बिहार में नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड सातवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ ले ली और इसके साथ ही अपने मंत्रियों में विभागों का बंटवारा भी कर दिया। उम्मीद की जा रही है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की यह सरकार सुशासन के अपने एजेंडे पर कायम रहते हुए प्रदेश को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। देखा जाए तो बिहारवासियों ने खोखली राजनीति करने वाली विपक्षी महागठबंधन के मुकाबले पिछले 15 साल से सुशासन देने वाली, पानी, बिजली, सड़क जैसे बुनियादी मुद्दों से आगे बढ़कर इन्फ्रास्ट्रक्चर, निवेश, कनेक्टिविटी, विश्वस्तरीय विभिन्न संस्थानों को बिहार में लाने, रोजगार के नए अवसर पैदा करने आदि के लिए काम करने वाले नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की डबल इंजन सरकार में अपना विश्वास जताया है। उन्होंने यह भी प्रकट किया कि उन्हें वह सब कुछ स्मरण था, जो लालू के 15 सालों के शासनकाल में हुआ। अति-पिछड़े और पिछड़े वर्ग से आने वाले जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी का राजग के नेतृत्व में विश्वास जताना भी उल्लेखनीय रहा।

बिहार में राजग की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने जिला और उप-मंडल स्तर तक एक संगठनात्मक संरचना वाली भाजपा के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं में उत्साह और आशावाद का नवसंचार किया। चुनाव नतीजा इंगित करता है कि भाजपा 'हिंदी भाषी भूभागÓ में अपने अंतिम गढ़ को फतह करने की ओर सफलतापूर्वक अग्रसर है। इसके बावजूद भाजपा गठबंधन धर्म का सम्मान करने को सदैव प्रतिबद्ध रही है। वह भाजपा ही थी, जिसने भारतीय राजनीति के शब्दकोश में 'गठबंधन धर्मÓ शब्द को गढ़ा। 2005 में भी जदयू की तुलना में भाजपा के पास अधिक विधायक थे, लेकिन पार्टी ने अपनी प्रतिबद्धता के आधार पर नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया, क्योंकि गठबंधन मूल्यों के लिए प्रतिबद्धता भाजपा की ताकत है।

नतीजों से पूर्व आए कुछ एक्जिट पोल्स ने अपरिपक्व ढंग से तेजस्वी यादव को पहले ही अगला मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार खासकर पटना में आम नागरिकों के बीच असहजता, बेचैनी और डर का माहौल पसर गया। यह स्वाभाविक था, क्योंकि लोग अतीत की कड़वी यादों को भूले नहीं थे। एक पार्टी के स्तर पर राष्ट्रीय जनता दल की चारित्रिक मनोवृत्ति इसी तथ्य से समझी जा सकती है कि उसे ट्वीट कर चुनाव नतीजों बाद पार्टी कार्यकर्ताओं को 'अनुचित आतिशबाजी, हवा में गोलीबारी, विरोधियों और विरोधी दलों के समर्थकों के खिलाफ अनुचित व्यवहारÓ के खिलाफ सचेत करने, अपील करने और चेतावनी देने की आवश्यकता पड़ी। यह विचारणीय है। राजद वही पार्टी है, जिसके नीतिकारों ने चुनाव से पहले अपना मूल स्वभाव दर्शाते हुए महादलितों के नेता जीतन राम मांझी को बेइज्जत कर पार्टी से निकाल दिया। बिहार नहीं भूला था वह दृश्य जब राजद नेताओं की अहंकारी मनोवृत्ति से क्षुब्ध पिछड़े वर्ग से आने वाले नेता और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी राजद की प्रेस कांफ्रेंस के बीच महागठबंधन छोडऩे का एलान करने को बाध्य हुए।

लगता है कि तेजस्वी के लिए अपनी विरासत, अपने पिता के कार्यकाल के काले दिनों से दूर जाना अभी भी कठिन है। हालांकि चुनावों के दौरान तेजस्वी अतीत को छोडऩे और तत्कालीन जंगलराज की यादों को मिटाने का प्रयास करते हुए दिखे। लालू यादव और राबड़ी देवी, दोनों की तस्वीरों को चुनाव प्रचार में उपयोग न करना सही दिशा में उठाया गया एक कदम था, लेकिन यह अपने अतीत से दूर होने और एक नए भविष्य की ओर अग्रसर होने का ठोस और विश्वसनीय कदम नहीं माना जा सकता था।

बिहार में चुनाव के दौरान मुद्दों को नौकरियों के इर्द-गिर्द लाने का श्रेय अनुपयुक्त रूप से और नाहक ही तेजस्वी यादव को दिया जाता रहा, जबकि हकीकत में तेजस्वी खुद 'विरासत की राजनीतिÓ कीउत्पत्ति हैं और वह स्वयं किसी भी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने में सक्षम नहींं। राजद जैसी पार्टी, जो वर्षों से जाति और समुदाय के नाम पर लोगों के विभाजन, ध्रुवीकरण और जोड़-तोड़ की बदौलत कायम रही हो, उसकी ओर से दस लाख नौकरी संबंधी बयानबाजी की ओर बाध्य होना हिंदी पट्टïी की राजनीति में होने वाले एक बुनियादी परिवर्तन का संकेत है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है।

नकारत्मकता से ग्रसित कुछ विरोधी भले ही बिहार के आठ करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन मुहैया कराने की मोदी सरकार की योजना में कमी निकालने की कोशिश करें, लेकिन ऐसा करके प्रधानमंत्री ने यह सुनिश्चित किया है कि देश का एक भी व्यक्ति भूखा न सोए। बिहार में प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खोले गए 4.7 करोड़ खातों में मोदी सरकार ने 13,000 करोड़ रुपये से अधिक का हस्तांतरण किया है, जिनमें से 2.5 करोड़ से अधिक खाते महिलाओं के हैं। विपक्षी दलों के लिए भी इन कल्याणकारी योजनाओं के सकारात्मक प्रभावों को नकार पाना संभव नहीं है। इनसे आबादी के एक बड़े हिस्से को फायदा हुआ है। एम्स, नालंदा विश्वविद्यालय और निफ्ट जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के केंद्र बिहार में खुलने और दरभंगा में हवाई अड्डे जैसे बुनियादी विकास ढांचे के उद्घाटन से बिहार के लोगों का जीवन निश्चत ही आसान होगा।

प्रधानमंत्री मोदी का हमेशा से मानना रहा है कि बिहार के विकास के बिना भारत का विकास अधूरा है। राज्य के विकास के अगले चरण में 'आत्मनिर्भर बिहारÓ बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। आने वाले दिनों में ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क का जाल, आइटी पार्कों का निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अवसरों का लाभ उठाकर बिहार नए सिरे से शुरुआत करेगा। इसके साथ ही मखाना, लीची और मक्का की खेती और मत्स्य पालन पर ध्यान केंद्रित करने और अन्य आॢथक अवसरों को राज्य और लोगों के हित में महसूस करने की आवश्यकता है। इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बिहार अब अपनी खोई हुई विरासत को पाने की ओर अग्रसर होगा।

(लेखक पटना विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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