मोदी सरकार-2.0 के पहले बजट में जोर ज्यादा से ज्यादा निवेश जुटाने, इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास व विस्तार और अंतत: रोजगार सृजन पर रहा। इसके साथ-साथ बजट में यह भी सुनिश्चित किया गया कि जिन मतदाताओं ने मोदी सरकार को पुन: प्रचंड जनादेश दिया, उन पर उच्च करों का बोझ न लादा जाए। बल्कि सरकार ने ईज ऑफ लिविंग के साथ-साथ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की थीम को ही जारी रखने की कोशिश की, ताकि आम आदमी को अपने रोजमर्रा के जीवन में कुछ राहत मिल सके। आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए पैन कार्ड न होने की सूरत में आधार नंबर के इस्तेमाल की सहूलियत देना, छोटे प्रतिष्ठानों में डिजिटल भुगतान पर उपभोक्ता शुल्क में कटौती करना, आयकर रिटर्न की प्रक्रिया सरल बनानबा और सस्ते आवासों के लिए कर छूट का दायरा बढ़ाने समेत कई ऐसे उपाय आम नागरिक का जीवन आसान बनाने के मकसद से किए गए। यहां तक कि बजट में ग्रामीण इलाकों के लिए यह लक्ष्य तय किया गया कि सभी घरों में 2022 तक बिजली व स्वच्छ ईंधन (रसोई गैस) पहुंचाया जाए।

देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने उन तमाम विश्लेषकों को झुठलाने का काम किया, जो यह कह रहे थे कि बजट में कृषि सेक्टर पर फोकस होगा। सीतारमन इस तथ्य से भलीभांति अवगत थीं कि कृषि के बारे में अहम निर्णय उनके पूर्ववर्ती पीयूष गोयल द्वारा इसी साल फरवरी में पेश अंतरिम बजट में लिए जा चुके हैं। इसमें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत छोटे व सीमांत किसानों (जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है) को सालाना 6000 रुपए की आर्थिक मदद देना भी शामिल है, जिसके लिए अंतरिम बजट में 75000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इस बजट में फिशरीज सेक्टर को बढ़ाने की जरूरत दर्शाने और ग्रामीण इलाकों के लिए कौशल विकास और उद्यमिता पर जोर देने के अलावा ऐसा कुछ नहीं है, जिस खासकर फार्मिंग सेक्टर पर केंद्रित कहा जाए। यहां पर यह याद रहे कि मोदी सरकार द्वारा कुछ दिन पूर्व ही खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की घोषणा की गई थी।

इसके उलट सीतारमन ने इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाने और विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के मकसद से कई बड़ी घोषणाएं कीं। इस कड़ी में पहला प्रमुख प्रस्ताव 400 करोड़ रुपए तक टर्नओवर वाली कंपनियों को न्यूनतम 25 फीसदी कॉर्पोरेट टैक्स के दायरे में लाने का रहा। फिलहाल, 250 करोड़ रुपए तक वार्षिक कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए यह दर लागू है। इससे बड़ी कंपनियों को नहीं, लेकिन तमाम छोटी-मोटी कंपनियों को जरूर राहत मिलेगी और निवेश के माहौल में उछाल आएगा।

बजट में दूसरा बड़ा प्रस्ताव सड़कों, जलमार्गों, राजमार्गों और रेलवे के डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर में भारीभरकम निवेश का रहा। सरकार का प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तीसरे चरण में 80000 करोड़ रुपए की लागत से 1.25 किमी सड़क बनाने का लक्ष्य है, वहीं सड़कमार्ग व रेलमार्ग पर बोझ घटाने हेतु माल परिवहन के लिए नदियों के इस्तेमाल की योजना भी आगे बढ़ रही है। रेलवे में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर काम आगे बढ़ाया जाएगा और रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण के लिए भी एक बड़ी योजना प्रस्तावित की गई है। इस योजना को पीपीपी मॉडल के जरिए साधने का मकसद है। यानी रेलवे में निजी सेक्टर के निवेश का नया चक्र शुरू होगा।

सरकार ने इस बजट के जरिए विदेशी निवेश आकर्षित करने पर भी जोर दिया। बजट में मीडिया, विमानन, बीमा और एकल ब्रांड खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियमों को उदार करने का प्रस्ताव दिया टगया। इससे निश्चित ही इन क्षेत्रों में विदेशी निवेश में इजाफा होगा, जिससे अंतत: हमारी अर्थव्यवस्था को भी संबल मिलेगा।

बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस के साथ रोजगार बढ़ाने पर भी जोर है, यह बजट में प्रस्तावित अफोर्डेबल हाउसिंग संबंधी प्रावधानों से भी पता चलता है। यूं तो सबके लिए घर की योजना पिछले पांच साल से चल रही है, लेकिन अब इसे और गति देने की योजना है। घर लेने या बनाने के लिए जिस तरह की प्रोत्साहनों/रियायतों की घोषणा की गई है, उसका एक मकसद सुस्त पड़े रीयल एस्टेट सेक्टर को दिक्कतों उबारना भी है। और जैसा कि कहा जाता है कि कंस्ट्रक्शन गतिविधियों से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होते हैं। ऐसे उपाय विकास को गति देने में कारगर साबित हो सकते हैं।

बजट प्रस्तावों में स्टार्ट-अप्स पर भी खास ध्यान दिया गया। इसके लिए न सिर्फ एंजेल टैक्स की खराब व्यवस्था को खत्म कर दिया गया, बल्कि आयकर विभाग को भी अप्रत्यक्ष रूप से हिदायत दी गई कि स्टार्ट-अप्स के साथ नरमी से पेश आए। दुनियाभर में देखा गया है कि स्टार्ट-अप्स तभी सफल होते हैं, जब सरकारी नियामक संस्थाएं उनसे सुरक्षित दूरी बनाकर चलें।

सीतारमन ने बजट में बैंकिंग जैसे अहम सेक्टर का भी पूरा ख्याल रखा और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सहारा देने के लिए उनमें 70000 करोड़ रुपए की पूंजी डालने की घोषणा की। इसके पीछे सरकार का प्रयास यही है कि बैंकों की कर्ज देने की क्षमता प्रभ्ाावित न हो। इस क्रम में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की भी उपेक्षा नहीं की गई।

कुल मिलाकर यही लगता है कि नई मोदी सरकार ने अपने पहले बजट के जरिए समग्र तौर पर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि आर्थिक सुस्ती का आलम जल्द दूर हो जाए। विकास की रफ्तार सुस्त होने से रोजगार सृजन और गरीबी घटाने के प्रयासों को भी धक्का लगता है। अब ये उपाय देश की अर्थव्यवस्था को उबारने में कितने कारगर साबित होते हैं, यह आने वाले महीनों में ही पता लगेगा।

(लेखिका आर्थिक मामलों की विश्लेषक हैं)