अमेरिकी संसद पर धावा बोलने वाले अपने समर्थकों के साथ खुद निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया भर में निंदा का पात्र बने हुए हैं। ट्रंप और उनके उग्र-अराजक समर्थकों के खिलाफ केवल निंदा-भत्र्सना का सिलसिला ही कायम नहीं है, उनके खिलाफ कार्रवाई भी द्रुतगति से हो रही है। जहां सत्तारूढ़ होने जा रही डेमोक्रेट पार्टी ट्रंप के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी कर रही है वहीं ट्विटर, फेसबुक के बाद अन्य टेक कंपनियां ट्रंप और उनके समर्थकों के खाते खत्म करने में लगी हुई है। निंदित-लांछित ट्रंप के खिलाफ अन्य अनेक संस्थाएं किस्म-किस्म की कार्रवाई कर रही हैं। इनमें कुछ बैंक भी हैं। उनकी ओर से यह एलान किया जा रहा है कि वे ट्रंप की कंपनियों के साथ कोई लेन-देन नहीं रखेंगे। एक तरह से उनका हुक्का-पानी बंद करने की होड़ मची है। कुछ लोगों की नजर में यह एक तरह का अतिरेक है, लेकिन यह भी तो अकल्पनीय है कि चुनाव नतीजों से असहमत कोई राष्ट्रपति अपने समर्थकों को संसद पर धावा बोलने के लिए उकसाए।

ट्रंप और उनके समर्थक सहानुभूति के पात्र नहीं हो सकते, क्योंकि उन्होंने अमेरिका को शर्मसार किया है। इसी कारण संसद में घुसकर गदर मचाने वालों को उत्पाती-उपद्रवी-दंगाई ही नहीं, देशद्रोही तक कहा जा रहा है। ऐसा कहने वालों में राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने जा रहे जो बाइडन भी हैं। उन्होंने संसद पर चढ़ाई करने के कृत्य को विरोध प्रदर्शन नहीं, एक तरह का राजद्रोह करार दिया। अमेरिकी एजेंसियां इन उपद्रवी तत्वों के खिलाफ जबरन प्रवेश, सरकारी संपत्ति को नुकसान, तोडफ़ोड़ के आरोपों के तहत कार्रवाई करने के लिए कमर कसे हैं। इस पर भी विचार हो रहा है कि क्या इन उपद्रवी तत्वों के खिलाफ राजद्रोह के तहत कार्रवाई हो सकती है? कई उपद्रवी गिरफ्तार हो चुके हैं। बाकी की तलाश जारी है। उनकी पहचान करने की अपील की गई है और उनके फोटो उन वीडियो से निकाल कर जारी किए गए हैं, जो संसद पर धावा बोले जाने के दौरान सामने आए थे। अब जरा ठहरें और यह स्मरण करें कि नागरिकता संशोधन कानून पारित होने का बाद अपने देश में क्या-क्या हुआ था? इस कानून के विरोध के नाम पर सबसे पहले बंगाल में ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों को जलाया गया, फिर दिल्ली में जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के सामने कथित शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर उतरकर जमकर आगजनी की। इसके बाद सीलमपुर और जाफराबाद इलाके में नागरिकता कानून का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों ने तोडफ़ोड़ और आगजनी की। इस दौरान एक कथित प्रदर्शनकारी बम लिए था। वह उसके हाथ में ही फट गया। हिंसा की ऐसी ही घटनाएं देश के कई शहरों में हुईं। इस हिंसा में सरकारी संपत्ति और पुलिस को खास तौर पर निशाना बनाया गया। कहीं-कहीं तो पुलिस कर्मी घायल भी हुए। अहमदाबाद, दिल्ली, मेरठ, कानपुर, लखनऊ आदि शहरों में पुलिसकर्मी खास तौर पर भीड़ की हिंसा का शिकार बने। इसके बाद भी वामपंथी बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक हिस्से की ओर से उग्र भीड़ को शांतिपूर्ण प्रदशर्नकारी बताने की कोशिश की गई। उन्हेंं भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी ही कहा गया, जो दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में रास्ता रोककर करीब सौ दिन धरने पर बैठे रहे।

जब शाहीन बाग में धरने पर बैठे लोगों को हटाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई तो उसने धरना देने वालों को समझाने-बुझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त कर दिए। इससे धरना दे रहे लोगों का मनोबल और बढ़ा। यही धरना ट्रंप के दिल्ली आगमन पर भयावह दंगों का कारण बना। इन दंगों में करीब 50 लोग मारे गए। जब दंगा भड़काने के आरोप में ताहिर हुसैन जैसे तत्व गिरफ्तार किए गए तो उनके बचाव में जो लोग उतरे, उनमें एक बड़ा नाम गीतकार जावेद अख्तर का भी था। अब पता चल रहा है कि दिल्ली दंगे सुनियोजित साजिश का हिस्सा थे और उसमें जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद भी शामिल था। कुछ माह पहले शाहीन बाग धरने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि आंदोलन के नाम पर सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा नहीं किया जा सकता। हालांकि जब तक यह फैसला आया, तब तक पंजाब में किसान कृषि कानूनों के खिलाफ रेल पटरियों पर बैठ चुके थे। इस फैसले के बाद भी उन्हें रेल पटरियों से हटाने की कोई कोशिश नहीं की गई।

लोकतंत्र में हर किसी को धरना-प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन कहीं भी वह चाहे अमेरिका हो या भारत, असहमति को अराजकता में तब्दील करने की सुविधा नहीं दी जा सकती। यदि अमेरिका में संसद पर धावा बोलना अराजक कृत्य है तो फिर नागरिकता विरोधी कानून के विरोध के बहाने की गई हिंसा भी अराजकता का ही पर्याय मानी जाएगी। आखिर जैसा कृत्य अमेरिका में गलत है, वैसा भारत में सही कैसे हो सकता है? क्या यह अजीब नहीं कि भारत में जो लोग अमेरिकी संसद में धावा बोलने वालों की कड़ी निंदा कर रहे हैं, वही नागरिकता कानून के विरोध में उत्पात मचाने वालों की तरफदारी करते नहीं थक रहे थे? वे असम को शेष देश से काट देने की वकालत करने और लोगों को उकसाने वाले शर्जील इमाम की गिरफ्तारी को भी उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करार दे रहे थे। कुछ तो यहां तक कह रहे थे कि वह तो केवल रास्ता जाम करने की बात कह रहा था। पता नहीं ऐसे तर्क देने वालों के विचार बदले हैं या नहीं, लेकिन उन्हें इससे अवगत होना चाहिए कि बीते दिनों गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम में नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों की अगुआई करने वाले एक्टिविस्ट अखिल गोगोई को जमानत देने से इन्कार कर दिया। उच्च न्यायालय की ओर से कहा गया कि अखिल गोगोई के नेतृत्व वाली भीड़ ने हिंसा का इस्तेमाल कर सरकारी मशीनरी को कमजोर करने, नफरत फैलाने और सरकार के प्रति असंतोष पैदा करने की जो कोशिश की वह कानून में आतंकी हरकत के रूप में परिभाषित है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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