आशीष व्यास

कोरोना ने दुनिया को दो संक्रमण दिए हैं। पहला - शारीरिक और दूसरा शाब्दिक। शारीरिक और मानसिक संकट से सीखते-संभलते हुए, हम जीते-जीतते जा रहे हैं, लेकिन शाब्दिक संक्रमण अभी भी जनजीवन के सामान्य शब्दकोष में शामिल होना शेष है। ऐसा ही एक शब्द है - 'पेशेंट-31'। यह दक्षिण कोरिया की देन है। फरवरी तक दक्षिण कोरिया में कोरोना के केवल 30 मरीज मिले थे। बाकी स्वस्थ होकर घर चले गए। उसके बाद अचानक संख्या बढ़ने लगी। और, एक समय ऐसा भी आया जब यह आंकड़ा 4700 तक पहुंच गया। दुखद यह भी है कि इनमें से 27 लोगों की मौत हो गई। विपदा का यह नया विषय, नए पाठ पढ़ने के लिए डॉक्टरों ने कारण तलाशना शुरू किए। पता चला, बेड नंबर-31 की 61 वर्षीय मरीज कोरोना से चर्चा में आने से लेकर, सार्वजनिक समारोह में जाने तक, 1000 से ज्यादा लोगों के संपर्क में आई थी। संक्रमण की इस कहानी ने एक सप्ताह के भीतर पीड़ितों-प्रभावितों की संख्या को चार गुना कर दिया! सरकारी अमला पेशेंट-31 की कांटेक्ट-हिस्ट्री को डिकोड करते हुए, ताबड़तोड़ सभी मरीजों तक पहुंचा और उसके बाद स्थिति नियंत्रित कर ली गई। पेशेंट-31 द्वारा गैर-इरादतन हत्या की यह कोशिश, कोरोना के किस्सों में स्थायी रूप से दर्ज हो गई है। कहानी से शिक्षा यह कि - एक गलती, एक बार। उसके बाद, कारण-निवारण और फिर जड़ से खत्म करने की जिद ही अब हमें बचा पाएगी।

पड़ताल करने की इस प्रकृति-प्रवृत्ति से दक्षिण कोरिया ने खुद को संभाल लिया। लेकिन, मध्य प्रदेश ने अपने हिस्से के 'पेशेंट-31' को ढूंढकर, संक्रमण रोकने के बजाय बड़ी-बड़ी गलतियां कर दीं! जबकि मप्र वह राज्य है, जहां कोरोना संक्रमण, देश में आए पहले मरीज की सूचना के लगभग महीनेभर बाद सामने आया। इसलिए, संभलने का बहुत समय था, लेकिन स्थिति की गंभीरता समझी ही नहीं गई। हाल ही में दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने सचेत किया है कि कोरोना पीक (चरम) आना अभी बाकी है। इसलिए, इतनी गलतियों के बाद भी, संभलने का मौका, अभी भी बना हुआ है। आइए, अंतहीन लगती पीड़ा-परेशानी के बीते घटनाक्रम को पलटकर देखते हैं कि हमने कहां और कैसी गलतियां कीं।

राजनीतिक भूल: अब भी एक फोरम पर नहीं हैं दो दल

मध्य प्रदेश अपने माथे से यह दाग कभी नहीं मिटा पाएगा कि जिस समय देश के दूसरे राज्य कोरोना संक्रमण से लड़ने की तैयारी में जुट गए थे, उस वक्त प्रदेश के दोनों दल सत्ता की खींचतान में लगे थे। कांग्रेस की कुर्सी जाने और भाजपा की कुर्सी पाने के बीच, बीते तीन सप्ताह में कोरोना दबे पांव मप्र में घुस चुका था। इस जानलेवा दुश्मन के आने की आहट, न कांग्रेस सुन पाई और न ही भाजपा। यही वजह है कि कांग्रेस सत्ता में रहते हुए भी इसे रोक नहीं पाई और भाजपा सत्ता में आने के बाद भी कोई चमत्कारिक परिणाम नहीं दे पाई। अब इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है कि उपचुनाव में दोनों ही दलों को इस राजनीतिक मुद्दे का सामना करना पड़े।

प्रशासनिक चूक : समझ ही नहीं पाए अफसर

मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत आदिवासी आबादी है। ग्रामीण अंचल में शिक्षा का स्तर कम है, लेकिन नासमझी राजधानी से शुरू हुई। प्रदेश की स्वास्थ्य सचिव पल्लवी जैन गोविल का बेटा विदेश से लौटा था। जांच करवाए बगैर, वे विभाग के अधीनस्थों की बैठक लेती रहीं। आयुष्मान भारत के सीईओ और हेल्थ कॉर्पोरेशन के एमडी सहित 13 अधिकारी पॉजिटिव हो गए। जिस समय प्रदेश को इन सभी की सबसे ज्यादा जरूरत थी, ये क्वारंटाइन हो गए। प्रदेश की सेहत सुधारने का जिम्मा जिनके हाथ में है, उनके पास खुद के लिए भी प्लान-बी और सी का तैयार नहीं होना, दुर्भाग्यपूर्ण है। झाबुआ से लेकर राजधानी तक हुई ऐसी लापरवाहियों की कीमत अब प्रदेश का निर्दोष नागरिक चुका रहा है।

जानलेवा देरी : निजी अस्पतालों के लिए कोई नीति नहीं

कोरोना के संक्रमण ने सरकारी ढर्रे की भी पोल खोल दी है। निजी अस्पतालों पर अंकुश लगाने के लिए 10 साल पहले आए कानून को मध्य प्रदेश में लागू ही नहीं करवाया गया। इसका असर तब सामने आया, जब कोरोना उपचार के लिए शासन-प्रशासन निजी अस्पतालों के आगे हाथ जोड़ता दिखाई दिया। लेकिन, वे न तो आसानी से सेवाएं देने को तैयार हुए और न ही तत्परता से आयुष्मान योजना में अपना पंजीयन करवाया। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी मरीज महंगा बिल खुद चुका रहे हैं। अव्यवस्थाओं के हालात ऐसे हैं कि इंदौर के गोकुलदास अस्पताल पर प्रशासन को ताला लगाना पड़ा।

सोती-जागती पुलिस : बुरहानपुर से इंदौर आया पॉजिटिव!

सऊदी अरब से आए पूर्व पार्षद मोइनुद्दीन ने अपनी ही जानकारी छुपा ली। पॉजिटिव आया तो अस्पताल से भागकर विधायक के घर पहुंचा। मदद से मना किया तो बेटों को लेकर, 200 किमी का सफर करते हुए इंदौर तक आ गया। लॉकडाउन में किसी ने नहीं रोका। परिणाम देखिए, अपने परिवार के साथ, उसने विधायक के परिवार को भी संक्रमित कर दिया।

दरअसल, मध्य प्रदेश में कोरोना ने सबसे पहले जबलपुर पर हमला किया था। जबलपुर इसे अपनी जद से एक बार बाहर निकालने में कामयाब हो गया, लेकिन अदूरदर्शिता देखिए, तब तक इंदौर-भोपाल की चिंता-चुनौतियों पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। उज्जैन-धार और खंडवा-खरगोन जैसे जिलों में आज जो हालात बन गए हैं, उसके लिए प्रदेश का पूरा प्रशासनिक तंत्र जिम्मेदार है। इस तर्क के साथ कि राजनीति तो सरकार बनाने में व्यस्त थी, लेकिन जबलपुर की सूचना के बाद, प्रदेश के 52 जिला कलेक्टर, 10 संभागायुक्त सहित, 300 से ज्यादा आइएएस क्या करते रहे? क्या कोई पेपर प्लानिंग की गई? यदि हां, तो वह अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है? इंदौर में दस्तक देने के बाद, कोरोना ने मालवा-निमाड़ तक पहुंचने में 20 से 30 दिन का समय लिया। इस दौरान छोटी-छोटी गलतियों ने उसे अंचल के छोटे-छोटे गांवों तक पहुंचा दिया। आइए, कुछ उदाहरण के जरिए इस पर भी बात करते हैं-

इंदौर संभाग : रेड जोन बन चुके इंदौर ने लगाम कसने के लिए उपद्रवियों को ऐसी सजा दी, कि वह दोषियों से ज्यादा निर्दोष लोगों को भारी पड़ गई। डॉक्टरों पर पथराव करने वाले इंदौर के जावेद को बगैर जांच के ही जबलपुर भेज दिया। ग्रीन जोन में शामिल हो चुके जबलपुर में फिर से संक्रमण फैल गया। वहीं, इंदौर जेल में बंद उसके पिता नासिर ने 22 से ज्यादा लोगों को संक्रमण बांट दिया।

उज्जैन संभाग : दाहोद (गुजरात) के दो भाइयों का परिवार बस से नीमच (मप्र) आया। बस में 45 मजदूर थे। बाद में हुई जांच में, एक महिला पॉजिटिव आई। नीमच में भी चार केस मिल गए। उसी बस में सवार झाबुआ की एक महिला भी पॉजिटिव हो गई। परेशानी यहीं खत्म नहीं हो रही है। दाहोद पहुंचे परिवार ने मोहल्ले के छह लोगों को भी संक्रमित कर दिया। संक्षेप में, एक कोरोना पॉजिटिव परिवार ने दो राज्यों में 11 लोगों को संक्रमण बांट दिया।

जबलपुर संभाग : जिला प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग में समन्वय की कमी से कई लापरवाहियां हुईं। जबलपुर से कोरोना के सैंपल की जांच मशीन भोपाल भेज दी गई। अब जबलपुर में सैंपल ज्यादा हैं, इसलिए जांच के लिए सागर भेजे जा रहे हैं।

भोपाल संभाग : लॉकडाउन के बाद भी भोपाल में सैंपलिंग समय पर नहीं की गई। लगातार पॉजिटिव केस मिलने के बाद भी सख्ती नहीं हुई। इससे जहांगीराबाद हॉटस्पॉट बन गया। लापरवाहियों का असर यह रहा कि भोपाल में संक्रमण लगातार बढ़ता चला गया। कंटेनमेंट तो बनाए गए, लेकिन सख्ती से पालन नहीं करवाया गया। स्वास्थ्य-पुलिसकर्मी कैसे संक्रमित हुए, पुख्ता तौर पर पता ही नहीं चल पाया।

सागर संभाग : गलियों के अंदर की दुकानों पर भीड़ लगी रही। बैंक व राशन दुकानों के बाहर भी शारीरिक दूरी का पालन नहीं किया गया। परेशानियां बढ़ती रहीं और जिम्मेदार लापरवाह बने रहे।

नर्मदापुरम संभाग : बाहर से आए लोगों के स्वास्थ्य परीक्षण में गंभीरता नहीं बरती गई। जहां संदिग्ध मरीज मिले, इलाज की कमी रही। इससे बीमार लोगों के संपर्क में आने वाले भी संक्रमित हो गए। पुलिस ने आवाजाही करने वाले लोगों के चालान बनाए, कान पकड़वाए, लेकिन अस्पताल क्यों नहीं भेजा, इसका जवाब नहीं मिल रहा है।

ग्वालियर संभाग : सीमाओं पर चौकसी में ढिलाई का उदाहरण ग्वालियर है। बहोड़ापुर, घोसीपुरा, पिछोर के तीन संक्रमित ट्रक में छिपकर शहर में आ गए। पीड़ित के परिजन की सैंपलिंग भी समय पर नहीं करवाई। संक्रमितों के कहने के बावजूद सैंपल लेने में देरी होती रही। ऐसे लोग भी सामने आए, जो अपना सैंपल देने के लिए भटकते रहे।

चंबल संभाग : मुरैना में दुबई से आए युवक की जानकारी संक्रमण फैलने के बाद मिली। फिर, ऐसे 14 मामले सामने आए। श्योपुर में इंदौर से गए युवक ने चार लोगों को संक्रमित कर दिया। हाईवे पर शहर में घुसने वाले ट्रकों की चेकिंग में भी लापरवाही बरती गई। अंचल के जिलों में कई केस ऐसे हैं, जिसमें लोग ट्रक में छिपकर आए और रेड जोन में जाकर संक्रमित हो गए।

रीवा संभाग : दूसरे राज्यों से आने वालों की स्कैनिंग में लापरवाही होती रही। महाराष्ट्र-गुजरात से आए श्रमिकों की स्कैनिंग तुलनात्मक रूप से काफी कम हुई है। स्पष्ट है, इससे आने वाले समय में स्थिति बिगड़ सकती है।

शहडोल संभाग : बाहर से आए कई मजदूरों को क्वारंटाइन करने की बजाय घर भेज दिया गया। जब वे पॉजिटिव हुए, तब तलाश शुरू हुई। शहडोल मेडिकल कॉलेज में अभी भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। संभाग के सभी सैंपल जबलपुर-रीवा भेजे जा रहे हैं। इस प्रक्रिया से देरी हो रही है।

एक अंतिम उदाहरण और है। महीनेभर की मशक्कत के बाद भी, इंदौर मेडिकल कॉलेज कोरोना जांच के लिए किट-कार्टेज का मोहताज है। प्रबंधन कह रहा है कि यदि संसाधन उपलब्ध करवा दिए जाएं, तो सरकारी मेडिकल कॉलेजों की लैब में ही बेहतर परिणाम दिया जा सकता है। यह सच है कि महामारी के मंसूबे पढ़ना आसान नहीं है। लेकिन, यह भी तो सच ही है कि हम एक जैसी गलती, बार-बार कर रहे हैं!

Posted By: Ravindra Soni

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