केंद्रीय बजट में गोवा मुक्ति आंदोलन की स्मृतियों को जीवित एवं समृद्ध बनाने के लिए 300 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। इसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। गोवा मुक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि और संघर्ष गाथा सर्वथा भिन्न है। गोवा सरकार मुक्ति के 60 वर्ष पर भव्य आयोजन समारोह करने की योजना बना रही थी, लेकिन स्थानीय चुनावों के चलते आचार संहिता लगने एवं कोरोना संक्रमण के फैलने की आशंका की वजह से कोई बड़ा आयोजन नहीं हो पाया। 23 मार्च को डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्मदिन है। लिहाजा उनके नाम से निॢमत लोहिया मैदान में एक कार्यक्रम है। डॉ. लोहिया स्वयं अपना जन्मदिन मनाने से परहेज करते थे, क्योंकि इसी दिन सरदार भगत सिंह एवं साथियों का शहीदी दिवस भी है। जिसको वे अपने जन्म समारोह से बड़ी घटना स्वीकार करते थे। इतिहास गवाह है कि गोवा आजादी के प्रेरणादायक प्रथम सत्याग्रही डॉ. लोहिया थे।

पुर्तगाल के एक जहाजी बेड़े का पहला आगमन यद्यपि वास्को डी गामा के नेतृत्व में 20 मई, 1498 में कालीकट (कोझीकोड) केरल में हुआ था, लेकिन कालीकट के राजा से अनबन के चलते पुर्तगाली 25 नवंबर, 1510 को गोवा समेत आसपास के द्वीपों पर अपनी सत्ता स्थापित करने में कामयाब हो गए। दक्षिण गुजरात के नगर हवेली पर भी 1779 में वे अपना प्रभुत्व जमाने में सफल हो गए। यह रोचक है कि पुर्तगाल साम्राज्य के विरुद्ध कोंकण क्षेत्र को मुक्त कराने का पहला प्रयास छत्रपति शिवाजी महाराज का है, लेकिन उन्हें वांछित सफलता प्राप्त नहीं हो पाई। बाद में उनके उत्तराधिकारी छत्रपति संभाजी ने कई बार पुर्तगाली सैनिकों को कई क्षेत्रों में मात दी।

गोवा को 1961 के अंत तक क्यों पराधीन रहना पड़ा? इसके मूल में कई कारणों के साथ दो बातें मुख्य थीं। एक पुर्तगाल स्वयं डॉ. सालाजार की फासिस्ट तानाशाही में जकड़ा हुआ था और एक 'पुलिस राज्यÓ था। इसके साथ ही सालाजार शाही का यह अटल विश्वास था कि गोवा तथा अन्य उपनिवेशों में पुर्तगाल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि 'ईश्वर और धर्मÓ की खातिर टिका हुआ है। इतने लंबे अर्से तक गोवा में पुर्तगाली शासन के बने रहने का बड़ा कारण भारत सरकार की यह धारणा थी कि गोवा की मुक्ति में भारत सरकार किसी प्रकार का बल इस्तेमाल नहीं करेगी। दिसंबर 1961 तक पं. नेहरू अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के चलते भारत और गोवा के स्वाधीनता प्रेमियों से दूरी बनाए रखे थे। यद्यपि गोवा में भी स्वाधीनता संग्र्राम के दौरान 1928 में कांग्रेस पार्टी का गठन हो चुका था। यह दुर्भाग्य है कि गोवा कांग्रेस कमेटी कई वर्षों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी से संबद्ध थी, लेकिन 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के मुताबिक किए गए संवैधानिक सुधारों के फलस्वरूप राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश भारत के अलावा अपनी अन्य सभी शाखाओं से संबंध तोड़ लिए। इस निर्णय के मूल में चाहे जो कारण रहे हों इससे गोवा के राष्ट्रवादियों का मनोबल टूटा और गोवा में राष्ट्रीय चेतना का बढ़ता हुआ ज्वार उतार पर आ गया। हालांकि बाद के दिनों में बंबई कांग्रेस अधिवेशन में 'अंग्रेजों भारत छोड़ोÓ और 'करो या मरोÓ के नारे ने समूचे देश के साथ गोवा, दमन, दीव में भी नए जीवन का रक्त संचार तेज कर दिया। मार्च 1946 तक यह स्पष्ट होने लगा था कि अब अंग्रेज अधिक समय तक भारत को अपने अधीन नहीं रख पाएंगे। उधर वे भारतीयों को सत्ता सौंपने की तैयारी कर रहे थे और गोवा में पुर्तगाली अपनी स्थिति को और मजबूत करने में लगे थे। इसी बीच मार्च 1946 में गोवा कांग्रेस कमेटी के प्रस्ताव ने खलबली मचा दी कि गोवा की अपनी मातृभूमि भारत से अलग अन्य कोई नियति नहीं हो सकती, क्योंकि यह उसका अभिन्न अंग है।

कांग्रेस पार्टी के अंदर समाजवादियों की बड़ी संख्या थी, जिसमें डॉ. लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, ईएमएस नंबूदरीपाद, अशोक मेहता, यूसुफ मेहर अली आदि प्रमुख थे। 1942 में गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद आई शून्यता को उन्होंने आंदोलन को संगठित करने का काम किया। डॉ. लोहिया 1946 में लाहौर जेल से रिहा होकर देश भर में भ्रमण कर आंदोलन को अंतिम रूप देने में लगे थे। उनको लाहौर जेल में भयंकर यातनाएं दी गई थीं। वह आराम की खोज में गोवा के अपने पुराने मित्र डॉ. जूलियो मेनेजिस के यहां पहुंचे। वहां उनसे पणजी के कोने-कोने से आए लोग मिले। सभी ने अपने अनुभवों को डॉ. लोहिया के सामने रखा कि किस प्रकार अंग्रेजी शासकों से भी बदतर पुर्तगाली बरताव कर रहे हैं। डॉ. लोहिया ने 15 जून, 1946 को एक सभा बुलाने का निश्चय किया। पणजी के सभागार में डॉ. लोहिया ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की आवश्यकता पर जोर दिया। 18 जून से आंदोलन शुरू करने की योजना बन गई। सभा स्थल पर करीब 20 हजार लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। लोहिया भाषण देने के लिए खड़े हुए तो प्रशासक मिराडा रिवॉल्वर लेकर खड़ा हो गया। डॉ. लोहिया ने उसको हटाया तो जनता ने पहली बार विदेशी शासक के साथ ऐसे व्यवहार का अनुभव किया। फिर डॉ. लोहिया और उनके मित्र डॉ. जूलिया को गिरफ्तार कर लिया गया। उसे देख जनता उत्तेजित हो गई। हजारों लोगों का जमघट पुलिस स्टेशन को घेर चुका था। 19 तारीख को उमड़े जनसैलाब के चलते दोनों को रिहा कर दिया गया और गोवा में भी भारत की तर्ज पर आजादी के नारे गूंजने लगे। गांधी जी ने लोहिया के आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन दिया, लेकिन पं. नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय छवि के कारण दूरी बनाए रखी।

अंतत: निरंतर आंदोलन और लाखों सत्याग्रहियों के आगे भारत सरकार को भी विवश होकर सैनिक कार्रवाई कर गोवा को मुक्त कराना पड़ा। 23 मार्च को डॉ. लोहिया की स्मृति को जीवित रखने का यह प्रशंसनीय प्रयास है।

(लेखक जदयू के प्रधान महासचिव हैैं)

Posted By: Arvind Dubey

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