मगर क्रियान्वित नहीं किए गए। स्कूलों की व्यवस्था और संचालन में अध्यापकों की अधिक सक्रिय भागीदारी सकारात्मकता को बढ़ाएगी। बच्चों को स्कूल में अपनापन मिलेगा। अध्यापकों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। संस्तुति यह भी है कि योग्यता आधारित पदोन्‍नति के लिए जरूरी तैयारी की जाए। अध्यापकों की योग्यता और कौशल विकास के लिए समिति मानती है कि शिक्षक तैयार करने का कार्य बड़े और बहुविषयी विश्वविद्यालय ही करें। देश भर में मौजूद हजारों रद्दी एकल शिक्षक शिक्षा संस्थानों को जल्द बंद कर दिया जाए। समस्या यह है कि उन सैकड़ों महाविद्यालयों का क्या होगा जिनमें से अधिकांश को न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति ने डिग्री बेचने की दुकानें कहा था। शिक्षा के क्षेत्र में शायद ही कोई हो जो इस तथ्य को न जानता हो।

यह संस्तुति कि देशभर में 2022 तक पैरा टीचर्स, शिक्षा कर्मी, शिक्षा मित्र इत्यादि को बंद कर दिया जाएगा, अत्यंत साहसपूर्ण लगती है। देश में अध्यापकों की प्रतिष्ठा और शिक्षा की गुणवत्ता में अभूतपूर्व इजाफा होगा, यदि अगले तीन वर्षों में रद्दी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय बंद हो जाएं और पैरा टीचर्स की प्रथा समाप्त की जाए। अनेक राज्य सरकारें इसमें सहयोग नहीं करेंगी। केंद्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन्हें तैयार करने की होगी। अपेक्षा करनी चाहिए कि सभी राज्य सरकारें दलगत राजनीति से परे हटकर इन सुझावों पर विचार करेंगी और इन्हें लागू करेंगी।

(लेखक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के निदेशक रहे हैं)